पाठ्यक्रम: GS2/अंतरराष्ट्रीय संबंध; शासन
संदर्भ
- यूरोपीय आयोग ने भारत–यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर करने और इसे अंतिम रूप देने के लिए यूरोपीय संघ के सदस्य देशों से अनुमोदन मांगा है। इस प्रक्रिया के साथ बौद्धिक संपदा (IP) और कॉपीराइट से संबंधित प्रभाव भी चर्चा के केंद्र में आ गए हैं।
भारत–यूरोपीय संघ FTA एवं बौद्धिक संपदा के बारे में
- भारत–यूरोपीय संघ FTA का उद्देश्य भारत और यूरोपीय संघ के बीच व्यापार एवं आर्थिक संबंधों को और अधिक सुदृढ़ करना है।
- इसके बौद्धिक संपदा (IP) अध्याय में कॉपीराइट, प्रवर्तन, तकनीकी संरक्षण उपाय (TPMs) तथा अधिकार-प्रबंधन संबंधी सूचना जैसे क्षेत्र शामिल हैं।
- भारत–ईयू FTA के मसौदा को लेकर यह चिंता व्यक्त की गई है कि क्या वर्तमान भारतीय कॉपीराइट अपवाद तथा डिजिटल नीति संबंधी लचीले प्रावधान भविष्य में भी संरक्षित रहेंगे।
बौद्धिक संपदा (IP) एवं कॉपीराइट
- बौद्धिक संपदा (IP): यह ऐसे कानूनी अधिकारों का समूह है जो मानव मस्तिष्क की रचनात्मक उपज की रक्षा करता है। इसमें आविष्कार, साहित्यिक एवं कलात्मक कृतियाँ, सॉफ्टवेयर, डिजाइन, ट्रेडमार्क तथा भौगोलिक संकेतक शामिल हैं।
- कॉपीराइट: यह बौद्धिक संपदा की एक शाखा है, जो पुस्तकों, संगीत, फिल्मों, सॉफ्टवेयर तथा डिजिटल सामग्री सहित मौलिक साहित्यिक, कलात्मक और रचनात्मक कृतियों की रक्षा करती है।
- भारत में दोनों का नियमन मुख्यतः कॉपीराइट अधिनियम, 1957 के अंतर्गत किया जाता है। यह अधिनियम TRIPS तथा WIPO कॉपीराइट संधि जैसे अंतरराष्ट्रीय बौद्धिक संपदा ढाँचों के अंतर्गत भारत की प्रतिबद्धताओं को भी समाहित करता है।
कॉपीराइट नियम: यूरोपीय संघ और भारत
- WIPO कॉपीराइट संधि विशेष रूप से डिजिटल वातावरण के लिए तैयार की गई है। यह लेखकों के अधिकारों की रक्षा करते हुए कुछ सीमाओं और अपवादों को भी मान्यता देती है, जिनमें शिक्षा और अनुसंधान से संबंधित प्रावधान शामिल हैं।
- भारत में धारा 52 महत्वपूर्ण कॉपीराइट अपवाद प्रदान करती है, जिनमें निष्पक्ष व्यवहार तथा कुछ अस्थायी या आकस्मिक डिजिटल पुनरुत्पादनों से संबंधित प्रावधान शामिल हैं।
- धारा 65A तकनीकी संरक्षण उपायों (TPMs) को विनियमित करती है तथा धारा 65A(2) के अंतर्गत निर्दिष्ट वैध उद्देश्यों के लिए कुछ अपवाद उपलब्ध कराती है।
- धारा 52(1)(ab) और 52(1)(ac) कुछ निर्धारित परिस्थितियों में सॉफ्टवेयर के अवलोकन, परीक्षण और रिवर्स इंजीनियरिंग की अनुमति देती हैं। इनमें अंतर-संचालनीयता तथा सुरक्षा अनुसंधान जैसे उद्देश्य शामिल हैं।
- धारा 52(1)(b) और (c) इलेक्ट्रॉनिक प्रसारण और डेटा रूटिंग के दौरान निर्मित कुछ अस्थायी एवं क्षणिक प्रतियों को संरक्षण प्रदान करती हैं।
