भारत–इज़राइल द्वारा द्विपक्षीय संबंधों और पश्चिम एशिया की स्थिति पर चर्चा 

पाठ्यक्रम: GS2/अंतरराष्ट्रीय संबंध

संदर्भ

  • प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने टेलीफोन पर वार्ता के दौरान भारत–इज़राइल संबंधों तथा पश्चिम एशिया की स्थिति पर चर्चा की।
    • इज़राइल के प्रधानमंत्री ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय पायलट कैप्टन स्मित मच्छार को इज़राइल के स्वतंत्रता दिवस पर संयुक्त रूप से मशाल प्रज्वलित करने के लिए आमंत्रित किया।

भारत–इज़राइल द्विपक्षीय संबंध एवं उभरते आयाम

  • द्विपक्षीय संबंध: भारत ने वर्ष 1950 में इज़राइल को मान्यता देने की घोषणा की। वर्ष 1992 में दोनों देशों के बीच पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित हुए और नियमित रूप से दूतावास खोले गए।
    • वर्ष 2017 में दोनों देशों ने अपने संबंधों को रणनीतिक साझेदारी के स्तर तक उन्नत किया।
    • वर्ष 2022–23 में दोनों देशों ने द्विपक्षीय संबंधों को पूर्ण राजनयिक संबंधों के स्तर तक उन्नत किए जाने के 30 वर्ष पूरे होने का संयुक्त रूप से उत्सव मनाया।
  • रक्षा एवं सुरक्षा: इज़राइल भारत को उन्नत प्रौद्योगिकियों का एक प्रमुख आपूर्तिकर्ता रहा है। इसमें एयरबोर्न वार्निंग एंड कंट्रोल सिस्टम (AWACS) रडार, ड्रोन, मिसाइल प्रणालियाँ और निगरानी प्रणालियाँ शामिल हैं। इसके परिणामस्वरूप इज़राइल भारत के सबसे बड़े रक्षा आपूर्तिकर्ताओं में से एक बन गया है।
  • द्विपक्षीय व्यापार: भारत एशिया में इज़राइल का दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार तथा विश्व स्तर पर सातवाँ सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है।
    • वित्त वर्ष 2023–24 और 2024–25 में रक्षा व्यापार को छोड़कर दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार क्रमशः 6.53 अरब अमेरिकी डॉलर एवं 3.75 अरब अमेरिकी डॉलर रहा।
  • निवेश: अप्रैल 2000 से मार्च 2024 के दौरान भारत में इज़राइल का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) 334.2 मिलियन अमेरिकी डॉलर रहा।
    • भारत में इज़राइल के 300 से अधिक निवेश हैं, जो मुख्यतः उच्च प्रौद्योगिकी, कृषि और जल क्षेत्र में केंद्रित हैं।
    • वर्ष 2025 में भारत और इज़राइल ने द्विपक्षीय निवेश समझौते (BIA) पर हस्ताक्षर किए। इस समझौते ने वर्ष 1996 में हस्ताक्षरित पूर्ववर्ती निवेश संधि का स्थान लिया। भारत की ऐसी संधियों से संबंधित नीतिगत समीक्षा के अंतर्गत वर्ष 2017 में पुरानी संधि को समाप्त कर दिया गया था।
  • कृषि एवं जल प्रबंधन:
    • 1993: कृषि क्षेत्र में सहयोग के लिए प्रथम समझौते पर हस्ताक्षर किए गए।
    • 2006: कृषि क्षेत्र में व्यापक कार्ययोजना प्रारंभ की गई, जिसे तीन वर्षीय चक्रों में लागू किया जाता है। इसका कार्यान्वयन इज़राइल की अंतरराष्ट्रीय विकास सहयोग एजेंसी MASHAV के माध्यम से किया जाता है।
    • 2025: कृषि सहयोग समझौते को संशोधित रूप में हस्ताक्षरित किया गया, जिससे साझेदारी के क्षेत्रों का विस्तार हुआ।
    • भारत–इज़राइल उत्कृष्टता केंद्र (CoE) बागवानी के क्षेत्र में इज़राइल की विशेषज्ञता, प्रौद्योगिकियों और नवाचारों को प्रदर्शित करते हैं।
  • विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, आतंकवाद-रोधी सहयोग और नवाचार: विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी (S&T) के क्षेत्र में भारत–इज़राइल सहयोग की निगरानी संयुक्त विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी समिति करती है। इसकी स्थापना वर्ष 1993 में हस्ताक्षरित विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी सहयोग समझौते के अंतर्गत की गई थी।
    • संयुक्त परियोजनाओं को प्रोत्साहित करने के लिए 40 मिलियन अमेरिकी डॉलर का भारत–इज़राइल औद्योगिक अनुसंधान एवं विकास तथा तकनीकी नवाचार कोष (I4F) भी स्थापित किया गया।
  • बहुपक्षीय सहयोग: दोनों देश I2U2 समूह (भारत, इज़राइल, अमेरिका और संयुक्त अरब अमीरात) के सक्रिय सदस्य हैं। यह समूह आर्थिक एवं अंतरिक्ष सहयोग पर केंद्रित है। इसके अंतर्गत खाद्य पार्कों और अंतरिक्ष-आधारित पर्यावरणीय उपकरणों जैसी परियोजनाओं को बढ़ावा दिया जाता है।

