भारत में स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच में वृद्धि 

पाठ्यक्रम: GS2/ स्वास्थ्य

संदर्भ

  • राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) के 80वें दौर के स्वास्थ्य पर घरेलू उपभोग सर्वेक्षण ने देशभर में स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच में उल्लेखनीय वृद्धि को रेखांकित किया है।

सर्वेक्षण के प्रमुख निष्कर्ष

  • आउट-ऑफ-पॉकेट व्यय (OOPE): सार्वजनिक संस्थानों में बाह्य रोगी देखभाल हेतु शून्य OOPE दर्ज किया गया, जो आवश्यक सेवाओं की निःशुल्क उपलब्धता को दर्शाता है।
    • सरकारी अस्पतालों में 50% से अधिक रोगियों का OOPE ₹1,100 से कम रहा।
  • स्वास्थ्य-खोजी व्यवहार का सुदृढ़ीकरण: रोगों की रिपोर्ट करने वाली अनुमानित जनसंख्या (PPRA) में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जो बेहतर स्वास्थ्य जागरूकता और रिपोर्टिंग व्यवहार को दर्शाता है।
    • ग्रामीण क्षेत्रों में PPRA 2017–18 के 6.8% से बढ़कर 2025 में 12.2% हुआ।
    • शहरी क्षेत्रों में यह 9.1% से बढ़कर 14.9% हुआ।
  • मातृ स्वास्थ्य में सुधार:
    • ग्रामीण क्षेत्रों में संस्थागत प्रसव 95.6% तक पहुँचा।
    • शहरी क्षेत्रों में यह 97.8% तक पहुँचा।
  • स्वास्थ्य बीमा कवरेज: सरकारी वित्तपोषित स्वास्थ्य बीमा योजनाओं के अंतर्गत कवरेज में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।
    • ग्रामीण क्षेत्रों में कवरेज 12.9% से बढ़कर 45.5% हुआ।
    • शहरी क्षेत्रों में यह 8.9% से बढ़कर 31.8% हुआ।

भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र की चुनौतियाँ

  • सीमित निदान पहुँच: निदान सुविधाएँ मुख्यतः शहरी क्षेत्रों में केंद्रित हैं, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में प्रारंभिक पहचान सीमित रहती है।
  • अपर्याप्त अवसंरचना: ग्रामीण क्षेत्रों में सुसज्जित अस्पतालों और चिकित्सा संस्थानों की कमी है।
  • सार्वजनिक व्यय में वृद्धि: भारत का स्वास्थ्य व्यय GDP का लगभग 3.8% है, जिसमें OOPE और सार्वजनिक व्यय शामिल हैं।
  • प्रशिक्षित जनशक्ति की कमी: डॉक्टरों, नर्सों, पैरामेडिक्स और प्राथमिक स्वास्थ्यकर्मियों की गंभीर कमी है।
  • डॉक्टर-रोगी अनुपात: भारत में यह मात्र 0.7 डॉक्टर प्रति 1,000 जनसंख्या है, जबकि WHO का औसत 2.5 डॉक्टर प्रति 1,000 जनसंख्या है।

स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच हेतु सरकारी पहल

  • आयुष्मान भारत – प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (PM-JAY): प्रति परिवार प्रति वर्ष ₹5 लाख का स्वास्थ्य कवरेज प्रदान करती है।
    • 70 वर्ष और उससे अधिक आयु के सभी भारतीयों को आय स्तर या सामाजिक-आर्थिक स्थिति की परवाह किए बिना कवरेज मिलता है।
  • सस्ती दवाएँ और निदान:
    • प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना कम लागत वाली जेनेरिक दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करती है।
    • AMRIT फार्मेसियाँ आवश्यक दवाएँ और चिकित्सा उपकरण रियायती दरों पर उपलब्ध कराती हैं।
  • प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान (PMSMA): 2016 में शुरू की गई यह योजना गर्भवती महिलाओं को प्रत्येक माह की 9 तारीख को निःशुल्क और गुणवत्तापूर्ण प्रसवपूर्व देखभाल उपलब्ध कराती है।
  • स्वस्थ भारत पोर्टल: एकीकृत डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म जो विभिन्न राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रमों को एक ही इंटरफ़ेस पर लाता है।
  • ई-संजीवनी: दूरस्थ परामर्श की सुविधा प्रदान करता है और विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में विशेषज्ञों तक पहुँच सुनिश्चित करता है।
  • रोग नियंत्रण और लक्षित कार्यक्रम:
    • राष्ट्रीय क्षय रोग उन्मूलन कार्यक्रम ने पहचान, उपचार कवरेज और क्षय रोग की घटनाओं में कमी लाई है।
    • राष्ट्रीय सिकल सेल एनीमिया उन्मूलन मिशन 2047 तक सिकल सेल रोग को समाप्त करने हेतु स्क्रीनिंग और उपचार पर केंद्रित है।
    • प्रधानमंत्री राष्ट्रीय डायलिसिस कार्यक्रम निःशुल्क डायलिसिस सेवाएँ प्रदान करता है, जिससे OOPE में कमी आती है।

आगे की राह

  • जनशक्ति की कमी दूर करना: ग्रामीण और वंचित क्षेत्रों में प्रशिक्षित डॉक्टरों, नर्सों एवं पैरामेडिक्स की संख्या बढ़ाने हेतु ठोस कदम उठाए जाने चाहिए।
  • डिजिटल स्वास्थ्य का लाभ उठाना: आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन जैसी पहल का विस्तार कर दक्षता, डेटा प्रबंधन और सेवा वितरण में सुधार किया जाना चाहिए।
  • ग्रामीण क्षेत्रों में पहुँच बढ़ाना: अवसंरचना, निदान और विशेषज्ञ सेवाओं को शहरी केंद्रों से आगे बढ़ाकर संतुलित क्षेत्रीय विकास सुनिश्चित करना आवश्यक है।

स्रोत: AIR

 

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