- कॉपीराइट नियम, 2013, जिसमें नियम 75 भी शामिल है, नोटिस एवं सामग्री हटाने की प्रक्रियाओं के लिए रूपरेखा प्रदान करते हैं।
प्रमुख चिंताएँ
- कॉपीराइट नियमों में संरचनात्मक असमानता: रिपोर्ट के अनुसार, मसौदा IP अध्याय राष्ट्रीय उपचार प्रावधान से WIPO कॉपीराइट संधि को बाहर रखता है, जबकि अंतरराष्ट्रीय IP संधियों के प्रति प्रतिबद्धताओं की पुष्टि करता है।
- साथ ही, TPMs और अधिकार-प्रबंधन संबंधी सूचना से जुड़े प्रावधान बाध्यकारी बने रहते हैं। यह अस्थायी और स्थायी पुनरुत्पादन को भी संरक्षण प्रदान करता है, जिससे क्षणिक डिजिटल प्रतियों को लेकर चिंताएँ उत्पन्न होती हैं।
- इससे धारा 52 के अंतर्गत भारत में उपलब्ध वर्तमान डिजिटल कॉपीराइट अपवाद विदेशी अधिकारधारकों द्वारा कानूनी चुनौती के दायरे में आ सकते हैं।
- तकनीकी संरक्षण उपाय (TPMs): एक कठोर एंटी-सर्कमवेंशन व्यवस्था छात्रों, शोधकर्ताओं, पुस्तकालयों और अभिलेखागारों को प्रभावित कर सकती है।
- उदाहरण के लिए, कोई छात्र यदि अंतर-संचालनीयता या सुरक्षा अनुसंधान के लिए किसी सॉफ्टवेयर का कानूनी रूप से परीक्षण कर रहा हो, तो उसे ऐसे DRM या एन्क्रिप्शन का सामना करना पड़ सकता है जिसे हटाने या पार करने की आवश्यकता हो।
- इसी प्रकार, पुस्तकालय और अभिलेखागार डिजिटल रूप से लॉक, अप्रचलित अथवा नाजुक कृतियों के संरक्षण के लिए फॉर्मेट-शिफ्टिंग पर बढ़ती निर्भरता रखते हैं। यदि वैधानिक अपवादों को कमजोर किया जाता है, तो संरक्षण और शैक्षणिक अनुसंधान के क्षेत्र में कानूनी अनिश्चितता बढ़ सकती है।
- इंटरनेट मध्यस्थों के लिए खतरा: RAM, सर्वर कैश और नियमित नेटवर्क रूटिंग में उत्पन्न होने वाली अस्थायी प्रतियाँ इंटरनेट के सुचारु संचालन के लिए महत्वपूर्ण हैं।
- भारत का कॉपीराइट अधिनियम कुछ निर्धारित क्षणिक प्रतियों को संरक्षण प्रदान करता है।
- हालाँकि, मसौदे में व्यापक पुनरुत्पादन अधिकार का प्रावधान इंटरनेट सेवा प्रदाताओं (ISPs) और डिजिटल मध्यस्थों को अधिक कॉपीराइट दायित्व के दायरे में ला सकता है।
आगे की राह
- भारत को समझौते को अंतिम रूप देने से पहले IP अध्याय में लक्षित पुनर्संतुलन की मांग करनी चाहिए।
- WIPO कॉपीराइट संधि को राष्ट्रीय उपचार प्रावधान में पुनः शामिल किया जाना चाहिए। साथ ही, शिक्षा, अनुसंधान, संरक्षण, अंतर-संचालनीयता तथा क्षणिक डिजिटल प्रतियों से संबंधित मौजूदा भारतीय वैधानिक अपवादों को संरक्षित रखा जाना चाहिए।
- उद्देश्य यह होना चाहिए कि भारत–यूरोपीय संघ के व्यापारिक संबंधों को सुदृढ़ किया जाए, लेकिन इसके साथ भारत की डिजिटल नीति संबंधी स्वायत्तता, ज्ञान तक पहुंच और नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र को कमजोर न किया जाए।
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