भारत के लिए महत्त्व

  • रक्षा एवं सुरक्षा: इज़राइल भारत के लिए महत्त्वपूर्ण रक्षा प्रौद्योगिकियों का एक विश्वसनीय साझेदार है। यह भारत की आत्मनिर्भरता तथा ‘मेक इन इंडिया’ पहल को सशक्त बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
  • कृषि एवं जल प्रबंधन: इज़राइल नवाचार, जल संरक्षण और उच्च उत्पादकता वाली कृषि पद्धतियों के लिए जाना जाता है। भारत द्विपक्षीय सहयोग के माध्यम से इन प्रौद्योगिकियों को अपनाकर कृषि उत्पादकता बढ़ा सकता है तथा जल संसाधनों का अधिक कुशल उपयोग कर सकता है।
  • भू-राजनीति: पश्चिम एशिया में इज़राइल भारत का एक महत्त्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार है। यह भारत की ‘एक्ट वेस्ट’ नीति को पूरक सहयोग प्रदान करता है।

पश्चिम एशिया

  • पश्चिम एशिया एशिया का सबसे पश्चिमी उपक्षेत्र है। इसमें व्यापक रूप से निम्नलिखित देश शामिल हैं:
    • अरब प्रायद्वीप: सऊदी अरब, यमन, ओमान, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), कतर, बहरीन और कुवैत।
    • लेवेंट क्षेत्र: जॉर्डन, लेबनान, सीरिया, इज़राइल और फिलिस्तीन।
    • अन्य प्रमुख देश: इराक, ईरान और तुर्किये।
    • व्यापक भौगोलिक परिभाषा में शामिल अन्य क्षेत्र: भौगोलिक वर्गीकरण के आधार पर साइप्रस तथा दक्षिण काकेशस के कुछ हिस्सों को भी इसमें शामिल किया जाता है।
  • ‘पश्चिम एशिया’ और ‘मध्य पूर्व’ शब्दों का प्रायः एक-दूसरे के स्थान पर उपयोग किया जाता है, हालाँकि इनकी सटीक भौगोलिक सीमाओं में अंतर हो सकता है।
  • यह क्षेत्र रणनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। इसके पश्चिम में अफ्रीका और उत्तर में यूरोप स्थित हैं। इसके आसपास भूमध्य सागर, फारस की खाड़ी और कैस्पियन सागर जैसे महत्त्वपूर्ण जल निकाय स्थित हैं।

पश्चिम एशिया में संकट का भारत पर प्रभाव

  • भारत की ऊर्जा सुरक्षा: पश्चिम एशिया में संघर्ष भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए प्रत्यक्ष खतरा उत्पन्न करता है, क्योंकि भारत के कच्चे तेल के आयात का एक बड़ा हिस्सा खाड़ी क्षेत्र से आता है।
    • वैश्विक तेल कीमतों में वृद्धि से भारत का आयात बिल बढ़ता है, चालू खाता घाटा (CAD) बढ़ सकता है तथा घरेलू अर्थव्यवस्था में मुद्रास्फीति का दबाव उत्पन्न हो सकता है।
  • भारतीय प्रवासी समुदाय: खाड़ी देशों में लाखों भारतीय कामगार रहते हैं। इसलिए क्षेत्रीय संघर्ष के दौरान उनकी सुरक्षा भारत के लिए एक प्रमुख चिंता का विषय बन जाती है।
  • प्रेषण: भारत के लगभग एक करोड़ प्रवासी विदेशों में रहते हैं। वे प्रेषण, रियल एस्टेट, शेयर बाजार और अन्य माध्यमों से भारतीय अर्थव्यवस्था में अरबों डॉलर का योगदान करते हैं। युद्ध इन आर्थिक प्रवाहों और निवेश गतिविधियों को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है।
  • निवेश: संयुक्त अरब अमीरात का गोल्डन वीज़ा कार्यक्रम भारत के नए दौर के प्रौद्योगिकी उद्यमियों, स्टार्टअप संस्थापकों तथा करोड़पतियों और अरबपतियों को आकर्षित करने में सफल रहा है। इनमें से अनेक लोग दुबई में रहते हैं तथा भारत में अपने व्यवसाय संचालित करते हैं।
    • पश्चिम एशिया में युद्ध इन निवेशों और व्यावसायिक गतिविधियों को प्रभावित कर सकता है। इससे बड़े ब्रांडों के बाजार मूल्य तथा व्यापक निवेश गतिविधियों पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका है।

आगे की राह

  • भारत–इज़राइल संबंध रक्षा, कृषि, जल प्रबंधन, नवाचार और व्यापार सहित अनेक क्षेत्रों में विस्तृत एक महत्त्वपूर्ण रणनीतिक साझेदारी हैं।
  • रक्षा और कृषि इस साझेदारी के सबसे सुदृढ़ स्तंभ बने हुए हैं, जबकि खाद्य सुरक्षा, स्टार्टअप और I2U2 के माध्यम से बहुपक्षीय सहयोग जैसे नए क्षेत्रों में भी साझेदारी का विस्तार हो रहा है।

स्रोत: TH

 

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