भारत की खगोल विज्ञान अवसंरचना का सुदृढ़ीकरण

पाठ्यक्रम: GS3/ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

संदर्भ 

  • केंद्रीय बजट 2026–27 में अंतरिक्ष विभाग को ₹13,416.20 करोड़ आवंटित किए गए हैं, जो गहन-अंतरिक्ष अन्वेषण और खगोल भौतिकी की दिशा में नए प्रोत्साहन का संकेत है।

बजट में प्रमुख घोषणाएँ

  • उन्नत दूरबीन अवसंरचना का विकास: सरकार ने 30-मीटर नेशनल लार्ज ऑप्टिकल-इन्फ्रारेड टेलीस्कोप (NLOT) के निर्माण को प्राथमिकता दी है।
    • लद्दाख में पैंगोंग झील के निकट नेशनल लार्ज सोलर टेलीस्कोप (NLST) को वित्तीय समर्थन प्राप्त हुआ है।
    • हानले स्थित हिमालयन चंद्रा टेलीस्कोप के उन्नयन का प्रस्ताव किया गया है।
    • अमरावती में COSMOS-2 तारामंडल पूर्णता के निकट है, जिससे विज्ञान जनसंपर्क को बढ़ावा मिलेगा।
  • गहन-अंतरिक्ष अन्वेषण और खगोल भौतिकी पर ध्यान: आवंटन का बड़ा हिस्सा अग्रणी अनुसंधान की ओर निर्देशित है, जिससे भारत वैश्विक खोजों में अग्रणी भागीदारी कर सके, न कि केवल द्वितीयक सहयोगी बने।

भारत की वर्तमान खगोल विज्ञान अवसंरचना 

  • पुणे के निकट जायंट मीटरवेव रेडियो टेलीस्कोप (GMRT) विश्व का सबसे बड़ा निम्न-आवृत्ति रेडियो टेलीस्कोप समूह है।
  • 2020 में IN-SPACe (भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन एवं प्राधिकरण केंद्र) की स्थापना ने सार्वजनिक-निजी भागीदारी को प्रोत्साहित किया है।
  • एस्ट्रोसैट मिशन, भारत का प्रथम समर्पित बहु-तरंगदैर्ध्य अंतरिक्ष वेधशाला, ने अंतरिक्ष-आधारित खगोल विज्ञान में भारत की क्षमता को सुदृढ़ किया और वैश्विक स्तर पर मान्यता प्राप्त वैज्ञानिक परिणाम दिए।
  • अहमदाबाद स्थित भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला (PRL) ग्रह विज्ञान, सौर भौतिकी एवं अंतरिक्ष खगोल विज्ञान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, और चंद्रयान तथा मंगलयान जैसी मिशनों में योगदान देता है।
  • भारत कृत्रिम बुद्धिमत्ता-आधारित डेटा प्रसंस्करण केंद्रों में बढ़ती क्षमताओं का धनी है। इस पारिस्थितिकी तंत्र में ISRO के साथ सहयोग करने वाले स्पेस-टेक स्टार्टअप्स की संख्या में वृद्धि हुई है।

घरेलू अवसंरचना को सुदृढ़ करने का औचित्य 

  • सीमित वैश्विक पहुँच: केवल कुछ देश जैसे अमेरिका, चीन, जापान और यूरोपीय संघ के सदस्य बड़े स्थलीय एवं अंतरिक्ष दूरबीनों में भारी निवेश करते हैं।
    • इन सुविधाओं तक पहुँच अत्यधिक प्रतिस्पर्धी है और भारतीय वैज्ञानिकों को विदेशी सुविधाओं पर प्रेक्षण समय प्रायः सीमित मिलता है।
  • भौगोलिक लाभ का उपयोग: कई प्रस्तावित सुविधाएँ हानले और लद्दाख के पैंगोंग झील के निकट क्षेत्रों में स्थित हैं, जहाँ अंधकारमय, उच्च-ऊँचाई वाले आकाश स्थलीय खगोल विज्ञान के लिए आदर्श हैं।
  • प्रतिभा पलायन रोकना: विश्व-स्तरीय घरेलू सुविधाएँ प्रतिभाशाली छात्रों और शोधकर्ताओं को भारत में उन्नत अनुसंधान करने के लिए प्रोत्साहित कर सकती हैं।
  • वैश्विक विज्ञान में रणनीतिक स्थिति: खगोल विज्ञान और अंतरिक्ष विज्ञान योगदान देते हैं:
    • प्रौद्योगिकी प्रसार में।
    • उन्नत उपकरण विकास में।
    • राष्ट्रीय प्रतिष्ठा और सॉफ्ट पावर में।

भारत की खगोल विज्ञान अवसंरचना में अंतराल

  • तुलनीय ऑप्टिकल टेलीस्कोप सुविधाओं का अभाव: GMRT की सफलता के बावजूद भारत के पास वैश्विक मानकों के अनुरूप विश्व-स्तरीय ऑप्टिकल टेलीस्कोप नहीं है।
  • सब-मिलीमीटर टेलीस्कोप क्षमताओं का अभाव: भारत के पास वर्तमान में सब-मिलीमीटर तरंगदैर्ध्य पर कार्य करने वाले टेलीस्कोप नहीं हैं, जो आवश्यक हैं:
    • प्रोटो-स्टेलर डिस्क का अध्ययन करने के लिए।
    • आकाशगंगा निर्माण को समझने के लिए।
    • धूलयुक्त तारों के निर्माण क्षेत्रों की जाँच के लिए।
  • बजटीय आवंटनों का अपर्याप्त उपयोग: विशेषज्ञों ने इंगित किया है कि वास्तविक व्यय बजटीय आवंटनों से कम रहा है।

आगे की राह 

  • सार्वजनिक–निजी भागीदारी को बढ़ावा दें: IN-SPACe के अंतर्गत नियामकीय निगरानी के साथ निजी क्षेत्र की भागीदारी को अंतरिक्ष और खगोल विज्ञान उपकरणों में विस्तारित किया जाना चाहिए।
  • उन्नत डेटा अवसंरचना का निर्माण करें: कृत्रिम बुद्धिमत्ता-आधारित डेटा विश्लेषण, उच्च-प्रदर्शन कंप्यूटिंग और बिग-डेटा खगोल विज्ञान प्लेटफ़ॉर्म में निवेश को बढ़ाया जाना चाहिए।
  • मानव संसाधन को सुदृढ़ करें: खगोल भौतिकी और ग्रह विज्ञान में फैलोशिप, पोस्टडॉक्टरल कार्यक्रमों एवं अनुसंधान अनुदानों के लिए अधिक वित्तीय समर्थन प्रदान किया जाना चाहिए।

Source: TH

 

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