पाठ्यक्रम: GS3/ पर्यावरण
संदर्भ
- विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) द्वारा प्रकाशित वैश्विक जल संसाधनों की स्थिति 2025 रिपोर्ट के अनुसार, भारत में भूजल स्तर में +गिरावट हो रही है।
भूजल ह्रास क्या है?
- भूजल ह्रास वह स्थिति है, जब भूजल के दोहन की दर उस दर से अधिक हो जाती है, जिस दर से वर्षा के अंतःस्रवण, सतही जल के रिसाव तथा अन्य पुनर्भरण प्रक्रियाओं के माध्यम से भूजल का प्राकृतिक रूप से पुनर्भरण होता है।
- जल स्तर में अस्थायी गिरावट के विपरीत, निरंतर भूजल ह्रास भूजल के दोहन और पुनर्भरण के बीच लंबे समय से बने असंतुलन को दर्शाता है।
- भारत में विश्व की लगभग 18% जनसंख्या निवास करती है, जबकि इसके पास विश्व के केवल 4% मीठे जल संसाधन हैं। इससे उपलब्ध जल प्रणालियों पर अत्यधिक दबाव पड़ता है।
- भारत अपनी ग्रामीण पेयजल आवश्यकताओं के लगभग 85% तथा सिंचाई जल की लगभग 60% आवश्यकता के लिए भूजल पर निर्भर है।
WMO रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष
- रिपोर्ट में भूजल की स्थिति का आकलन करने के लिए 2001–2020 की अवधि को संदर्भ अवधि के रूप में उपयोग किया गया है।
- वर्ष 2025 में वैश्विक स्तर पर 34% भूजल निगरानी केंद्रों ने सामान्य से कम से लेकर अत्यंत कम भूजल स्तर दर्ज किया।
- लगभग 31% निगरानी केंद्रों पर सामान्य से अधिक से लेकर अत्यधिक अधिक भूजल स्तर दर्ज किया गया, जो विभिन्न क्षेत्रों में भूजल की स्थिति में उल्लेखनीय भिन्नता को दर्शाता है।
- वर्ष 2025 में उत्तरी भारत में स्थलीय जल भंडारण सामान्य से कम दर्ज किया गया, जो इस क्षेत्र के स्वच्छ जल भंडारों पर निरंतर दबाव को दर्शाता है।
- WMO ने यह भी बताया कि वैश्विक स्थलीय जल भंडारण में 2014–2016 से गिरावट की प्रवृत्ति देखी गई है, जो स्वच्छ जल की उपलब्धता में दीर्घकालिक गिरावट को दर्शाती है।
भारत में भूजल स्तर में गिरावट के प्रमुख कारण
- अत्यधिक दोहन: भारत में भूजल निकासी का सबसे बड़ा हिस्सा कृषि क्षेत्र द्वारा किया जाता है।
- चूँकि धान और गेहूँ अधिक जल की आवश्यकता वाली फसलें हैं, इसलिए जहाँ प्राकृतिक भूजल पुनर्भरण सीमित है, वहाँ इनकी खेती के कारण भूजल की मांग काफी अधिक हो जाती है।
- सब्सिडीयुक्त विद्युत: कृषि पंपों के लिए कम दर पर या सब्सिडी वाली विद्युत उपलब्ध होने से भूजल संरक्षण के लिए आर्थिक प्रोत्साहन कम हो सकता है और अत्यधिक भूजल दोहन को बढ़ावा मिल सकता है।
- भूजल पुनर्भरण में परिवर्तनशीलता: तीव्र शहरीकरण, भूमि का कंक्रीटीकरण तथा आर्द्रभूमियों के क्षरण से प्राकृतिक जल अंतःस्रवण और जलभृतों (Aquifers) के पुनर्भरण के लिए उपलब्ध क्षेत्र सीमित हो जाता है।
- जलवायु परिवर्तनशीलता: अनियमित वर्षा, लंबे शुष्क अंतराल तथा बढ़ते तापमान भूजल के प्रभावी पुनर्भरण को प्रभावित कर सकते हैं और सिंचाई की मांग में वृद्धि कर सकते हैं।
सरकार द्वारा उठाए गए कदम
- जल शक्ति अभियान (2019): इसका उद्देश्य जल-संकटग्रस्त जिलों में जल संरक्षण तथा भूजल पुनर्भरण को बढ़ावा देना है।
- राष्ट्रीय जलभृत मानचित्रण कार्यक्रम (NAQUIM): यह सतत भूजल प्रबंधन के लिए जलभृतों की पहचान, सीमांकन और उनकी विशेषताओं को समझने में सहायता करता है।
- अटल भूजल योजना: इसे प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में, विशेषकर गंभीर एवं अत्यधिक दोहन वाले प्रखंडों में, भूजल प्रबंधन को बेहतर बनाने के उद्देश्य से शुरू किया गया।
- केंद्रीय भूजल प्राधिकरण (CGWA): यह दिशानिर्देशों के माध्यम से भूजल दोहन को विनियमित करता है, विशेष रूप से औद्योगिक एवं अवसंरचना संबंधी उपयोगों के लिए।
- सूक्ष्म सिंचाई: प्रति बूंद अधिक फसल जैसे घटकों के अंतर्गत सूक्ष्म सिंचाई को बढ़ावा देकर सिंचाई जल के अधिक कुशल उपयोग को प्रोत्साहित किया जाता है।
आगे की राह
- भूजल प्रबंधन को केवल भूजल दोहन को नियंत्रित करने तक सीमित रखने के बजाय संपूर्ण जलभृत संतुलन के प्रबंधन की दिशा में स्थानांतरित करने की आवश्यकता है।
- कम जल-गहन फसलों की ओर फसल विविधीकरण को सुनिश्चित सरकारी खरीद, मूल्य प्रोत्साहन तथा उपयुक्त कृषि अवसंरचना के माध्यम से बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
- विश्वसनीय निगरानी आँकड़ों का उपयोग करते हुए जलभृत तथा जलागम स्तर पर भूजल बजट तैयार किए जाने चाहिए।
स्रोत: DTE
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