पाठ्यक्रम: GS3/कृषि
संदर्भ
- केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री ने हरियाणा के करनाल में रबी अभियान “खेत बचाओ अभियान” का शुभारंभ किया।
- इस अभियान का मुख्य उद्देश्य रासायनिक उर्वरकों के असंतुलित उपयोग को सुधारना है, जो मृदा एवं भूजल को हानि पहुँचा रहा है तथा वायु प्रदूषण का कारण बन रहा है।
भारतीय अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संबंध अनुसंधान परिषद (ICRIER) का हालिया नीतिगत संक्षिप्त विवरण
- इस अध्ययन में वर्ष 2009-10 से 2024-25 के बीच 20 प्रमुख राज्यों में पोषक तत्त्वों के वास्तविक उपयोग की तुलना फसल एवं सिंचाई-विशिष्ट निर्धारित मानकों से की गई।
- NPK अनुपात: भारत में नाइट्रोजन : फॉस्फोरस : पोटैशियम (N:P) का अनुपात 10.5:4.1:1 है, जबकि निर्धारित मानक अनुपात 2.8:1.5:1 है।
- NPK से तात्पर्य पौधों की वृद्धि के लिए आवश्यक तीन प्रमुख पोषक तत्त्वों से है—नाइट्रोजन (N), फॉस्फोरस (P) और पोटैशियम (K)।
- नाइट्रोजन का उपयोग: राष्ट्रीय स्तर पर नाइट्रोजन का उपयोग निर्धारित मात्रा से 7% कम होने की स्थिति से बढ़कर निर्धारित मात्रा से 6% अधिक हो गया है।
- 20 प्रमुख राज्यों में से 11 राज्यों में नाइट्रोजन का अत्यधिक उपयोग किया जा रहा है। इनमें झारखंड (72%) और पंजाब (65%) प्रमुख हैं।
- कुल NPK उपयोग में नाइट्रोजन की हिस्सेदारी पुनः लगभग 67% हो गई है, जो वर्ष 1970-71 के स्तर के समान है।
- फॉस्फोरस एवं पोटैशियम: फॉस्फोरस की कमी केवल 29% से घटकर 22% हुई है, जबकि पोटैशियम की कमी 48% से बढ़कर 72% हो गई है। किसानों द्वारा प्रति हेक्टेयर केवल 9 किलोग्राम पोटाश का उपयोग किया जाता है, जबकि आवश्यकता 32 किलोग्राम है।
- सभी राज्यों में पोटाश का उपयोग आवश्यक मात्रा से कम है। हरियाणा और झारखंड में इसका उपयोग फसलों की आवश्यकता के लगभग दसवें हिस्से तक सीमित है।
नाइट्रोजन के अत्यधिक उपयोग के कारण
- पोषक तत्त्व आधारित सब्सिडी (NBS) योजना: इस योजना के अंतर्गत फॉस्फेटिक एवं पोटाशिक उर्वरकों की कीमतों को वैश्विक बाजार के अनुरूप निर्धारित होने दिया गया, जबकि यूरिया को इससे बाहर रखते हुए उसकी कीमत स्थिर रखी गई।
- वर्ष 2010-11 से 2024-25 के बीच डाइ-अमोनियम फॉस्फेट (DAP) की कीमत लगभग तीन गुना बढ़कर ₹54 प्रति किलोग्राम हो गई तथा म्यूरेट ऑफ पोटाश (MOP) की कीमत छह गुना बढ़कर ₹52 प्रति किलोग्राम हो गई। इसके विपरीत, यूरिया में नाइट्रोजन की कीमत में केवल 1% की वृद्धि हुई। किसान इन सापेक्षिक कीमतों के आधार पर उर्वरकों के उपयोग संबंधी निर्णय लेते हैं।
- नाइट्रोजन के उपयोग से फसल हरी-भरी दिखाई देती है, जबकि पोटाश की कमी से होने वाली क्षति बाद में सामने आती है और प्रायः तत्काल दिखाई नहीं देती।
चिंताएँ
- उच्च राजकोषीय भार: यूरिया पर भारी सब्सिडी के कारण सरकार का उर्वरक सब्सिडी व्यय बढ़ता है तथा सार्वजनिक वित्त पर दबाव पड़ता है।
- उर्वरकों की खपत में असंतुलन: फॉस्फेटिक एवं पोटाशिक उर्वरकों की तुलना में यूरिया (नाइट्रोजन) का अत्यधिक उपयोग N:P अनुपात को असंतुलित करता है, जिससे मृदा की उत्पादकता घटती है।
- नाइट्रोजन उपयोग दक्षता (NUE) में कमी: उपयोग किए गए यूरिया का केवल एक हिस्सा ही फसलें ग्रहण कर पाती हैं। शेष नाइट्रोजन वाष्पीकरण, निक्षालन तथा विनाइट्रीकरण की प्रक्रियाओं के माध्यम से नष्ट हो जाती है।
- मृदा क्षरण: उर्वरकों के निरंतर अत्यधिक उपयोग से मृदा का अम्लीकरण, सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की कमी तथा दीर्घकाल में उर्वरता में गिरावट आती है।
- पर्यावरणीय प्रदूषण: नाइट्रेट के बहाव से जल प्रदूषण एवं सुपोषण की समस्या उत्पन्न होती है। इसके अतिरिक्त, नाइट्रस ऑक्साइड (N₂O) का उत्सर्जन होता है, जो एक शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस है।
