पाठ्यक्रम: GS3/ कृषि
संदर्भ
- महाराष्ट्र ने जुलाई 2026 में महिला किसान सशक्तीकरण विधेयक पारित किया, जिसके अंतर्गत भूमि के स्वामित्व से स्वतंत्र रूप से महिलाओं को महिला किसान प्रमाण-पत्र के माध्यम से किसान के रूप में स्वतंत्र पहचान प्रदान करने का प्रावधान किया गया है।
कृषि में महिलाओं की बढ़ती भूमिका
- भारतीय कृषि में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका है, लेकिन उनके योगदान को प्रायः स्वतंत्र आर्थिक गतिविधि के बजाय घरेलू कार्य के विस्तार के रूप में देखा जाता है।
- हाल के PLFS-आधारित अनुमानों के अनुसार, 2025 में कृषि क्षेत्र में लगभग 11 करोड़ महिलाएँ और 12.7 करोड़ पुरुष कार्यरत थे, जो कृषि रोजगार में लगभग लैंगिक समानता को दर्शाता है।
- ग्रामीण महिला श्रमिकों में लगभग तीन-चौथाई कृषि क्षेत्र में कार्यरत हैं, जिससे यह क्षेत्र ग्रामीण महिलाओं की आजीविका का एक प्रमुख स्रोत बन जाता है।
- हालाँकि, महिलाओं के कृषि कार्य का एक बड़ा हिस्सा अभी भी अवैतनिक पारिवारिक श्रम के रूप में किया जाता है, जिससे उनकी आर्थिक स्वतंत्रता और औपचारिक पहचान सीमित होती है।
- कृषि जनगणना 2015-16 के अनुसार, परिचालन कृषि जोतों के धारकों में महिलाओं की हिस्सेदारी केवल लगभग 14% थी।
महिला किसानों के समक्ष प्रमुख मुद्दे
- खंडित आँकड़ा-तंत्र: कृषि, भूमि, ऋण और कल्याण से संबंधित डेटाबेस हमेशा कृषि में महिलाओं की भागीदारी की समग्र तस्वीर प्रस्तुत नहीं करते हैं।
- सामाजिक बाधाएँ: पितृसत्तात्मक मानदंड महिलाओं के भूमि, आय, कृषि मशीनरी और कृषि संबंधी निर्णय लेने की प्रक्रिया पर नियंत्रण को सीमित करते हैं।
- भूमि अभिलेखों पर निर्भरता: किसान की पहचान को मुख्यतः भूमि अभिलेखों से जोड़ने की व्यवस्था उन महिलाओं को असमान रूप से प्रभावित करती है, जिनके नाम पर भूमि का स्वामित्व दर्ज नहीं है।
- एकीकृत परिभाषा का अभाव: विभिन्न कृषि कार्यक्रम लाभार्थियों की पहचान के लिए अलग-अलग पात्रता मानदंड अपनाते हैं।
सरकार द्वारा की गई पहल
- राष्ट्रीय किसान नीति, 2007 ने किसानों की एक व्यापक अवधारणा को अपनाया, जिसमें केवल भूमि-मालिकों के बजाय कृषि उत्पादन से जुड़े व्यक्तियों को भी शामिल किया गया।
- दीनदयाल अंत्योदय योजना–राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (DAY-NRLM) ने लाखों ग्रामीण महिलाओं को स्वयं सहायता समूहों (SHGs) में संगठित किया है।
- स्वयं सहायता समूह महिलाओं को ऋण, आजीविका के अवसर, प्रशिक्षण और सामूहिक कृषि गतिविधियों तक पहुँच प्रदान करने के लिए एक महत्वपूर्ण संस्थागत माध्यम के रूप में कार्य कर सकते हैं।
- ग्रामीण आजीविका के ढाँचे के अंतर्गत लागू महिला किसान सशक्तीकरण परियोजना (MKSP) महिलाओं की क्षमताओं और आजीविका को सुदृढ़ करने पर केंद्रित है।
- केरल में कुडुम्बश्री ने महिला समूहों के माध्यम से सामूहिक खेती को बढ़ावा दिया है, जिससे कृषि में महिलाओं की भागीदारी के लिए एक वैकल्पिक संस्थागत मार्ग विकसित हुआ है।
आगे की राह
- राष्ट्रीय महिला किसान रजिस्ट्री: भारत को लैंगिक आधार पर वर्गीकृत ऐसे किसान डेटाबेस की आवश्यकता है, जिसमें किसानों की पहचान केवल भूमि स्वामित्व के आधार पर नहीं, बल्कि वास्तविक कृषि गतिविधियों में उनकी भागीदारी के आधार पर की जाए।
- किसान पहचान-पत्रों का एकीकरण: किसान के रूप में पहचानी गई महिलाओं को किसान पहचान-पत्र (Farmer IDs) प्रदान किए जाने चाहिए, जिन्हें कृषि योजनाओं, ऋण, बीमा, कृषि विस्तार सेवाओं और बाजार मंचों से जोड़ा जा सके।
- उत्पादक परिसंपत्तियों तक महिलाओं की पहुँच: पहचान के साथ-साथ महिलाओं को संस्थागत ऋण, कृषि मशीनरी, गुणवत्तापूर्ण कृषि आदानों, कृषि विस्तार सेवाओं, बाजारों और डिजिटल सेवाओं तक पहुँच भी सुनिश्चित की जानी चाहिए।
स्रोत: TH