भारत का डायग्नोस्टिक्स क्षेत्र

पाठ्यक्रम: GS3/ विज्ञान और प्रौद्योगिकी

संदर्भ

  • भारत का डायग्नोस्टिक्स क्षेत्र स्वास्थ्य सेवा उद्योग में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जो रोग का शीघ्र पता लगाने और उपचार योजना बनाने में सहायता करता है।
  • शंकर धांगे का दुखद मामला, जिसकी बहन की जान गलत निदान परीक्षण परिणामों के कारण चली गई, अपर्याप्त विनियमन और निगरानी से उत्पन्न गंभीर खतरों को रेखांकित करता है।

भारत का डायग्नोस्टिक्स क्षेत्र: विकास और महत्त्व

  • डायग्नोस्टिक्स क्षेत्र कुल स्वास्थ्य सेवा उद्योग में 9% का योगदान देता है और रोग प्रबंधन तथा चिकित्सा निर्णय लेने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
  • भारतीय डायग्नोस्टिक्स उद्योग तीव्र गति से विस्तार कर रहा है, जिसका अनुमानित मूल्य 2028 तक ₹1.275 बिलियन होगा।
  • भारत भर में लगभग 300,000 प्रयोगशालाएँ हैं, जो बढ़ती जनसंख्या की सेवा कर रही हैं।
  • डिजिटल स्वास्थ्य प्लेटफार्मों और AI-संचालित निदान के उदय के साथ रोग का शीघ्र पता लगाना भारत में चिकित्सा परीक्षण के भविष्य को आकार दे रहा है।

डायग्नोस्टिक्स क्षेत्र के समक्ष चुनौतियाँ

  • कमजोर नियामक निगरानी: केवल 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने क्लिनिकल प्रतिष्ठान अधिनियम को अपनाया है, जिसके कारण पूरे देश में विनियमनों में असंगति उत्पन्न हो रही है।
    • प्रयोगशालाओं के लिए कोई अनिवार्य मान्यता नहीं है, जिससे कई प्रयोगशालाएँ मानकीकृत गुणवत्ता नियंत्रण के बिना ही काम कर पाती हैं।
  •  कुशल कर्मियों की कमी: प्रशिक्षित पैथोलॉजिस्ट, माइक्रोबायोलॉजिस्ट और लैब तकनीशियनों की कमी से निदान की सटीकता प्रभावित होती है।
  • शहरी-ग्रामीण विभाजन: भारत की 70% जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है, इसके बावजूद निदान राजस्व का केवल 24% ही ग्रामीण क्षेत्रों से आता है।
    • सरकारी प्रयोगशालाओं में उचित बुनियादी ढाँचे, वित्त पोषण और प्रशिक्षित कर्मचारियों का अभाव है।
  • निजी निदान की उच्च लागत: परीक्षणों के लिए कोई मानकीकृत मूल्य निर्धारण नहीं होने से लागत में असमानताएँ उत्पन्न होती हैं।
    • निजी प्रयोगशालाएँ प्रायः अत्यधिक शुल्क वसूलती हैं, जिससे निम्न आय वर्ग के लोगों के लिए नैदानिक ​​सेवाएँ उपलब्ध नहीं हो पातीं।
    • तेलंगाना की ‘टी-डायग्नोस्टिक्स’ और केरल के ‘आर्द्रम मिशन’ जैसी पहलों का उद्देश्य किफायती निदान उपलब्ध कराना है, लेकिन उन्हें तार्किक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
  • धोखाधड़ीपूर्ण व्यवहार: नकली रोगविज्ञानी और अनधिकृत तकनीशियन सामान्य हैं, जो रोगी की सुरक्षा से समझौता करते हैं।
    • कुछ प्रयोगशालाएँ उचित समीक्षा के बिना रिपोर्ट जारी करने के लिए पैथोलॉजिस्टों से “खरीदे गए हस्ताक्षर” का उपयोग करती हैं।

