भूमि क्षरण और सूखे के स्वास्थ्य पर प्रभाव: UNCCD

पाठ्यक्रम: GS3/पर्यावरण;

संदर्भ

  • हाल ही में संयुक्त राष्ट्र मरुस्थलीकरण से निपटने के लिए गठित कन्वेंशन (UNCCD) ने एक नीति संक्षेप जारी किया, जिसमें भूमि क्षरण और सूखे के गंभीर स्वास्थ्य प्रभावों का विवरण दिया गया है।

भूमि क्षरण और सूखे से स्वास्थ्य संबंधी जोखिम

  • संचारी और गैर-संचारी रोगों में वृद्धि: नीति संक्षेप में पर्यावरणीय तनाव से जुड़े व्यापक स्वास्थ्य प्रभावों को उजागर किया गया है:
    • जलजनित रोग: हैजा, ट्रेकोमा, स्केबीज़, नेत्रशोथ
    • कीटजनित रोग: मलेरिया और अन्य मच्छर जनित संक्रमण
    • श्वसन रोग: धूल भरी आंधियों और वनाग्नि से उत्पन्न
    • हृदय संबंधी रोग: उच्च रक्तचाप, दिल का दौरा, स्ट्रोक
    • पोषण संबंधी विकार: खाद्य असुरक्षा के कारण कुपोषण और बौनापन
  • मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव: सूखे के कारण विस्थापन, संसाधनों की कमी और आर्थिक कठिनाइयाँ उत्पन्न होती हैं, जिससे चिंता एवं अवसाद जैसे मानसिक रोगों में वृद्धि होती है।
    • ऑस्ट्रेलिया में लंबे समय तक चले सूखे के कारण मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित लागत 2050 तक $198 बिलियन तक पहुँचने की संभावना है।

केस स्टडी: भारत, अफ्रीका और अन्य

  • भारत और उप-सहारा अफ्रीका: नीति संक्षेप में 1991–2020 के अरिडिटी इंडेक्स और 2016–2018 के दौरान पाँच वर्ष से कम उम्र के बच्चों में कुपोषण दर की स्थानिक तुलना की गई है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि सूखे एवं बच्चों में बौनापन वाले क्षेत्रों में स्पष्ट ओवरलैप है।                                                                                                                                   
  • जाम्बिया: सूखे के कारण मक्का की कीमतों में वृद्धि हुई, जिससे मातृ पोषण में कमी आई और 6 से 16 सप्ताह के शिशुओं में बौनापन देखा गया।

भारत की संवेदनशीलता

  • भारत ने 2015 से 2019 के बीच 3 करोड़ हेक्टेयर से अधिकउपजाऊ भूमि का क्षरण हुआ।
  • इस अवधि में लगभग 854 मिलियन भारतीयों को सूखे का सामना करना पड़ा।
  • सूखे की तीव्रता और बच्चों में बौनापन के बीच स्थानिक ओवरलैप भूमि क्षरण एवं सार्वजनिक स्वास्थ्य के बीच प्रत्यक्ष संबंध को दर्शाता है।

रोगों के पर्यावरणीय कारक

  • मृदा की खराब गुणवत्ता एंथ्रेक्स सहित कई मृदा-जनित रोगों के फैलाव का कारण बन सकती है।
  • जैव विविधता की हानि और भूमि उपयोग में बदलाव से इबोला एवं कोविड-19 जैसे जूनोटिक रोगों का खतरा बढ़ता है।
  • रोग वाहकों (जैसे मच्छरों) के आवास में परिवर्तन से कीटजनित बीमारियों का प्रसार बढ़ता है।

नीति नवाचार: भारत का किसान संकट सूचकांक (FDI)

  • भारत ने किसान संकट सूचकांक (FDI) शुरू किया है, जिसका उद्देश्य प्रारंभिक पहचान और हस्तक्षेप है। यह उपकरण हितधारकों को तीन माह पहले अलर्ट प्रदान करने की उम्मीद करता है। FDI निम्नलिखित संकेतकों का मूल्यांकन करता है:
    • चरम मौसम के संपर्क में आना
    • वित्तीय तनाव
    • अकेलापन और अवसाद जैसे मानसिक स्वास्थ्य संकेतक

संयुक्त राष्ट्र की सिफारिशें और ‘वन हेल्थ’ दृष्टिकोण

  • नीति संक्षेप ‘वन हेल्थ दृष्टिकोण’ को बढ़ावा देता है, जो पारिस्थितिकी तंत्र, पशु और मानव स्वास्थ्य की परस्पर निर्भरता को मान्यता देता है—जैसा कि UNCCD द्वारा स्वीकार किया गया है। इसमें शामिल हैं:
    • एकीकृत नीति और योजना: पर्यावरण और स्वास्थ्य क्षेत्रों के प्रयासों का समन्वय करें।
      • लिंग समानता और सामुदायिक लचीलापन को प्रोत्साहन दें।
    • अनुसंधान और क्षमता निर्माण: भूमि क्षरण के स्वास्थ्य प्रभावों पर अनुसंधान का विस्तार करें।
      • स्थानीय क्षमताओं को शमन और अनुकूलन के लिए सुदृढ़ करें।
    • वित्तीय तंत्र: भूमि और स्वास्थ्य प्रणाली पुनर्स्थापन के लिए लक्षित वित्त पोषण एकत्रित करे।
      • स्वस्थ भूमि उपयोग को बढ़ावा देने के लिए नवाचारी वित्तीय उपकरणों का समर्थन करें।
    • सतत समाधान: भूमि पुनर्स्थापन, सतत कृषि, प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली और जल प्रबंधन में निवेश करें।

Source: DTE

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