हरित ऊर्जा गलियारा चरण-III (GEC-III) योजना 

पाठ्यक्रम: GS3/नवीकरणीय ऊर्जा/बुनियादी ढांचा

संदर्भ

  • नवीकरणीय ऊर्जा, विशेषकर सौर और पवन ऊर्जा, ने देश के ऊर्जा मिश्रण में महत्वपूर्ण परिवर्तन किया है, लेकिन इन स्रोतों की परिवर्तनशील प्रकृति ने पारेषण नियोजन और ऊर्जा भंडारण के समक्ष नई चुनौतियाँ उत्पन्न की हैं।

(GEC-III) योजना के बारे में

  • 300 GW से अधिक स्थापित क्षमता के साथ भारत नवीकरणीय ऊर्जा (RE) के परिनियोजन के मामले में विश्व स्तर पर तीसरे स्थान पर है।
    • हालाँकि, इस वृद्धि के बावजूद, विशेष रूप से शाम के समय मांग के चरम पर, हरित ऊर्जा की उपलब्धता सुनिश्चित नहीं हो पाई है।
  • हाल ही में अनुमोदित केंद्र सरकार की हरित ऊर्जा गलियारा चरण-III (GEC-III) योजना इसी बाधा को दूर करने का प्रयास करती है।
  • हरित ऊर्जा गलियारा चरण-III (GEC-III) योजना: इसमें नवीकरणीय ऊर्जा (RE) डेवलपर/उत्पादक के स्तर पर अथवा किसी अन्य महत्वपूर्ण स्थान पर 50 GWh बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणालियों (BESS) की स्थापना का प्रावधान किया गया है।
    • इस योजना के अंतर्गत वित्तीय वर्ष 2032-33 तक अंतर-राज्यीय पारेषण प्रणालियों (InSTS) के विकास के लिए आवश्यक व्यवस्था स्थापित करने का लक्ष्य रखा गया है।
    • ग्रिड में लचीलापन बढ़ने से ऊर्जा की अनिरंतरता, ग्रिड पर भीड़, अधिकतम मांग के घंटों में उत्पादन में कटौती तथा गैर-सौर घंटों की मांग को पूरा करने जैसी चुनौतियों का समाधान किया जा सकेगा।
    • InSTS घटक के अंतर्गत सभी ग्रीनफील्ड परियोजनाओं को टैरिफ-आधारित प्रतिस्पर्धी बोली (TBCB) प्रणाली के माध्यम से लागू किया जाएगा।
  • महत्व: यह योजना वर्ष 2035 तक 900 GW स्थापित गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता के लक्ष्य को प्राप्त करने में सहायता करेगी।
    • इससे अधिकतम मांग वाले घंटों के दौरान ऊर्जा की अनिरंतरता की समस्या का समाधान करने और सूर्य के प्रकाश की अनुपस्थिति में मांग को पूरा करने में सहायता मिलने की उम्मीद है।
    • अंतर-राज्यीय नेटवर्क पर विशेष बल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाएँ प्रायः विशिष्ट क्षेत्रों में केंद्रित होती हैं, जबकि राज्यों के भीतर मांग शहरों, उद्योगों और ग्रामीण क्षेत्रों में व्यापक रूप से फैली होती है।

विद्युत पारेषण(Electricity Transmission)

  • किसी विद्युत संयंत्र में उत्पन्न विद्युत को वितरण नेटवर्क और अंततः उपभोक्ताओं तक पहुँचने से पहले पारेषण लाइनों के माध्यम से भेजा जाता है।
    • मूलभूत शृंखला इस प्रकार है: नवीकरणीय ऊर्जा परियोजना → पारेषण नेटवर्क → वितरण नेटवर्क → उपभोक्ता।
  • भारत की सौर और पवन ऊर्जा क्षमता में तीव्रता से विस्तार हुआ है, लेकिन कुछ नवीकरणीय ऊर्जा-समृद्ध क्षेत्रों में पारेषण अवसंरचना उसी गति से विकसित नहीं हो पाई है।
    • यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत के प्रमुख नवीकरणीय ऊर्जा संसाधन कुछ विशिष्ट क्षेत्रों में केंद्रित हैं।

