पाठ्यक्रम: GS2/अंतर्राष्ट्रीय संबंध
संदर्भ
- हाल ही में भारत और कनाडा ने 1.9 अरब डॉलर मूल्य का 10-वर्षीय यूरेनियम आपूर्ति समझौता किया है तथा 2026 तक व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता (CEPA) को अंतिम रूप देने की प्रतिबद्धता व्यक्त की है।
- यह दोनों देशों द्वारा कई वर्षों की राजनयिक तनातनी के बाद सामरिक विश्वास को पुनः स्थापित करने का प्रयास है।
भारत–कनाडा संबंध
- राजनयिक संबंधों की स्थापना: भारत और कनाडा ने 1947 में, भारत की स्वतंत्रता के तुरंत बाद, राजनयिक संबंध स्थापित किए।
- दोनों देश कॉमनवेल्थ ऑफ नेशन्स के सदस्य हैं, जिसने प्रारंभिक राजनयिक संवाद को आकार दिया।
- कनाडा ने 1947 में नई दिल्ली में अपना उच्चायोग खोला, जबकि भारत ने शीघ्र ही ओटावा में अपना मिशन स्थापित किया।
- प्रारंभिक सहयोग (1950–1970 के दशक): भारत और कनाडा ने विकास तथा परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में घनिष्ठ सहयोग बनाए रखा।
- कनाडा ने भारत के शांतिपूर्ण परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम का समर्थन किया और CIRUS (कनाडा–भारत रिएक्टर, अमेरिका) अनुसंधान रिएक्टर उपलब्ध कराया।
- 1960 के दशक में कनाडा ने राजस्थान परमाणु ऊर्जा परियोजना (RAPP) में रिएक्टर स्थापित करने में सहायता की।
- 1974 के बाद संबंधों में तनाव: भारत द्वारा प्रथम परमाणु परीक्षण (पोखरण-I) करने के बाद संबंध खराब हो गए।
- कनाडा ने आरोप लगाया कि CIRUS रिएक्टर से प्राप्त प्लूटोनियम का उपयोग परीक्षण में हुआ और उसने भारत के साथ परमाणु सहयोग निलंबित कर दिया।
- क्रमिक सामान्यीकरण (2000 के दशक से आगे): 21वीं सदी की शुरुआत में संबंध सुधारने लगे। प्रमुख घटनाक्रम:
- 2008 का भारत–अमेरिका असैन्य परमाणु समझौता और NSG छूट, जिसने भारत को अंतर्राष्ट्रीय परमाणु व्यापार में भाग लेने की अनुमति दी।
- 2010 में भारत और कनाडा ने असैन्य परमाणु सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किए।
- 2015 में कनाडा ने कैमेको कॉर्पोरेशन के माध्यम से भारत को यूरेनियम आपूर्ति करने पर सहमति व्यक्त की।
भारत–कनाडा संबंधों की वर्तमान स्थिति
- यूरेनियम आपूर्ति समझौता (2026): कनाडा की कैमेको कॉर्पोरेशन 2027 से 2035 तक भारत को लगभग 10,000 टन यूरेनियम दीर्घकालिक अनुबंध के अंतर्गत आपूर्ति करेगी, जिसकी अनुमानित कीमत 1.9 अरब डॉलर होगी।
- सामरिक ऊर्जा साझेदारी: भारत और कनाडा ने एक स्ट्रैटेजिक एनर्जी पार्टनरशिप की घोषणा की, जिसमें शामिल हैं:
