भारत की स्वास्थ्य प्रणाली में संरचनात्मक घाटों का समाधान 

पाठ्यक्रम: GS2/ शासन / स्वास्थ्य

संदर्भ

  • हाल ही में स्वास्थ्य राज्य मंत्री ने संसद को सूचित किया कि 43 नए मेडिकल कॉलेज स्थापित किए गए हैं और 2025-26 शैक्षणिक वर्ष के लिए 11,682 एमबीबीएस सीटें तथा 8,967 स्नातकोत्तर सीटें स्वीकृत की गई हैं।
    • हालाँकि, संरचनात्मक घाटे अब भी भारत की स्वास्थ्य प्रणाली को चुनौती देते हैं।

भारत की स्वास्थ्य प्रणाली में संरचनात्मक घाटे

  • विशेषज्ञों की भारी रिक्तियाँ: हेल्थ डायनेमिक्स ऑफ इंडिया 2022–23 के अनुसार ग्रामीण सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (CHCs) में विशेषज्ञों की रिक्ति दर लगभग 79.9% है।
  • केवल 4,413 विशेषज्ञ उपलब्ध हैं जबकि आवश्यकता 21,964 विशेषज्ञों की है।
  • चिकित्सा शिक्षा में निजी क्षेत्र: 43 नए स्वीकृत मेडिकल कॉलेजों में से 27 निजी क्षेत्र में हैं।
  • निजी मेडिकल कॉलेज उच्च शुल्क और कैपिटेशन लागत लेते हैं।
  • निजी संस्थानों से स्नातक सामान्यतः शहरी निजी प्रैक्टिस को प्राथमिकता देते हैं क्योंकि उन्हें सरकारी अस्पतालों या दूरस्थ क्षेत्रों में सेवा देने का कोई बाध्यकारी दायित्व नहीं होता।
  • अकार्यशील सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHCs): एक CHC लगभग 1.6 से 2 लाख जनसंख्या के लिए प्रथम रेफरल इकाई के रूप में कार्य करता है और इसमें 30 बिस्तर तथा पाँच विशेषज्ञ (चिकित्सक, शल्य चिकित्सक, प्रसूति विशेषज्ञ, बाल रोग विशेषज्ञ एवं संज्ञाहरण विशेषज्ञ) होने अपेक्षित हैं।
  • हालाँकि, अधिकांश CHCs विशेषज्ञों की कमी के कारण कार्यशील नहीं हैं।
  • दूरस्थ क्षेत्रों में चिकित्सकों की खराब कार्य परिस्थितियाँ: वहाँ नियुक्त चिकित्सकों को आवासीय सुविधाओं का अभाव, पेशेवर अलगाव, भारी कार्यभार और सीमित कैरियर विकास अवसरों का सामना करना पड़ता है।
  • शिक्षक संकाय की कमी: 18 एम्स में से 11 में शिक्षण और अनुसंधान संकाय पदों पर लगभग 40% रिक्तियाँ हैं।
  • स्वास्थ्य बजट प्राथमिकताओं में असंतुलन: संघीय स्वास्थ्य बजट पूंजीगत व्यय (अवसंरचना विस्तार) पर अत्यधिक केंद्रित रहता है, जबकि मानव संसाधन, निदान, आपातकालीन देखभाल और रखरखाव जैसे महत्वपूर्ण परिचालन घटक अपर्याप्त वित्तपोषित रहते हैं।

सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा को सुदृढ़ करने का महत्व

  • सामाजिक न्याय और समानता: सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा गरीब और कमजोर वर्गों के लिए प्राथमिक चिकित्सा स्रोत बनी रहती है। कमजोर सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली क्षेत्रीय असमानताओं एवं सामाजिक बहिष्कार को गहरा करती है।
  • जेब से होने वाला व्यय: सुदृढ़ सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली महँगी निजी स्वास्थ्य सेवाओं पर निर्भरता कम करती है। इससे विनाशकारी स्वास्थ्य व्यय और घरेलू चिकित्सा ऋणग्रस्तता घटती है।
  • सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज: सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा को सुदृढ़ करना राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति के लक्ष्यों एवं सतत विकास लक्ष्य 3 (स्वास्थ्य और कल्याण) की प्राप्ति के लिए आवश्यक है।

