पाठ्यक्रम: GS3/सतत विकास/विज्ञान और प्रौद्योगिकी
संदर्भ
- नमामि गंगे कार्यक्रम के अंतर्गत अपशिष्ट जल के उपचार के लिए विभिन्न तकनीकी दृष्टिकोण अपनाए जा रहे हैं। इनमें अवसंरचना का विकास, विविध प्रौद्योगिकियों का उपयोग, विकेंद्रीकृत समाधान, पुनर्वास तथा दीर्घकालिक संचालन शामिल हैं।
नमामि गंगे कार्यक्रम (NGP)
- नमामि गंगे कार्यक्रम (NGP) का शुभारंभ वर्ष 2014 में किया गया था।
- यह एक एकीकृत संरक्षण मिशन है, जिसके दो प्रमुख उद्देश्य हैं—प्रदूषण में प्रभावी कमी लाना तथा राष्ट्रीय नदी गंगा का संरक्षण और पुनरुद्धार करना।
- नमामि गंगे कार्यक्रम के प्रमुख स्तंभ निम्नलिखित हैं:
- मलजल उपचार अवसंरचना
- नदी तट का विकास
- नदी की सतह की सफाई
- जैव विविधता संरक्षण
- वनीकरण
- जन-जागरूकता
- औद्योगिक अपशिष्ट जल की निगरानी
- गंगा ग्राम
अभी तक हुई प्रगति

तकनीकी दृष्टिकोणों की आवश्यकता
- बड़े शहर: भूमिगत सीवर नेटवर्क के माध्यम से एकत्रित अपशिष्ट जल का उपचार केंद्रीकृत मलजल उपचार संयंत्रों (STPs) में किया जाता है।
- छोटे शहर और गाँव: जहाँ संपूर्ण सीवर नेटवर्क उपलब्ध नहीं हैं, वहाँ विकेंद्रीकृत उपचार प्रणालियाँ उपयोगी होती हैं।
- पर्वतीय क्षेत्र: दुर्गम भूभाग, कम तापमान और सीमित पहुँच के कारण यहाँ कॉम्पैक्ट प्रौद्योगिकियों की आवश्यकता होती है।
- भूमि की कमी वाले क्षेत्र: बहुमंजिला मलजल उपचार संयंत्र और कॉम्पैक्ट उपचार प्रौद्योगिकियाँ भूमि की आवश्यकता को कम करती हैं।
- सततता: ऊर्जा-कुशल प्रौद्योगिकियाँ, नवीकरणीय ऊर्जा और पंक प्रबंधन परिचालन लागत तथा पर्यावरणीय प्रभाव को कम करने में सहायता करते हैं।
मलजल उपचार की प्रमुख प्रौद्योगिकियाँ
- फूड चेन रिएक्टर (FCR) प्रौद्योगिकी: यह स्थिर कृत्रिम माध्यमों और पौधों की जड़ों को सम्मिलित करके सक्रिय पंक प्रक्रिया तथा अनुक्रमिक बैच रिएक्टर की कार्यक्षमता में सुधार करती है।
- सक्रिय पंक प्रक्रिया : सक्रिय पंक सूक्ष्मजीवों का वह समूह है, जिसे उपचार प्रक्रिया के दौरान विकसित किया जाता है। ये सूक्ष्मजीव कार्बनिक पदार्थों को तोड़कर कार्बन डाइऑक्साइड, जल और अन्य अकार्बनिक यौगिकों में परिवर्तित करते हैं।
- अनुक्रमिक बैच रिएक्टर (SBR): यह सक्रिय पंक पर आधारित एक चक्रीय उपचार प्रक्रिया है, जो एकल-चरणीय जैविक प्रक्रिया में उच्चतम संभव उपचार दक्षता प्रदान करती है।
- विद्युत् स्कंदन एवं विद्युत् ऑक्सीकरण : यह एक गैर-जैविक उपचार प्रक्रिया है, जिसमें विद्युत धारा और स्कंदक धातु के एनोड का उपयोग करके निलंबित तथा पायसीकृत प्रदूषकों को अस्थिर किया जाता है।
- ये प्रणालियाँ कम तापमान, पर्वतीय भूभाग और सीमित पहुँच वाले स्थानों के लिए उपयुक्त हैं।
- उत्तराखंड में बद्रीनाथ और चमोली जैसे स्थानों पर ऐसी प्रणालियाँ लागू की गई हैं।
- निर्मित आर्द्रभूमियाँ (CWs): ये अभियांत्रिक रूप से विकसित प्रणालियाँ हैं, जो नियंत्रित परिस्थितियों में प्रदूषकों को हटाने के लिए प्राकृतिक प्रक्रियाओं का उपयोग करती हैं।
- एक निर्मित आर्द्रभूमि प्रणाली में जल, पौधे, संवर्धन माध्यम (सब्सट्रेट), मृदा और सूक्ष्मजीव शामिल होते हैं।