- यूरेनियम आपूर्ति और परमाणु ऊर्जा सहयोग
- नवीकरणीय ऊर्जा विकास
- तरलीकृत पेट्रोलियम गैस (LPG) सहयोग
- महत्वपूर्ण और उभरती प्रौद्योगिकियों में सहयोग
- साथ ही, कनाडा ने भारत-नेतृत्व वाली दो वैश्विक पहलों – अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) और ग्लोबल बायोफ्यूल एलायंस – में शामिल होने पर सहमति दी।
- व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता (CEPA): भारत और कनाडा ने CEPA वार्ता के लिए संदर्भ की शर्तों पर सहमति व्यक्त की , जिसका लक्ष्य वर्ष के भीतर समझौते को अंतिम रूप देना है।
- अपेक्षित परिणाम: वस्तुओं और सेवाओं के व्यापार का विस्तार, निवेश प्रोत्साहन, आपूर्ति-श्रृंखला सहयोग, और आर्थिक विविधीकरण।
- दोनों देश 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को दोगुना करने का लक्ष्य रखते हैं।
- सुरक्षा सहयोग: संयुक्त वक्तव्य में आतंकवाद-रोधी, हिंसक उग्रवाद का सामना, संगठित अपराध और खुफिया साझाकरण में सहयोग को सुदृढ़ करने की योजना पर बल दिया गया।
- दोनों पक्षों ने आतंकवाद-रोधी संयुक्त कार्य समूह की शीघ्र बैठक बुलाने पर सहमति व्यक्त की।
भारत के लिए महत्व
- परमाणु ईंधन सुरक्षा को सुदृढ़ करना: भारत के असैन्य परमाणु रिएक्टरों के लिए स्थिर ईंधन आपूर्ति सुनिश्चित होती है।
- यह भारत की परमाणु ऊर्जा क्षमता को 9 GW से 2047 तक 100 GW तक बढ़ाने की योजना को समर्थन देता है।
- भारत की ऊर्जा सुरक्षा को सुदृढ़ करता है और निम्न-कार्बन ऊर्जा उत्पादन को प्रोत्साहित करता है।
- यह समझौता ईंधन की कमी या भू-राजनीतिक व्यवधानों से जुड़े जोखिमों को कम करता है।
- यूरेनियम स्रोतों का विविधीकरण: यह समझौता भारत की व्यापक रणनीति का हिस्सा है, जिसके अंतर्गत यूरेनियम आयात को विविध बनाया जा रहा है।
- भारत पहले से ही कज़ाख़स्तान, उज़्बेकिस्तान, रूस से यूरेनियम आयात करता है और अब कनाडा से भी दीर्घकालिक अनुबंध के तहत आयात करेगा।
- भविष्य में भारत ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका से भी यूरेनियम प्राप्त कर सकता है, और भारतीय कंपनियाँ विदेशों में खनन अवसर खोज रही हैं।
- विविधीकरण ऊर्जा सुरक्षा और आपूर्ति लचीलापन बढ़ाता है।
- सामरिक साझेदारी: एक प्रमुख G7 देश के साथ सहयोग को सुदृढ़ करता है।
- आर्थिक लाभ: CEPA के माध्यम से व्यापार, निवेश और प्रौद्योगिकी सहयोग में वृद्धि की संभावना।
- वैश्विक जलवायु लक्ष्य: भारत की निम्न-कार्बन ऊर्जा और नवीकरणीय संक्रमण प्रतिबद्धताओं को समर्थन।
भारत यूरेनियम आयात पर क्यों निर्भर है?