क्षेत्र के विनियमन

  • नैदानिक ​​प्रतिष्ठान (पंजीकरण और विनियमन) अधिनियम, 2010: इसका उद्देश्य नैदानिक ​​केंद्रों को विनियमित करना और सेवाओं के लिए न्यूनतम मानक निर्धारित करना है।
    • इसे केवल 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा अपनाया गया तथा इसका कार्यान्वयन भी खराब रहा।
  • NABL  मान्यता: परीक्षण और अंशांकन प्रयोगशालाओं के लिए राष्ट्रीय मान्यता बोर्ड (NABL ) स्वैच्छिक मान्यता प्रदान करता है।
    • बड़ी डायग्नोस्टिक श्रृंखलाएँ NABL दिशा-निर्देशों का पालन करती हैं, लेकिन कई छोटी प्रयोगशालाएँ बिना मान्यता के काम करती हैं।
  • राज्य-विशिष्ट विनियम: कर्नाटक और केरल में अलग-अलग विनियामक ढाँचे हैं, लेकिन उनका प्रवर्तन असंगत बना हुआ है।
    • तमिलनाडु के नए क्लिनिकल प्रतिष्ठान (विनियमन) नियम, 2018 प्रयोगशालाओं के लिए न्यूनतम स्थान की आवश्यकता को अनिवार्य बनाते हैं।

आगे की राह: भारत के डायग्नोस्टिक्स क्षेत्र में सुधार

  • विनियमन और अनुपालन को सुदृढ़ बनाना: सभी डायग्नोस्टिक केंद्रों के लिए NABL मान्यता अनिवार्य बनाना।
    • सभी राज्यों में क्लिनिकल प्रतिष्ठान अधिनियम का एक समान कार्यान्वयन सुनिश्चित करना।
    • सतत् निगरानी के लिए एक केंद्रीय नियामक निकाय की स्थापना करना।
  • कार्यबल और प्रशिक्षण कार्यक्रमों का विस्तार: माइक्रोबायोलॉजिस्ट, पैथोलॉजिस्ट और लैब तकनीशियनों के लिए चिकित्सा शिक्षा सीटों और प्रशिक्षण कार्यक्रमों में वृद्धि।
    • प्रयोगशाला तकनीशियनों के लिए नियमित कौशल उन्नयन और प्रमाणन अनिवार्य करना।
    • भूतपूर्व रोग विशेषज्ञों पर अंकुश लगाने के लिए एक रोग विशेषज्ञ द्वारा संबद्ध की जा सकने वाली प्रयोगशालाओं की संख्या पर सीमा निर्धारित करना।
  • धोखाधड़ीपूर्ण प्रथाओं को समाप्त करना: पैथोलॉजिस्टों की साख के दुरुपयोग को रोकने के लिए प्रयोगशाला रिपोर्टों की डिजिटल ट्रैकिंग को लागू करना।
    • भूतपूर्व रोग विशेषज्ञों और अयोग्य तकनीशियनों के लिए कठोर दंड लागू करना।
    • अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए नियमित ऑडिट और आकस्मिक निरीक्षण करना।
  • शहरी-ग्रामीण अंतर को समाप्त करना: ग्रामीण निदान केंद्रों में सरकारी निवेश बढ़ाना।
    • दूरदराज के क्षेत्रों में निदान तक पहुँच में सुधार के लिए सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPPs) का विस्तार करना।
    • ‘टी-डायग्नोस्टिक्स’ और ‘आर्द्रम मिशन’ जैसी सफल राज्य-वित्तपोषित नैदानिक ​​पहलों को अन्य क्षेत्रों तक विस्तारित करना।
  • मूल्य निर्धारण और गुणवत्ता नियंत्रण का मानकीकरण: आवश्यक नैदानिक ​​परीक्षणों के लिए मूल्य सीमा लागू करना।
    • नमूना संग्रहण, परीक्षण और रिपोर्टिंग के लिए मानक संचालन प्रक्रिया (SOPs) को अनिवार्य बनाना।
    • बाह्य एवं आंतरिक गुणवत्ता नियंत्रण उपायों को लागू करना।

Source: TH

 

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