भारत निर्वाचन आयोग (ECI) की स्वतंत्रता: स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनावों की सुरक्षा 

पाठ्यक्रम: GS2/राजव्यवस्था और शासन

संदर्भ

  • भारत निर्वाचन आयोग की हालिया आलोचना ने इसकी वैधानिकता, जवाबदेही और संवैधानिक औचित्य से जुड़े प्रश्नों को उत्पन्न कर दिया है।

पृष्ठभूमि

  • निर्वाचक नामावली में हेरफेर: मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर चिंताएँ व्यक्त की गई हैं।
    • विशेष रूप से कुछ क्षेत्रों से बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाए जाने की रिपोर्टों ने मताधिकार से वंचित किए जाने की आशंकाएँ उत्पन्न की हैं।
  • नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर विवाद:मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें एवं कार्यकाल) अधिनियम, 2023 ने निर्वाचन आयुक्तों के चयन की व्यवस्था में परिवर्तन किया है।
    • यह तर्क दिया गया है कि चयन समिति से न्यायपालिका को बाहर रखने से कार्यपालिका का प्रभाव बढ़ सकता है।

भारत निर्वाचन आयोग (ECI)

  • भारत निर्वाचन आयोग (ECI) संविधान के अनुच्छेद 324 के अंतर्गत स्थापित एक संवैधानिक निकाय है।
    • इसमें मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) तथा उतनी संख्या में निर्वाचन आयुक्त (ECs) शामिल होते हैं, जितनी संख्या राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित की जाए।
  • ECI संसद, राज्य विधानमंडलों तथा राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के पदों के लिए निर्वाचन नामावलियों की तैयारी और चुनावों के संचालन के लिए उत्तरदायी है।
    • संविधान में प्रावधान है कि राष्ट्रपति, संसद द्वारा बनाए गए कानून के प्रावधानों के अधीन, मुख्य निर्वाचन आयुक्त और निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति करेंगे।

निर्वाचन आयोग का गठन

  • प्रारूप अनुच्छेद 289 (भारत का संविधान, 1950 का अनुच्छेद 324) पर वर्ष 1949 में चर्चा की गई थी।
    • इसके अंतर्गत केंद्रीय विधानमंडल—उच्च सदन और निम्न सदन—के चुनावों से संबंधित कार्यों के लिए एकल आयोग अर्थात भारत निर्वाचन आयोग (ECI) का गठन किया गया।
    • इसमें यह भी कहा गया था कि प्रत्येक राज्य और प्रांत का अपना निर्वाचन आयोग होना चाहिए।
  • आयोग की प्रकृति: प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ. बी. आर. आंबेडकर ने इस बात पर बल दिया था कि ECI को कार्यपालिका के नियंत्रण से बाहर होना चाहिए।
    • सदस्य इस खतरे से अवगत थे कि यदि निर्वाचन आयोग सरकार के नियंत्रण में रहा, तो इससे चुनाव की निष्पक्षता और अखंडता प्रभावित हो सकती है।
  • तीन सदस्यीय निकाय: वर्ष 1993 में राष्ट्रपति ने एम. एस. गिल और जी. वी. जी. कृष्णमूर्ति को निर्वाचन आयुक्त नियुक्त किया। तब से आयोग तीन सदस्यीय निकाय रहा है।
    • राष्ट्रपति ने एक अध्यादेश जारी किया, जिसे बाद में मुख्य निर्वाचन आयुक्त और निर्वाचन आयुक्त (सेवा की शर्तें) संशोधन अधिनियम के रूप में अधिनियमित किया गया। इसे 1 अक्टूबर 1993 से पूर्वव्यापी प्रभाव दिया गया।
      • इस अधिनियम ने निर्वाचन आयुक्तों को स्पष्ट रूप से समान अधिकार प्रदान किए, जिससे संविधान में मौजूद एक अस्पष्टता का समाधान हुआ।

