पाठ्यक्रम: GS2/ शासन, GS3/ अर्थव्यवस्था
संदर्भ
- भारतीय कंपनियों को विस्तार करने, वैश्विक मूल्य शृंखलाओं से जुड़ने तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम बनाने के लिए गुणवत्ता नियंत्रण आदेश (QCO) के पुनर्मूल्यांकन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की आवश्यकता है।
गुणवत्ता नियंत्रण आदेश (QCO) क्या हैं?
- गुणवत्ता नियंत्रण आदेश भारतीय मानक ब्यूरो अधिनियम, 2016 के अंतर्गत जारी किए जाने वाले कानूनी प्रावधान हैं।
- इनके माध्यम से घरेलू तथा आयातित दोनों प्रकार के उत्पादों के लिए निर्धारित भारतीय मानकों का अनुपालन अनिवार्य किया जाता है।
- गुणवत्ता नियंत्रण आदेश के अंतर्गत आने वाले उत्पादों को भारतीय बाजार में भारतीय मानक ब्यूरो के प्रमाणन के बिना विक्रय नहीं किया जा सकता। इससे उपभोक्ता सुरक्षा, निष्पक्ष व्यापार व्यवहार तथा निम्न-स्तरीय आयातित उत्पादों से सुरक्षा सुनिश्चित करने में सहायता मिलती है।
भारतीय मानक ब्यूरो (BIS)
- भारतीय मानक ब्यूरो, भारत सरकार के उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय के अंतर्गत भारत का राष्ट्रीय मानक निकाय है।
- इसकी स्थापना भारतीय मानक ब्यूरो अधिनियम, 2016 के अंतर्गत की गई थी, जो वर्ष 2017 में प्रभावी हुआ।
- मुख्यालय: नई दिल्ली।
- कार्य:
- विभिन्न क्षेत्रों में भारतीय मानकों का निर्माण।
- स्वैच्छिक और अनिवार्य, दोनों प्रकार की उत्पाद प्रमाणन योजनाओं का संचालन।
- गुणवत्ता नियंत्रण आदेश जारी करना, जिसके माध्यम से कुछ उत्पादों के लिए निर्धारित भारतीय मानकों का अनुपालन अनिवार्य किया जाता है।
- भारतीय मानक ब्यूरो द्वारा संचालित प्रमुख योजनाओं में उत्पाद प्रमाणन (आईएसआई चिह्न), प्रबंधन प्रणाली प्रमाणन, सोने और चांदी के आभूषणों तथा कलाकृतियों की हॉलमार्किंग और प्रयोगशाला सेवाएँ शामिल हैं। इनका उद्देश्य उद्योग को सहायता प्रदान करने के साथ-साथ उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करना है।
भारत की गुणवत्ता व्यवस्था
- भारत में 22,300 से अधिक मानक हैं, जिनमें लगभग 94 प्रतिशत अंतरराष्ट्रीय मानकीकरण संगठन (ISO) और अंतरराष्ट्रीय विद्युत तकनीकी आयोग (IEC) के मानकों के अनुरूप हैं।
- भारत वर्ष 2026 के वैश्विक गुणवत्ता अवसंरचना सूचकांक में 10वें स्थान पर रहा।
- 700 से अधिक उत्पाद अनिवार्य गुणवत्ता प्रमाणन के अंतर्गत आते हैं, जबकि सैकड़ों अन्य उत्पाद स्वैच्छिक प्रमाणन के अंतर्गत आते हैं।
- भारत की गुणवत्ता व्यवस्था में निम्नलिखित संस्थाएँ एवं तंत्र शामिल हैं:
- मानक निर्धारण के लिए भारतीय मानक ब्यूरो (BIS);
- भारतीय गुणवत्ता परिषद (QCI);
- परीक्षण और अंशांकन प्रयोगशालाओं के लिए राष्ट्रीय प्रत्यायन बोर्ड (NABL);
- प्रमाणन निकायों के लिए राष्ट्रीय प्रत्यायन बोर्ड (NABCB);
- निर्यात निरीक्षण परिषद (EIC);
- भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) तथा केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) जैसे क्षेत्रीय नियामक;
- अनुरूपता मूल्यांकन एवं प्रमाणन निकाय;
- परीक्षण प्रयोगशालाएँ;
- बाजार निगरानी तंत्र आदि।
वर्तमान व्यवस्थाएँ अपर्याप्त क्यों हैं?
