सतत विकास हेतु औद्योगिक ऊष्मा का डीकार्बोनाइजेशन 

पाठ्यक्रम: GS3/ ऊर्जा और बुनियादी ढांचा / पर्यावरण

संदर्भ

  • हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य में भू-राजनीतिक अस्थिरता और भारत की जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता यह स्पष्ट करती है कि ऊर्जा सुरक्षा एवं सततता के लिए औद्योगिक ऊष्मा का विद्युतीकरण आवश्यक है।

औद्योगिक ऊष्मा क्या है?

  • औद्योगिक ऊष्मा से आशय उस तापीय ऊर्जा से है जो वस्त्र, सिरेमिक, इस्पात और रसायन जैसे क्षेत्रों में विनिर्माण प्रक्रियाओं हेतु आवश्यक होती है।
  • इसका उपयोग भाप उत्पादन, सुखाने, रंगाई और 1000°C से अधिक तापमान वाले भट्ठी संचालन में होता है।
  • यह भारत की कुल ऊर्जा खपत का लगभग 25% हिस्सा है।
    • केवल औद्योगिक प्रक्रिया भाप ही भारत में लगभग 182 मिलियन टन CO₂ उत्सर्जन करती है।
  • कोयला, फर्नेस ऑयल, बायोमास और प्राकृतिक गैस जैसे जीवाश्म ईंधन औद्योगिक हीटिंग सिस्टम में प्रमुख हैं, जिससे SO₂, NOx और कणीय पदार्थ उत्सर्जन होता है और वायु गुणवत्ता बिगड़ती है।
  • प्रमुख क्षेत्र: वस्त्र, खाद्य प्रसंस्करण, रसायन, औषधि और कागज़ उद्योग।

औद्योगिक ऊष्मा के विद्युतीकरण की आवश्यकता

  • ऊर्जा सुरक्षा: आयातित जीवाश्म ईंधन पर भारी निर्भरता उद्योगों को भू-राजनीतिक आघातों और मूल्य अस्थिरता के प्रति संवेदनशील बनाती है।
  • डीकार्बोनाइजेशन लक्ष्य: औद्योगिक ऊष्मा कार्बन उत्सर्जन का बड़ा स्रोत है, विद्युतीकरण भारत की जलवायु प्रतिबद्धताओं को समर्थन दे सकता है।
  • दक्षता सुधार: पारंपरिक बॉयलर 20–30% ऊर्जा खो देते हैं, जबकि विद्युत तकनीकें 90% से अधिक दक्षता प्राप्त कर सकती हैं।
  • ऊष्मा संप्रभुता: विद्युतीकरण घरेलू रूप से उत्पन्न, नवीकरणीय-आधारित ऊष्मा प्रणालियों की ओर बदलाव सक्षम करता है।

विद्युतीकरण हेतु तकनीकी मार्ग

  • केंद्रित सौर तापीय (CST): दर्पणों का उपयोग कर सूर्य के प्रकाश को केंद्रित कर कार्यशील द्रव (जैसे पानी या पिघला हुआ नमक) को गर्म करना।
    • ~400°C तक तापमान प्राप्त कर सकता है, जो मध्यम तापमान औद्योगिक प्रक्रियाओं (100–180°C) के लिए उपयुक्त है।
    • भारत में अनुमानित CST क्षमता 6.4 GW है, पर अपनाने की दर सीमित है।
    • ऑन-साइट ऊष्मा उत्पादन और भंडारण सक्षम करता है।
  • औद्योगिक हीट पंप: विद्युत का उपयोग कर ऊष्मा का स्थानांतरण और उन्नयन करते हैं।
    • 3–5 COP के साथ अत्यधिक दक्ष।
    • 150–200°C तक के निम्न-मध्यम तापमान अनुप्रयोगों के लिए उपयुक्त।
  • इंडक्शन हीटिंग: विद्युतचुंबकीय क्षेत्रों का उपयोग कर सामग्री के अंदर सीधे ऊष्मा उत्पन्न करता है।
  • प्लाज़्मा हीटिंग: गैस को आयनीकृत कर अत्यधिक उच्च तापमान उत्पन्न करता है, उच्च तापमान उद्योगों के लिए उपयुक्त।

विद्युतीकरण में चुनौतियाँ

  • ग्रिड तत्परता: औद्योगिक ऊष्मा का विद्युतीकरण बिजली मांग को काफी बढ़ा देगा। औद्योगिक क्लस्टरों में वितरण अवसंरचना पहले से ही दबाव में है।
  • नवीकरणीय ऊर्जा की अस्थिरता: सौर और पवन ऊर्जा अस्थिर हैं, जबकि औद्योगिक प्रक्रियाओं को निरंतर ऊष्मा आपूर्ति चाहिए।
  • भंडारण सीमाएँ: बैटरी और पंप्ड हाइड्रो जैसी ऊर्जा भंडारण अवसंरचना भारत में अभी अपर्याप्त है।
  • उच्च पूंजी लागत: CST प्रणालियाँ और विद्युत भट्ठियाँ उच्च प्रारंभिक निवेश मांगती हैं।

वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाएँ

  • ओमान का मिराह प्रोजेक्ट: CST तकनीक को गैस-आधारित औद्योगिक प्रणालियों के साथ सफलतापूर्वक एकीकृत किया गया।
  • डेनमार्क का हीट परचेज़ एग्रीमेंट: तृतीय-पक्ष प्रदाता ऊष्मा उत्पादन प्रणालियाँ स्थापित, संचालित और बनाए रखते हैं। उद्योग निश्चित और पूर्वानुमेय लागत पर ऊष्मा खरीदते हैं।

आगे की राह

  • भारत को औद्योगिक ऊष्मा डीकार्बोनाइजेशन हेतु राष्ट्रीय तापीय नीति बनानी चाहिए।
  • CST और औद्योगिक हीट पंप जैसी तकनीकों को प्रोत्साहन देने हेतु उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन (PLI), सब्सिडी और त्वरित मूल्यह्रास जैसी वित्तीय सहायता प्रदान करनी चाहिए।
  • ग्रिड आधुनिकीकरण और अवसंरचना उन्नयन आवश्यक है।
  • CST, हीट पंप और बैकअप प्रणालियों को संयोजित कर हाइब्रिड समाधान को बढ़ावा देना चाहिए ताकि औद्योगिक ऊष्मा आपूर्ति विश्वसनीय एवं दक्ष हो सके।

स्रोत: TH

 

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