ग्रिड पारेषण के लिए वर्तमान अवसंरचना

  • जनरल नेटवर्क एक्सेस (GNA) फ्रेमवर्क: यह एक अस्थायी व्यवस्था है, जिसके अंतर्गत नवीकरणीय ऊर्जा संयंत्रों को तब तक उपलब्ध अतिरिक्त पारेषण क्षमता का उपयोग करने की अनुमति दी जाती है, जब तक उन्हें स्थायी पारेषण कनेक्शन प्राप्त नहीं हो जाता।
    • हालाँकि, T-GNA परियोजनाएँ तभी विद्युत का शेड्यूल निर्धारित कर सकती हैं, जब अतिरिक्त पारेषण क्षमता उपलब्ध हो।
  • चिंताएँ: नेटवर्क पर भीड़ की स्थिति के दौरान दीर्घकालिक GNA परियोजनाओं को प्राथमिकता दी जाती है, जिसके परिणामस्वरूप अक्सर T-GNA से जुड़े संयंत्रों के विद्युत उत्पादन में कटौती करनी पड़ती है।
    • इन परियोजनाओं को अपनी उत्पादन क्षमता के 70-80% तक उत्पादन कटौती का सामना करना पड़ सकता है, जिससे परियोजनाओं की व्यवहार्यता और ऋण भुगतान क्षमता को लेकर गंभीर चिंता उत्पन्न होती है।
  • जब ग्रिड उत्पन्न की जा रही पूरी विद्युत को समायोजित करने में सक्षम नहीं होता, तो विद्युत उत्पादन को जानबूझकर कम करना पड़ सकता है। इसे विद्युत उत्पादन में कटौती कहा जाता है।

पारेषण परियोजनाओं में समय लगने का कारण

  • उत्पादन क्षमता की तुलना में पारेषण अवसंरचना का विकास अधिक जटिल और समय लेने वाला होता है।
  • प्रमुख चुनौतियों में शामिल हैं:
    • भूमि अधिग्रहण और राइट ऑफ वे (RoW) से संबंधित मुद्दे।
    • पर्यावरणीय तथा अन्य वैधानिक स्वीकृतियाँ प्राप्त करना।
    • पारेषण लाइनों और सबस्टेशनों के निर्माण में देरी।
    • विशेषीकृत उपकरणों की खरीद।
    • नवीकरणीय ऊर्जा डेवलपर्स, पारेषण कंपनियों और सरकारों के बीच समन्वय।
    • नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं तथा पारेषण अवसंरचना की कमीशनिंग तिथियों में असंगति।
  • इसके कारण ऐसी स्थिति उत्पन्न होती है, जिसमें कोई नवीकरणीय ऊर्जा परियोजना विद्युत उत्पादन के लिए तैयार हो सकती है, जबकि उसकी समर्पित पारेषण प्रणाली अभी निर्माणाधीन हो।

ग्रिड अवसंरचना की आवश्यकता

  • विद्युत उत्पादन में कटौती: अपर्याप्त पारेषण क्षमता नवीकरणीय ऊर्जा संयंत्रों को उत्पादन कम करने के लिए बाध्य कर सकती है, जिससे स्वच्छ विद्युत की बर्बादी होती है।
  • वित्तीय दबाव: उत्पादन में कटौती से नवीकरणीय ऊर्जा डेवलपर्स के राजस्व में कमी आती है, जिससे परियोजना ऋण की अदायगी कठिन हो सकती है और भविष्य के निवेश हतोत्साहित हो सकते हैं।
  • ग्रिड स्थिरता: सौर और पवन ऊर्जा की अनिरंतर प्रकृति तथा अपर्याप्त पारेषण एवं भंडारण क्षमता के संयुक्त प्रभाव से ग्रिड की स्थिरता बनाए रखने और विद्युत की आपूर्ति तथा मांग में संतुलन स्थापित करने में चुनौतियाँ उत्पन्न हो सकती हैं।
  • नवीकरणीय ऊर्जा लक्ष्यों में देरी: पारेषण संबंधी बाधाएँ भारत की तेजी से बढ़ती नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता के प्रभावी उपयोग को धीमा कर सकती हैं, जिससे वर्ष 2030 के स्वच्छ ऊर्जा और जलवायु लक्ष्यों की प्राप्ति प्रभावित हो सकती है।

