पाठ्यक्रम: GS3/ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी
संदर्भ
- विगत एक दशक में भारत ने एक सुदृढ़ डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र विकसित किया है, जिसने यूपीआई, आधार, डिजिलॉकर, उमंग और भाषिणी जैसे मंचों के माध्यम से प्रौद्योगिकी के साथ दैनिक अंतःक्रियाओं को रूपांतरित कर दिया है।
परिचय
- भारत के डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र, विस्तारित मध्यम वर्ग तथा बढ़ते वाणिज्यिक डिजिटल लेन-देन को देखते हुए, एशिया-प्रशांत क्षेत्र में भारत के सबसे तीव्र गति से विकसित होने वाला क्षेत्रीय बाजार बनने का अनुमान है।
- भारत का अंतःक्रियात्मक प्रौद्योगिकी बाजार वर्ष 2023 में लगभग 1.26 अरब अमेरिकी डॉलर का था, जिसके वर्ष 2030 तक बढ़कर 7.82 अरब अमेरिकी डॉलर होने का अनुमान है। इस अवधि में इसकी चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (CAGR) 29.8% रहने की संभावना है, जो एशिया-प्रशांत क्षेत्र में सर्वाधिक है।
अंतःक्रियात्मक अनुभव प्रदान करने वाली प्रौद्योगिकियाँ क्या हैं?
- अंतःक्रियात्मक अनुभव प्रदान करने वाली प्रौद्योगिकियाँ ऐसी प्रौद्योगिकियाँ हैं, जो एक कृत्रिम अनुभव का निर्माण करती हैं, जिसे उपयोगकर्ता वास्तविक अनुभव के रूप में महसूस कर सकता है।
- इन प्रौद्योगिकियों के तीन सर्वाधिक प्रचलित रूप हैं—आभासी वास्तविकता (VR), संवर्धित वास्तविकता (AR) तथा मिश्रित वास्तविकता (MR)। सामूहिक रूप से इन प्रौद्योगिकियों को विस्तारित वास्तविकता (XR) कहा जाता है।

- 360-डिग्री वीडियो तथा स्पर्श-संवेदी प्रौद्योगिकी भी इस व्यापक प्रौद्योगिकी पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा हैं।
- 360-डिग्री वीडियो उपयोगकर्ताओं को किसी दृश्य को सभी दिशाओं में देखने की सुविधा प्रदान करता है।
अंतःक्रियात्मक प्रौद्योगिकियों के अनुप्रयोग
- शिक्षा: भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) मद्रास ग्रामीण विद्यालयों के लिए संवर्धित वास्तविकता (AR) एवं आभासी वास्तविकता (VR) आधारित शिक्षण व्यवस्था विकसित कर रहा है, जिससे विद्यार्थी केवल प्रयोगशाला के बारे में पढ़ने के बजाय आभासी प्रयोगशाला में स्वयं प्रवेश करने जैसा अनुभव प्राप्त कर सकें।
- विरासत एवं पर्यटन: जतन सॉफ्टवेयर संग्रहालयों के संग्रहों का डिजिटलीकरण करता है। कोलकाता स्थित भारतीय संग्रहालय कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और संवर्धित वास्तविकता की सुविधाओं का उपयोग करता है। इसके अतिरिक्त, हम्पी और नालंदा स्थित भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण (ASI) के संग्रहालय आभासी भ्रमण की सुविधा प्रदान करते हैं।
- शासन: दूरसंचार विभाग (DoT) का ‘संगम: डिजिटल ट्विन’ कार्यक्रम 5G, इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता का समन्वय करता है। इसके उदाहरणों में वाराणसी की त्रि-आयामी शहरी नियोजन व्यवस्था तथा दिल्ली और अयोध्या में उपयोग किया जाने वाला परिवहन डिजिटल ट्विन शामिल हैं। इसके अतिरिक्त, भारत का लक्ष्य वर्ष 2035 तक प्रमुख शहरों के लिए राष्ट्रीय डिजिटल ट्विन विकसित करना है।
- अर्थव्यवस्था: गेमिंग क्षेत्र का बाजार वर्ष 2024 के 3.8 अरब अमेरिकी डॉलर से बढ़कर वित्त वर्ष 2029 तक 9.2 अरब अमेरिकी डॉलर होने का अनुमान है।
अंतःक्रियात्मक प्रौद्योगिकियों के क्षेत्र में भारत सरकार द्वारा उठाए गए कदम
- राष्ट्रीय योगात्मक विनिर्माण रणनीति एवं उभरती प्रौद्योगिकियाँ: यह उन्नत डिजिटल प्रौद्योगिकियों और नवाचार को प्रोत्साहित करती है।
- डिजिटल इंडिया: यह डिजिटल अवसंरचना और प्रौद्योगिकी को अपनाने की प्रक्रिया को समर्थन प्रदान करता है, जिससे विस्तारित वास्तविकता (XR) के अनुप्रयोगों के लिए अवसर उत्पन्न होते हैं।
- स्मार्ट सिटी मिशन: यह शहरी नियोजन, त्रि-आयामी दृश्यांकन तथा अवसंरचना प्रबंधन में अंतःक्रियात्मक प्रौद्योगिकियों के उपयोग को सक्षम बनाता है।
- कौशल भारत मिशन: यह आभासी अनुकरण सहित प्रौद्योगिकी-आधारित व्यावसायिक प्रशिक्षण को समर्थन प्रदान करता है।
- इंडियाएआई मिशन: यह कृत्रिम बुद्धिमत्ता पारिस्थितिकी तंत्र को सुदृढ़ करता है, जो कृत्रिम बुद्धिमत्ता-आधारित अंतःक्रियात्मक अनुप्रयोगों को समर्थन दे सकता है।