सरकारी पहल

  • प्रधानमंत्री आयुष्मान भारत स्वास्थ्य अवसंरचना मिशन (PM-ABHIM): ग्रामीण क्षेत्रों में महत्वपूर्ण स्वास्थ्य अवसंरचना निर्माण हेतु योजना, ताकि भविष्य की महामारियों का प्रबंधन और निगरानी सुदृढ़ हो सके।
  • आयुष्मान भारत कार्यक्रम: स्वास्थ्य और कल्याण केंद्रों (HWCs) के माध्यम से प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा को सुदृढ़ करना तथा प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (PM-JAY) द्वारा वित्तीय सुरक्षा प्रदान करना।
  • ई-संजीवनी के अंतर्गत टेलीमेडिसिन पहल: दूरस्थ और वंचित क्षेत्रों में स्वास्थ्य परामर्श हेतु डिजिटल स्वास्थ्य सेवा को बढ़ावा देना।
  • प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना (PMBJP): समर्पित केंद्रों के माध्यम से उच्च गुणवत्ता वाली जेनेरिक दवाओं को सस्ती कीमतों पर उपलब्ध कराना।

भारत की सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली को सुदृढ़ करने के उपाय

  • चिकित्सा शिक्षा को सार्वजनिक स्वास्थ्य आवश्यकताओं से जोड़ना: सरकार द्वारा प्रायोजित स्नातकोत्तर सीटों को सीधे CHCs और जिला अस्पतालों में विशेषज्ञ रिक्तियों से जोड़ा जाना चाहिए।
  • सब्सिडी प्राप्त स्नातकोत्तर प्रशिक्षण करने वाले अभ्यर्थियों को प्रशिक्षण पूर्ण होने के बाद निर्दिष्ट सार्वजनिक संस्थानों में सेवा देना अनिवार्य होना चाहिए।
  • ग्रामीण सेवा हेतु प्रोत्साहन: कठिन क्षेत्रों में सेवा देने वाले चिकित्सकों को अतिरिक्त भत्ते, कैरियर उन्नति प्रोत्साहन, उन्नत पेंशन और सेवा लाभ दिए जाने चाहिए।
  • स्वास्थ्य संस्थानों का वर्गीकरण: प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHCs) और CHCs को सामान्य क्षेत्र, कठिन क्षेत्र एवं अति कठिन क्षेत्र में वर्गीकृत किया जाना चाहिए, जैसा कि छत्तीसगढ़ में ग्रामीण मेडिकल कॉर्प्स योजना के अंतर्गत किया गया था।
  • प्रोत्साहन को पदस्थापन की कठिनाई स्तर से जोड़ा जाना चाहिए।
  • ऑल ऑर नन सिद्धांत: विशेषज्ञों को बिखरे हुए रूप में नहीं, बल्कि पूर्ण टीम के रूप में नियुक्त किया जाना चाहिए।
  • कार्यशील CHCs हेतु सभी पाँच प्रमुख विशेषज्ञों की एक साथ उपलब्धता आवश्यक है।
  • चयनित CHCs में केंद्रित नियुक्ति उप-जिला स्तर पर प्रभावी रेफरल केंद्र बना सकती है।
  • स्वास्थ्य अवसंरचना: निवेश की प्राथमिकता स्टाफ क्वार्टर, प्रसव कक्ष, ऑपरेशन थिएटर, गहन चिकित्सा इकाइयाँ, रक्त भंडारण सुविधाएँ, टेलीमेडिसिन और डिजिटल स्वास्थ्य अवसंरचना पर होनी चाहिए।

निष्कर्ष

  • भारत का स्वास्थ्य संकट चिकित्सा शिक्षा, कार्यबल नियुक्ति और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्राथमिकताओं के बीच गहरे संरचनात्मक असंतुलन का परिणाम है।
  • भारत को एक व्यापक रणनीति अपनानी चाहिए जो चिकित्सा शिक्षा को सार्वजनिक सेवा दायित्वों से जोड़े, ग्रामीण स्वास्थ्य अवसंरचना को सुदृढ़ करे और एक प्रेरित स्वास्थ्य कार्यबल तैयार करे जो समाज के सभी वर्गों को समान स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने में सक्षम हो।

Source: TH

 

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