भारत में निर्वाचक नामावलियों का पुनरीक्षण

  • जनप्रतिनिधित्व अधिनियम (RP Act), 1950 की धारा 21 निर्वाचक नामावलियों की तैयारी और पुनरीक्षण का प्रावधान करती है।
    • उक्त निर्वाचक नामावली को निर्धारित तरीके से अर्हता तिथि के संदर्भ में निम्नलिखित अवसरों पर संशोधित किया जाएगा:
      • लोकसभा या किसी राज्य की विधानसभा के प्रत्येक आम चुनाव से पहले;
      • प्रत्येक उपचुनाव से पहले;
      • और प्रत्येक वर्ष निर्धारित तरीके से अर्हता तिथि के संदर्भ में, यदि निर्वाचन आयोग द्वारा ऐसा पुनरीक्षण करने का निर्देश दिया गया हो।
  • जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21(3) के अनुसार, निर्वाचन आयोग “किसी भी समय किसी निर्वाचन क्षेत्र या उसके किसी भाग की निर्वाचक नामावली के विशेष पुनरीक्षण का निर्देश ऐसी रीति से दे सकता है, जिसे वह उचित समझे।”
  • निर्वाचक नामावलियों का पुनरीक्षण “या तो गहन रूप से, या संक्षिप्त रूप से, अथवा आंशिक रूप से गहन और आंशिक रूप से संक्षिप्त रूप में, जैसा कि ECI निर्देश दे,” किया जा सकता है।
    • गहन पुनरीक्षण में निर्वाचक नामावली नए सिरे से तैयार की जाती है, जबकि संक्षिप्त पुनरीक्षण में वर्तमान नामावली में संशोधन किया जाता है।
  • SIR वर्ष 1951 से 2004 तक पूर्व ही 8 बार किया जा चुका है।

ECI की स्वतंत्रता क्यों महत्वपूर्ण है?

  • अनुच्छेद 326: यह सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार तथा पात्र नागरिकों को मतदाता के रूप में पंजीकृत होने का अधिकार प्रदान करता है, जो कानून के अंतर्गत निर्धारित अयोग्यताओं के अधीन है।
  • स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करना: एक स्वतंत्र ECI सत्तारूढ़ दल या सरकार के अनुचित प्रभाव के बिना चुनावों का संचालन कर सकता है।
  • निर्वाचन अधिकारों की रक्षा: यह सुनिश्चित करने में सहायता करता है कि पात्र नागरिकों को मनमाने ढंग से निर्वाचक नामावली से बाहर न किया जाए और न ही उनके साथ भेदभावपूर्ण निर्वाचन प्रक्रियाएँ अपनाई जाएँ।
  • जनविश्वास का निर्माण: निष्पक्षता की धारणा और पारदर्शी निर्णय-प्रक्रिया चुनाव परिणामों के प्रति नागरिकों के विश्वास को सुदृढ़ करती है।
  • संवैधानिक लोकतंत्र की रक्षा: विश्वसनीय चुनाव राजनीतिक सत्ता के शांतिपूर्ण हस्तांतरण को संभव बनाते हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि सरकारें मतदाताओं से अपनी वैधता प्राप्त करें।

ECI से संबंधित महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णय

  • इंदिरा गांधी बनाम राज नारायण (1975): भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव संविधान की मूल संरचना का हिस्सा हैं।
  • टी. एन. शेषन बनाम भारत संघ (1995): इस निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने बहु-सदस्यीय निर्वाचन आयोग की व्यवस्था को मान्य ठहराया और स्पष्ट किया कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त “समानों में प्रथम” हैं, न कि पूर्ण अधिकार रखने वाले प्राधिकारी।
  • अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ: सर्वोच्च न्यायालय ने निर्वाचन आयोग में नियुक्तियों के लिए एक पारदर्शी तंत्र के महत्व पर बल दिया तथा इस संस्था को नियंत्रित करने वाले संवैधानिक ढाँचे पर विचार किया।
  • लाल बाबू हुसैन बनाम निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (1995): सर्वोच्च न्यायालय ने ECI के 1992 और 1994 के उन दिशा-निर्देशों को निरस्त कर दिया, जिनके अंतर्गत जिला कलेक्टरों और निर्वाचक पंजीकरण अधिकारियों (EROs) को विदेशी मूल के होने के महज संदेह के आधार पर निर्वाचक नामावली से नाम हटाने की अनुमति थी।
  • एम.डी. रहीम अली बनाम असम राज्य (2024): सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि केवल संदेह किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची से हटाने के लिए पर्याप्त आधार नहीं है।

आगे की राह

  • किसी चुनाव की विश्वसनीयता केवल मतदान के संचालन पर निर्भर नहीं करती, बल्कि उस पूरी प्रक्रिया की अखंडता पर भी निर्भर करती है, जिसके माध्यम से नागरिकों को निर्वाचक नामावली में शामिल किया जाता है, उनका सत्यापन किया जाता है और उनका नाम बनाए रखा जाता है।
  • एक सुदृढ़ निर्वाचन प्रणाली को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि संवैधानिक अधिकार, वैधानिक प्रक्रिया और डिजिटल अवसंरचना स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनावों के मूल उद्देश्य के अनुरूप एक-दूसरे के साथ समन्वित रहें।

स्रोत: TH

 

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