- घरेलू यूरेनियम का निम्न-ग्रेड: यद्यपि भारत के पास यूरेनियम भंडार हैं, परंतु अयस्क की गुणवत्ता अपेक्षाकृत कम है, जिसमें यूरेनियम की मात्रा 0.02% से 0.45% तक होती है, जबकि वैश्विक औसत 1–2% है।
- इसके विपरीत, कनाडा की कुछ खदानों में अयस्क की गुणवत्ता 15% तक होती है, जिससे खनन अत्यधिक किफायती हो जाता है।
- आयात निर्भरता: घरेलू भंडार की निम्न गुणवत्ता के कारण:
- भारत की 70% से अधिक यूरेनियम आवश्यकता आयात से पूरी होती है।
- भारत प्रतिवर्ष लगभग 1,500–2,000 टन यूरेनियम का उपभोग करता है।
- 2025 में आवश्यकता लगभग 1,884 टन थी।
- घरेलू खनन विस्तार के बावजूद, भारत भविष्य की मांग का केवल लगभग 30% ही घरेलू स्तर पर पूरा कर पाएगा।

भारत में घरेलू यूरेनियम उत्पादन
- प्रमुख खनन क्षेत्र: वर्तमान में यूरेनियम खनन मुख्यतः झारखंड और आंध्र प्रदेश में केंद्रित है।
- सात खदानें वर्तमान में संचालित हैं, जिन्हें मुख्यतः यूरेनियम कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (UCIL) प्रबंधित करता है।
- अन्य राज्यों में मेघालय, राजस्थान और तेलंगाना में भी भंडार पाए जाते हैं।
- यूरेनियम भंडार: कुल यूरेनियम अयस्क भंडार: लगभग 4.3 लाख टन।
- UCIL खदानों को आवंटित भंडार: 80,000 टन से अधिक।
- इनमें से लगभग 40% पहले ही निकाले जा चुके हैं, जिससे नए अन्वेषण और विविध आयात की आवश्यकता स्पष्ट होती है।
भारत का तीन-चरणीय परमाणु कार्यक्रम
- चरण 1: प्रेसराइज्ड हेवी वाटर रिएक्टर (PHWRs): प्राकृतिक यूरेनियम को ईंधन के रूप में उपयोग करते हैं और उप-उत्पाद के रूप में प्लूटोनियम उत्पन्न करते हैं।
- भारत के अधिकांश वर्तमान परमाणु रिएक्टर इसी चरण में आते हैं।
- चरण 2: फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (FBRs): प्लूटोनियम-आधारित ईंधन का उपयोग करते हैं और उपभोग से अधिक विखंडनीय पदार्थ उत्पन्न करते हैं।
- भारत का प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) कलपक्कम में संचालन के निकट है।
- चरण 3: थोरियम-आधारित रिएक्टर: थोरियम का उपयोग कर यूरेनियम-233 ईंधन उत्पन्न करते हैं।
- दीर्घकालिक ऊर्जा स्वतंत्रता प्राप्त करने का लक्ष्य।
- भारत के पास विश्व के सबसे बड़े थोरियम भंडारों में से एक है, जिससे यह चरण भविष्य की ऊर्जा सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
आगामी चुनौतियाँ
- खालिस्तानी गतिविधियों और निज्जर मामले से संबंधित राजनयिक तनाव।
- दोनों देशों में घरेलू राजनीतिक दबाव।
- व्यापार वार्ताओं के क्रियान्वयन में चुनौतियाँ।
- तीन-चरणीय परमाणु कार्यक्रम में धीमी प्रगति।
- परमाणु ऊर्जा से संबंधित पर्यावरणीय और सुरक्षा चिंताएँ।
- परमाणु ऊर्जा परियोजनाओं की उच्च लागत।
- सीमित घरेलू यूरेनियम उत्पादन।
निष्कर्ष
- भारत और कनाडा के बीच हाल ही में हुए यूरेनियम आपूर्ति समझौते भारत की महत्वाकांक्षी परमाणु ऊर्जा विस्तार योजनाओं के लिए आवश्यक ईंधन सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
- भारत की दीर्घकालिक रणनीति अपने तीन-चरणीय परमाणु कार्यक्रम के माध्यम से थोरियम-आधारित रिएक्टरों के विकास पर केंद्रित है, जबकि घरेलू भंडार की निम्न गुणवत्ता के कारण आयात प्रमुख भूमिका निभाते रहेंगे।
- यदि यह रणनीति सफलतापूर्वक लागू होती है, तो यह भारत की ऊर्जा सुरक्षा को उल्लेखनीय रूप से बढ़ा सकती है, कार्बन उत्सर्जन को कम कर सकती है, और वैश्विक ऊर्जा परिदृश्य में भारत की सामरिक स्वायत्तता को सुदृढ़ कर सकती है।
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संक्षिप्त समाचार 02-03-2026