पाठ्यक्रम: GS1/ भूगोल, GS3/पर्यावरण; आपदा प्रबंधन
संदर्भ
- दक्षिण-पश्चिम मानसून की वापसी शुरू होने के साथ ही भारत के आधे से अधिक भू-भाग में सूखे जैसी परिस्थितियाँ उत्पन्न हो गई हैं। मृदा में आर्द्रता की निरंतर कमी ने खरीफ फसलों की उपज, रबी फसलों की बुवाई तथा जल सुरक्षा को लेकर चिंताएँ बढ़ा दी हैं।
भारत में सूखा
- सूखा असामान्य रूप से कम वर्षा की दीर्घ अवधि को कहा जाता है, जिसके कारण जल की कमी उत्पन्न होती है। इसका प्रभाव मौसम विज्ञान, कृषि तथा जल विज्ञान से संबंधित विभिन्न प्रणालियों पर अलग-अलग रूपों में पड़ता है।
- भारत में सूखे का आकलन अब केवल वर्षा के आधार पर नहीं किया जाता, बल्कि मृदा की आर्द्रता, वनस्पति की स्थिति, जलाशयों में जल भंडारण तथा भूजल की स्थिति को भी इसमें सम्मिलित किया जाता है।
- भारत सूखे के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील है, क्योंकि देश के शुद्ध बोए गए क्षेत्र का लगभग 55–60 प्रतिशत भाग वर्षा पर निर्भर कृषि के अंतर्गत आता है।
- राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण तथा कृषि मंत्रालय सूखे की निगरानी, पूर्व चेतावनी, आकस्मिक फसल योजना तथा जल के कुशल प्रबंधन पर विशेष बल देते हैं।
भारत में बढ़ता सूखा संकट
- मानसून की परिवर्तनशीलता: मुख्य चिंता केवल मौसमी वर्षा की कमी नहीं है, बल्कि वर्षा का समय और स्थान के अनुसार असमान वितरण भी है।
- वर्षा और शुष्क अवधियों के बीच बार-बार होने वाले परिवर्तन के कारण मृदा में लंबे समय तक आर्द्रता की कमी बनी रही है।
- इसलिए कम अवधि में हुई वर्षा से उन क्षेत्रों में सूखे की स्थिति में पर्याप्त सुधार नहीं हो पाया, जहाँ पहले से ही मृदा में आर्द्रता की कमी बनी हुई थी।
- सूखे का विस्तार और प्रसार: भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, गांधीनगर के भारत सूखा निगरानी केंद्र के अनुसार, 16 सितंबर तक भारत के लगभग 52.5 प्रतिशत भू-भाग में शुष्क या सूखे की स्थिति थी, जबकि लगभग एक माह पहले यह आंकड़ा 38.9 प्रतिशत था। क्षेत्रीय स्तर पर सूखे का दबाव विशेष रूप से निम्नलिखित क्षेत्रों में अधिक रहा:
- पश्चिमी भारत: 79 प्रतिशत क्षेत्र शुष्क या सूखे की स्थिति में;
- दक्षिणी भारत: 67 प्रतिशत;
- पूर्वोत्तर भारत: 62 प्रतिशत;
- उत्तर-पश्चिम भारत: 47 प्रतिशत;
- पूर्वी भारत: 42 प्रतिशत;
- उत्तरी भारत: 41 प्रतिशत;
- मध्य भारत: 40 प्रतिशत।
- वर्षा की कमी और स्थानिक परिवर्तनशीलता: 1 जून से 22 सितंबर, 2026 के बीच भारत में 706.9 मिलीमीटर वर्षा हुई, जबकि सामान्य वर्षा 832.4 मिलीमीटर होती है। इस प्रकार वर्षा में 15 प्रतिशत की कमी रही।
- देश के लगभग 41 प्रतिशत क्षेत्र में मौसमी वर्षा सामान्य से कम रही।
- क्षेत्रीय स्तर पर वर्षा की कमी रायलसीमा में 43 प्रतिशत, तटीय आंध्र प्रदेश में 37 प्रतिशत, मराठवाड़ा में 36 प्रतिशत, आंतरिक कर्नाटक के विभिन्न क्षेत्रों में 32 प्रतिशत तथा केरल में 28 प्रतिशत रही।

- एल नीनो और मानसून की अनिश्चितता: सुदृढ़ हो रहा एल नीनो वर्षा और तापमान के स्वरूप में अनिश्चितता को बढ़ा रहा है।
- अन्य समुद्री और वायुमंडलीय घटनाओं के साथ इसकी अंतःक्रिया मानसून की परिवर्तनशीलता को प्रभावित कर सकती है।
- हालिया शोध से पता चलता है कि समुद्र-वायुमंडल की परस्पर क्रिया से संबंधित यह घटना सूखे की प्रकृति तथा कृषि उत्पादकता को प्रभावित कर सकती है।
कृषि एवं समग्र अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
- सूखे का दबाव खरीफ फसलों की बुवाई में पहले से दिखाई दे रहा है।
- 11 सितंबर तक खरीफ फसलों का कुल बुवाई क्षेत्र 1,096.49 लाख हेक्टेयर था, जबकि एक वर्ष पहले यह 1,112.54 लाख हेक्टेयर था।