- आयात पर निर्भरता एवं बाह्य जोखिम: आयातित यूरिया और प्राकृतिक गैस पर निर्भरता भारत को वैश्विक कीमतों में उतार-चढ़ाव तथा आपूर्ति में व्यवधान के प्रति संवेदनशील बनाती है।
सरकारी पहलें
- नीम-लेपित यूरिया (NCU): नाइट्रोजन की हानि कम करने, उपयोग दक्षता बढ़ाने तथा यूरिया के गैर-कृषि उपयोग की ओर अवैध रूपांतरण को रोकने के लिए यूरिया पर नीम का लेप अनिवार्य किया गया है।
- पोषक तत्त्व आधारित सब्सिडी (NBS) योजना: यह योजना फॉस्फेटिक एवं पोटाशिक उर्वरकों पर सब्सिडी प्रदान करके N:P के संतुलित उपयोग को प्रोत्साहित करती है तथा यूरिया पर अत्यधिक निर्भरता कम करने का प्रयास करती है।
- उर्वरकों में प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT): किसानों को उर्वरक की बिक्री के बाद सब्सिडी की राशि संबंधित कंपनियों को हस्तांतरित की जाती है। इससे पारदर्शिता बढ़ती है तथा सब्सिडी के दुरुपयोग और अवैध रूपांतरण की संभावना कम होती है।
- नैनो यूरिया को प्रोत्साहन: भारतीय किसान उर्वरक सहकारी लिमिटेड (IFFCO) द्वारा विकसित नैनो यूरिया का उद्देश्य फसल की उपज बनाए रखते हुए पारंपरिक यूरिया की आवश्यकता कम करना है।
- मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना: इस योजना के अंतर्गत किसानों को मृदा में उपस्थित पोषक तत्त्वों की स्थिति संबंधी जानकारी दी जाती है, जिससे विवेकपूर्ण एवं आवश्यकता-आधारित उर्वरक उपयोग को प्रोत्साहन मिलता है।
अनुशंसाएँ
- प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) की ओर संक्रमण: आगत-आधारित सब्सिडी के स्थान पर प्रति हेक्टेयर प्रत्यक्ष अंतरण की व्यवस्था अपनाई जानी चाहिए, जो विभिन्न पोषक तत्त्वों और फसलों के संदर्भ में तटस्थ हो।
- यूरिया को धीरे-धीरे पोषक तत्त्व आधारित सब्सिडी (NBS) व्यवस्था के अंतर्गत लाया जाना चाहिए, ताकि इसकी कीमत संबंधी कृत्रिम बढ़त कम हो और उर्वरकों के संतुलित उपयोग को प्रोत्साहन मिले।
- PM-PRANAM को सुदृढ़ बनाना: रासायनिक उर्वरकों की अत्यधिक खपत कम करने वाले राज्यों को प्रोत्साहित करने के लिए धरती माता के पुनरुद्धार, जागरूकता, पोषण एवं सुधार हेतु प्रधानमंत्री कार्यक्रम (PM-PRANAM) के कार्यान्वयन में तीव्रता लाई जानी चाहिए।
- सतत प्रौद्योगिकियों को प्रोत्साहन: उर्वरक सब्सिडी में होने वाली बचत को ड्रिप सिंचाई, अनुकूलित एवं लेपित उर्वरकों, जैव उर्वरकों, नैनो उर्वरकों तथा नाइट्रोजन का कुशल उपयोग करने वाले बीजों के विकास और प्रसार में लगाया जाना चाहिए।
- 4R सिद्धांत अपनाना: मृदा परीक्षण एवं खेत-विशिष्ट सिफारिशों के माध्यम से उर्वरक के सही स्रोत , सही मात्रा , सही समय तथा सही स्थान पर उपयोग को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। दलहनी फसलों के साथ फसल चक्र अपनाने से अगली फसलों के लिए नाइट्रोजन की आवश्यकता भी कम हो सकती है।
निष्कर्ष
- भारत को उर्वरकों की कुल खपत पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय पोषक तत्त्वों की संतुलित आपूर्ति पर बल देना चाहिए।
- सब्सिडी का युक्तिसंगत निर्धारण, सतत कृषि पद्धतियों को प्रोत्साहन तथा राज्यों को उचित प्रोत्साहन प्रदान करने से मृदा स्वास्थ्य की रक्षा करते हुए दीर्घकालिक खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है।
| दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न [प्रश्न]: संतुलित पोषक तत्त्वों के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए अनेक नीतिगत प्रयासों के बावजूद, भारत में उर्वरकों का उपयोग अब भी मुख्यतः नाइट्रोजन की ओर अत्यधिक झुका हुआ है। इसके कृषि-विज्ञान संबंधी, राजकोषीय एवं पर्यावरणीय परिणामों की विवेचना कीजिए तथा इस असंतुलन को दूर करने के लिए सुधारात्मक उपाय सुझाइए। |
स्रोत: IE
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