- विखंडित संस्थागत ढाँचा: मानक निर्धारण, प्रमाणन, विनियमन, प्रत्यायन और प्रवर्तन से संबंधित जिम्मेदारियाँ विभिन्न मंत्रालयों एवं संस्थाओं के बीच विभाजित हैं।
- समन्वय के अभाव से नियामकीय कार्यों में दोहराव तथा जवाबदेही से संबंधित कमियाँ उत्पन्न होती हैं।
- भारतीय मानक ब्यूरो की ओवरलैपिंग भूमिकाएँ: भारतीय मानक ब्यूरो मानक निर्धारण, प्रमाणन तथा कुछ नियामकीय कार्य भी करता है।
- इन कार्यों का एक ही संस्था में केंद्रीकरण प्रोत्साहन, प्रमाणन और प्रवर्तन से संबंधित भूमिकाओं के बीच संभावित हित-संघर्ष उत्पन्न कर सकता है।
- कमजोर बाजार निगरानी: यदि नियमों का अनुपालन न करने वाले उत्पाद बाजार में निरंतर उपलब्ध रहते हैं, तो नियमन की प्रभावशीलता कम हो जाती है।
- राज्यों और विभिन्न क्षेत्रों में बाजार निगरानी की क्षमता अभी भी असमान है।
- निर्यात गुणवत्ता से जुड़ी चुनौतियाँ: निर्यात की गुणवत्ता से संबंधित नियमन निर्यात निरीक्षण परिषद, कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण, विभिन्न वस्तु बोर्डों तथा अन्य नियामक संस्थाओं के बीच विभाजित है।
- कई संस्थानों में प्रोत्साहन और नियमन की भूमिकाएँ एक साथ होने के कारण संभावित हित-संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
- सीमित अंतरराष्ट्रीय मान्यता: भारतीय मानकों का अनुपालन अपने आप विदेशी बाजारों में उत्पाद की स्वीकृति सुनिश्चित नहीं करता।
- भारतीय प्रमाणनों के लिए विदेशों में प्रायः अतिरिक्त सत्यापन की आवश्यकता पड़ती है, जिससे निर्यात लागत बढ़ जाती है।
गुणवत्ता को बढ़ावा देने वाली सरकारी पहल
- गुणवत्ता नियंत्रण आदेश (QCO): उत्पादों को निर्धारित गुणवत्ता और सुरक्षा मानकों के अनुरूप सुनिश्चित करने के लिए लागू किए गए हैं। इनके अंतर्गत इस्पात, रसायन, इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद, जूते तथा खिलौने जैसे क्षेत्र शामिल हैं।
- शून्य दोष, शून्य प्रभाव (ZED) योजना: सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों को पर्यावरणीय प्रभाव को न्यूनतम रखते हुए गुणवत्तापूर्ण विनिर्माण पद्धतियाँ अपनाने के लिए प्रोत्साहित करती है।
- उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजना: घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने के साथ-साथ कंपनियों को वैश्विक गुणवत्ता मानकों को प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित करती है।
- राष्ट्रीय गुणवत्ता मिशन: उद्योगों और सार्वजनिक संस्थानों में गुणवत्ता के प्रति जागरूकता को बढ़ावा देता है।
- एक जिला, एक उत्पाद (ODOP): स्थानीय उत्पादों के मानकीकरण, ब्रांड निर्माण और गुणवत्ता में सुधार को प्रोत्साहित करता है।
आगे की राह
- परीक्षण अवसंरचना में सुधार: गुणवत्ता के आकलन और मानकों के अनुपालन को सुदृढ़ करने के लिए मान्यता प्राप्त प्रयोगशालाओं और प्रमाणन सुविधाओं का विस्तार किया जाना चाहिए।
- राष्ट्रीय गुणवत्ता प्राधिकरण की स्थापना: गुणवत्ता संबंधी शासन के लिए एक समर्पित सर्वोच्च संस्था का गठन किया जाना चाहिए, जो विभिन्न क्षेत्रों में मानक निर्धारण, प्रमाणन, प्रत्यायन, विनियमन और प्रवर्तन के बीच समन्वय स्थापित करते हुए संपूर्ण सरकार के स्तर पर एकीकृत दृष्टिकोण सुनिश्चित करे।
- निर्यात प्रमाणन को सुव्यवस्थित करना: विभिन्न निर्यात प्रमाणन संस्थाओं के कार्यों का युक्तिकरण किया जाना चाहिए, ताकि दोहराव कम हो और निर्यातकों के लिए अनुपालन प्रक्रिया सरल हो।
- प्रमुख कार्यों का पृथक्करण: पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने के लिए मानक निर्धारण, प्रमाणन, विनियमन और प्रवर्तन के कार्य स्वतंत्र रूप से किए जाने चाहिए।
- वैश्विक एकीकरण को बढ़ावा देना: अंतरराष्ट्रीय मानक निर्धारण संस्थाओं में भारत की भागीदारी बढ़ाई जानी चाहिए तथा भारतीय प्रमाणनों की पारस्परिक मान्यता के लिए समझौतों को आगे बढ़ाया जाना चाहिए।
निष्कर्ष
- भारत में गुणवत्ता सुधारों के आगामी चरण का उद्देश्य केवल मानकों और प्रमाणनों की संख्या बढ़ाना नहीं होना चाहिए।
- इसके बजाय, ध्यान ऐसी विश्वसनीय, भरोसेमंद और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त गुणवत्ता शासन व्यवस्था के निर्माण पर होना चाहिए, जो उपभोक्ता संरक्षण, निर्यात प्रतिस्पर्धा तथा भारत को वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनाने के लक्ष्य को समर्थन प्रदान करे।
स्रोत: TH