सरकार की पहल

  • ग्रिड एकीकरण योजना: भारत के ग्रिड को 500 GW के लिए ₹2.4 लाख करोड़ की पारेषण योजना के माध्यम से पुनर्गठित किया जा रहा है, जिसके तहत नवीकरणीय ऊर्जा-समृद्ध राज्यों को मांग केंद्रों से जोड़ा जा रहा है।
    • सरकार ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर तथा राजस्थान, गुजरात और लद्दाख से नई उच्च क्षमता वाली पारेषण लाइनों के माध्यम से पारेषण अवसंरचना में निवेश को प्राथमिकता दे रही है।
    • यद्यपि ये परियोजनाएँ बहुवर्षीय प्रयास हैं, लेकिन इनके परिचालन में आने के बाद 200 GW से अधिक नई नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता को उपयोग में लाने में सहायता मिलेगी।
  • 2032 तक का दृष्टिकोण: सरकार ने पहले ही हाई-वोल्टेज डायरेक्ट करंट (HVDC) कॉरिडोर के निर्माण तथा अंतर-क्षेत्रीय पारेषण क्षमता को वर्तमान 120 GW से बढ़ाकर 2027 तक 143 GW और 2032 तक 168 GW करने की योजना बनाई है।
  • प्रोत्साहन: उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजना, घरेलू सामग्री की आवश्यकता , शुल्कों के अधिरोपण तथा पूंजीगत उपकरणों पर शुल्क छूट के माध्यम से घरेलू विनिर्माण को प्रोत्साहित किया जा रहा है, जिससे आयात पर निर्भरता कम हो रही है।
  • राष्ट्रीय सौर ऊर्जा संस्थान (NISE): यह सौर फोटोवोल्टिक (PV), सौर तापीय और हाइब्रिड प्रौद्योगिकियों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम, कार्यशालाएँ तथा अनुसंधान सहायता प्रदान करता है।
  • राज्य नोडल एजेंसियों (SNAs) के लिए क्षमता निर्माण: परियोजनाओं के कार्यान्वयन, निगरानी और नीतियों के प्रवर्तन के लिए राज्य की नवीकरणीय ऊर्जा एजेंसियों को प्रशिक्षण एवं तकनीकी सहायता प्रदान की जाती है।
  • अनुसंधान एवं नवाचार सहायता: बैटरी भंडारण, हाइब्रिड परियोजनाओं, अपतटीय पवन ऊर्जा और हरित हाइड्रोजन के क्षेत्र में अनुसंधान एवं विकास के लिए वित्तीय सहायता प्रदान की जा रही है।
  • अंतरराष्ट्रीय सहयोग एवं प्रशिक्षण कार्यक्रम: ज्ञान के आदान-प्रदान के लिए अंतरराष्ट्रीय नवीकरणीय ऊर्जा एजेंसी (IRENA), GIZ तथा अन्य वैश्विक एजेंसियों के साथ सहयोग किया जा रहा है।
  • स्मार्ट ग्रिड प्रौद्योगिकियों का परिनियोजन: वोल्टेज स्थिरता बढ़ाने, प्रणाली की सुदृढ़ता में सुधार करने तथा नवीकरणीय ऊर्जा के विश्वसनीय एकीकरण में सहायता के लिए उन्नत ग्रिड सहायता प्रौद्योगिकियों को अपनाने की योजना है।

निष्कर्ष

  • विगत दो वर्षों में नीतिगत ध्यान को केवल क्षमता वृद्धि से हटाकर सचेत रूप से प्रणालीगत संरचना और डिजाइन की ओर स्थानांतरित किया गया है।
  • ये सुधार पारेषण क्षमता के उपयोग को अनुकूलित करने और अटकी हुई नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं को तीव्रता से आगे बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हैं तथा क्षेत्र की प्रमुख कार्यान्वयन संबंधी चुनौतियों में से एक का सीधे समाधान करते हैं।
  • नया गलियारा भारत के हरित ऊर्जा संक्रमण के आगामी चरण की आधारभूत संरचना के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

स्रोत: IE

 

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