- नेरेडा (NEREDA): यह अपशिष्ट जल उपचार की एक अन्य जैविक प्रौद्योगिकी है। इसमें पारंपरिक सक्रिय पंक प्रक्रिया के समान बैक्टीरिया का उपयोग किया जाता है, लेकिन ये सघन वायवीय कणिकाएँ बनाते हैं, जिनमें अवसादन के अच्छे गुण होते हैं।
- मृदा जैव-प्रौद्योगिकी : यह अवसादन और अंतःस्रवण जैसी भौतिक प्रक्रियाओं को जैव-रासायनिक प्रक्रियाओं के साथ संयोजित करती है।
- इस प्रणाली के प्रमुख घटकों में उपयुक्त खनिज संरचना, स्थानीय सूक्ष्मजीव समुदाय और जैव-संकेतक पौधे शामिल होते हैं।
कार्यक्रम के अंतर्गत संसाधनों की पुनर्प्राप्ति
- बायोगैस उत्पादन: अवायवीय पाचन की प्रक्रिया में ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में कार्बनिक पदार्थों का विघटन होता है, जिससे बायोगैस उत्पन्न होती है। इस गैस का उपयोग विद्युत उत्पादन के लिए किया जा सकता है।
- वाराणसी स्थित 140 मिलियन लीटर प्रतिदिन (MLD) क्षमता वाले दीनापुर मलजल उपचार संयंत्र में बायोगैस आधारित विद्युत उत्पादन से वास्तविक मासिक विद्युत खपत का लगभग 52–72% पूरा होने की सूचना है।
- सौर ऊर्जा: सौर ऊर्जा संयंत्रों की स्थापना से मलजल उपचार संयंत्रों की पारंपरिक विद्युत पर निर्भरता कम करने में सहायता मिलती है।
- पंक का भस्मीकरण : तापीय उपचार से पंक की मात्रा कम की जा सकती है। इससे प्राप्त स्थिर राख का उपयोग उपयुक्तता और लागू मानकों के अधीन ईंटों या कंक्रीट जैसे उत्पादों में किया जा सकता है।
- उपचारित जल का पुनः उपयोग: उचित रूप से उपचारित अपशिष्ट जल का उपयुक्त कार्यों के लिए पुनः उपयोग किया जा सकता है, जिससे स्वच्छ जल के संसाधनों पर दबाव कम होता है।
प्रौद्योगिकी-तटस्थ दृष्टिकोण का महत्त्व
- स्थान-विशिष्ट समाधान: स्थानीय भूगोल, जनसंख्या और उपलब्ध अवसंरचना के अनुसार विभिन्न प्रौद्योगिकियों का चयन किया जा सकता है।
- लागत में कमी: उपयुक्त स्थानों पर कॉम्पैक्ट और विकेंद्रीकृत प्रणालियाँ महँगे सीवर नेटवर्क की आवश्यकता को समाप्त कर सकती हैं तथा भूमि की आवश्यकता कम कर सकती हैं।
- नदी के स्वास्थ्य में सुधार: प्रभावी मलजल उपचार से कार्बनिक प्रदूषण कम होता है और जल में घुलित ऑक्सीजन का स्तर सुधारने में सहायता मिलती है।
- ऊर्जा दक्षता: बायोगैस, सौर ऊर्जा और ऊर्जा-कुशल उपचार प्रक्रियाएँ परिचालन के लिए आवश्यक ऊर्जा की मात्रा को कम करती हैं।
- चक्रीय अर्थव्यवस्था : पुनः उपयोग, ऊर्जा पुनर्प्राप्ति और उपयुक्त सामग्री पुनर्प्राप्ति के माध्यम से अपशिष्ट जल तथा पंक को उपयोगी संसाधनों में परिवर्तित किया जा सकता है।
निष्कर्ष
- नमामि गंगे कार्यक्रम यह दर्शाता है कि नदी का पुनरुद्धार केवल मलजल उपचार संयंत्रों के निर्माण तक सीमित नहीं है।
- गंगा बेसिन में प्रदूषण कम करने और अपशिष्ट जल का सतत प्रबंधन सुनिश्चित करने के लिए पारंपरिक प्रौद्योगिकियों, विकेंद्रीकृत प्रणालियों, प्रकृति-आधारित समाधानों तथा ऊर्जा पुनर्प्राप्ति के संयोजन की आवश्यकता है।
स्रोत: PIB
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