- AVGC-XR रूपरेखा: सरकार की व्यापक AVGC-XR रूपरेखा के माध्यम से अंतःक्रियात्मक प्रौद्योगिकी को समर्थन प्रदान किया जाता है।
- सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) द्वारा अप्रैल 2022 में एवीजीसी संवर्धन कार्यबल का गठन किया गया था।
- इस कार्यबल की सिफारिश पर सरकार ने AVGC-XR क्षेत्र के लिए कुशल प्रतिभाओं को विकसित करने हेतु राष्ट्रीय उत्कृष्टता केंद्र (NCoE) की स्थापना की। इसके बाद वर्ष 2025 में भारतीय रचनात्मक प्रौद्योगिकी संस्थान (IICT) की स्थापना की गई।
- जेनेसिस (GENESIS—नवीन पीढ़ी के नवाचारशील स्टार्टअप्स के लिए सहायता): द्वितीय एवं तृतीय श्रेणी के शहरों में स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र को बढ़ावा देने के लिए इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) ने जेनेसिस योजना को मंजूरी दी। इसके अंतर्गत पाँच वर्षों में लगभग 1,600 प्रौद्योगिकी स्टार्टअप्स को सहायता प्रदान की जाएगी।
अंतःक्रियात्मक प्रौद्योगिकियों के उपयोग के लाभ
- बेहतर अधिगम परिणाम: दृश्यांकन और अनुकरण के माध्यम से जटिल विषयों को समझना आसान हो जाता है।
- आर्थिक विकास: इससे गेमिंग, एनिमेशन, आभासी निर्माण तथा अंतःक्रियात्मक सामग्री के क्षेत्र में नए अवसर उत्पन्न होते हैं।
- रोजगार सृजन: यह त्रि-आयामी मॉडलिंग, विस्तारित वास्तविकता डिजाइन, सॉफ्टवेयर विकास तथा डिजिटल कथावाचन जैसे क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर उपलब्ध कराती है।
- विरासत संरक्षण: यह सांस्कृतिक संपत्तियों के डिजिटल दस्तावेजीकरण तथा उन तक व्यापक पहुँच को संभव बनाती है।
- बेहतर शासन: डिजिटल ट्विन शहरी नियोजन, परिवहन विश्लेषण तथा अवसंरचना प्रबंधन में सहायता कर सकते हैं।
- रणनीतिक क्षमता: स्वदेशी विस्तारित वास्तविकता मंचों और उपकरणों का विकास आयातित प्रौद्योगिकियों पर निर्भरता कम कर सकता है।
चुनौतियाँ
- उच्च लागत एवं आयात पर अत्यधिक निर्भरता: हेडसेट और ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट (GPU) महँगे हैं तथा अधिकांशतः आयात किए जाते हैं। इससे अनेक विद्यालयों और छोटे स्टार्टअप्स के लिए इनका उपयोग कठिन हो जाता है।
- असमान संपर्क सुविधा: वास्तविक समय में आभासी वास्तविकता और डिजिटल ट्विन के संचालन के लिए तीव्र गति वाले तथा कम विलंबता वाले नेटवर्क की आवश्यकता होती है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी नेटवर्क कवरेज पर्याप्त नहीं है।
- कुशल मानव संसाधन की कमी: गेम इंजन, स्थानिक ध्वनि तथा कंप्यूटर विजन के क्षेत्र में कुशल प्रशिक्षकों की संख्या अपर्याप्त है।
- स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ: लंबे समय तक इन प्रौद्योगिकियों का उपयोग करने से आँखों में तनाव और गति-जनित चक्कर जैसी समस्याएँ हो सकती हैं। बच्चे विशेष रूप से इनके प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं।
- निजता संबंधी जोखिम: विस्तारित वास्तविकता उपकरण आँखों की गतिविधियों, जैवमितीय आँकड़ों तथा यहाँ तक कि उपयोगकर्ता के कमरे के मानचित्र को भी दर्ज कर सकते हैं। पर्याप्त सुरक्षा उपायों के अभाव में ऐसे संवेदनशील व्यक्तिगत आँकड़ों के दुरुपयोग का जोखिम रहता है।
आगे की राह
- प्रदर्शन उपकरणों, संवेदकों तथा लेंसों के घरेलू विनिर्माण को प्रोत्साहित करना चाहिए। इसके लिए उत्पादन-संबद्ध प्रोत्साहन (PLI) जैसी प्रोत्साहन योजना एक सुझाव है, न कि घोषित योजना।
- विस्तारित वास्तविकता से संबंधित कौशलों को औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों (ITIs), पॉलिटेक्निक संस्थानों तथा अभियांत्रिकी महाविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में शामिल करना चाहिए।
- भारतीय विरासत से संबंधित त्रि-आयामी डिजिटल सामग्री का एक सार्वजनिक संग्रह विकसित करना चाहिए, ताकि रचनाकारों को प्रत्येक बार शुरुआत से सामग्री तैयार न करनी पड़े।
- डिजिटल व्यक्तिगत आँकड़ा संरक्षण अधिनियम (DPDP Act) के अनुरूप बच्चों की सुरक्षा तथा आँकड़ा संरक्षण संबंधी मानक प्रारंभिक चरण में ही निर्धारित किए जाने चाहिए।
- ग्रामीण क्षेत्रों और भारतीय भाषाओं के उपयोगकर्ताओं को केंद्र में रखकर नीतियाँ बनाई जानी चाहिए, ताकि अंतःक्रियात्मक प्रौद्योगिकियाँ डिजिटल विभाजन को और अधिक व्यापक न बनाएँ।
स्रोत: PIB