- धान के बुवाई क्षेत्र में लगभग 17 लाख हेक्टेयर की कमी आई।
- मृदा में आर्द्रता की निरंतर कमी से फसल की उपज, पशुधन उत्पादकता और किसानों की आय प्रभावित हो सकती है। साथ ही, सिंचाई तथा सरकारी सहायता की मांग बढ़ सकती है।
- जलाशयों में कम जल भंडारण और भूजल के अपर्याप्त पुनर्भरण से रबी फसलों की बुवाई प्रभावित हो सकती है। इसका प्रभाव खाद्य कीमतों, ग्रामीण रोजगार तथा कृषि क्षेत्र के सकल घरेलू उत्पाद पर भी पड़ सकता है।
- यह स्थिति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि कृषि मंत्रालय और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने एल नीनो से संबंधित कृषि संकट के प्रति संभावित रूप से संवेदनशील 315 जिलों की पहचान की थी। इनमें 111 उच्च प्राथमिकता वाले जिले ऐसे थे, जहाँ सिंचाई का विस्तार 25 प्रतिशत से कम था।
आगे की राह
- वर्षा, मृदा की आर्द्रता, भूजल तथा उपग्रह से प्राप्त आंकड़ों को एकीकृत करते हुए जिला स्तर पर सूखे की पूर्व चेतावनी प्रणालियों को सुदृढ़ किया जाना चाहिए।
- जलवायु-अनुकूल कृषि को बढ़ावा देने के लिए मोटे अनाज, दलहन तथा सूखा-सहिष्णु फसल किस्मों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
- सूक्ष्म सिंचाई, जलग्रहण क्षेत्र विकास तथा वर्षा जल संचयन का विस्तार किया जाना चाहिए।
- वास्तविक समय में उपलब्ध मानसूनी परिस्थितियों के आधार पर आकस्मिक फसल योजनाएँ तैयार और लागू की जानी चाहिए।
- रबी फसलों की स्थिरता के लिए जलाशयों के संचालन तथा भूजल पुनर्भरण में सुधार किया जाना चाहिए।
- संवेदनशील जिलों में फसल बीमा, मौसम संबंधी परामर्श तथा लक्षित आजीविका सहायता को सुदृढ़ किया जाना चाहिए।
- केवल वर्षा की कमी के आधार पर सूखे का आकलन करने के बजाय उसके वास्तविक प्रभावों पर आधारित सूखा निगरानी व्यवस्था विकसित की जानी चाहिए।
भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून
- यह वायु के मौसमी प्रत्यावर्तन की एक प्राकृतिक प्रणाली है, जो भारत में होने वाली वार्षिक वर्षा का अधिकांश भाग लेकर आती है। यह कृषि, जल संसाधनों और अर्थव्यवस्था के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
- दक्षिण-पश्चिम मानसून: यह सामान्यतः 1 जून के आसपास केरल में प्रवेश करता है और उत्तर की ओर बढ़ते हुए जुलाई तक भारत के अधिकांश हिस्सों को अपने प्रभाव में ले आता है। सामान्यतः यह भारत की वार्षिक वर्षा का लगभग 75 प्रतिशत भाग प्रदान करता है।
- दो प्रमुख शाखाएँ:
- अरब सागर शाखा: यह पश्चिमी तट तथा उत्तर और उत्तर-पश्चिम भारत के क्षेत्रों में वर्षा लाती है।
- बंगाल की खाड़ी शाखा: यह पूर्वोत्तर भारत की ओर बढ़ती है और इसके बाद हिमालय की तलहटी तथा गंगा के मैदानी क्षेत्रों के साथ पश्चिम की ओर आगे बढ़ती है।
- मानसून की परिवर्तनशीलता: वर्षा का स्थानिक और कालिक वितरण अत्यधिक असमान होता है तथा मानसून के दौरान सक्रिय और विराम की अवस्थाएँ आती रहती हैं। एल नीनो–दक्षिणी दोलन (ENSO), हिंद महासागर द्विध्रुव (IOD), हिमालय–तिब्बत क्षेत्र की परिस्थितियाँ तथा अंतःमौसमी वायुमंडलीय परिसंचरण जैसे कारक मानसून के स्वरूप को प्रभावित करते हैं।
- मानसून की वापसी: दक्षिण-पश्चिम मानसून सामान्यतः सितंबर में उत्तर-पश्चिम भारत से वापस लौटना शुरू करता है। इसके बाद यह दक्षिण की ओर बढ़ता है और सामान्यतः अक्टूबर तक देश के अधिकांश हिस्सों से वापस लौट जाता है।
- इसके बाद उत्तर-पूर्वी मानसून महत्वपूर्ण हो जाता है, विशेष रूप से तमिलनाडु, तटीय आंध्र प्रदेश तथा इससे लगे दक्षिण-पूर्वी प्रायद्वीपीय भारत के क्षेत्रों में। इसका प्रभाव मुख्यतः अक्टूबर से दिसंबर के दौरान देखा जाता है।
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संक्षिप्त समाचार 23-09-2026