पाठ्यक्रम: GS2/ शासन
समाचार में
- Nifty 50 कंपनियों में वित्त वर्ष 2025-26 (FY26) के दौरान कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, प्रतिषेध एवं निवारण) अधिनियम, 2013 (POSH अधिनियम) के अंतर्गत 1,327 शिकायतें दर्ज की गईं, जो वित्त वर्ष 2024-25 (FY25) की तुलना में 4.6% की वृद्धि है।
POSH अधिनियम, 2013 के बारे में
- कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, प्रतिषेध एवं निवारण) अधिनियम, 2013 को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा विशाखा बनाम राजस्थान राज्य मामले में वर्ष 1997 में जारी विशाखा दिशानिर्देशों को वैधानिक आधार प्रदान करने के लिए अधिनियमित किया गया था।
- इस अधिनियम के अंतर्गत कार्यस्थल की परिभाषा में क्लाइंट के कार्यस्थल, कार्य के बारे में की जाने वाली यात्राएँ तथा वर्चुअल या दूरस्थ कार्यस्थल भी शामिल किए गए हैं। इससे सुरक्षा का दायरा केवल भौतिक कार्यालय तक सीमित नहीं रहता।
- अधिनियम के अनुसार, 10 या उससे अधिक कर्मचारियों वाले संगठनों में आंतरिक शिकायत समिति (ICC) का गठन अनिवार्य है। इसके अतिरिक्त, जिला स्तर पर स्थानीय शिकायत समिति (LCC) का गठन किया जाना है, ताकि असंगठित क्षेत्र तथा 10 से कम कर्मचारियों वाले संगठनों से संबंधित शिकायतों का निवारण किया जा सके।
- शिकायतों का 90 दिनों के अंदर निस्तारण किया जाना आवश्यक है तथा समिति की सिफारिशों को लागू करने के लिए अतिरिक्त 60 दिनों की अवधि निर्धारित है।
POSH अधिनियम की आवश्यकता का कारण?
- कानूनी शून्यता को भरना: 2013 से पूर्व भारत में कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से संबंधित कोई समर्पित कानून नहीं था। इस संबंध में विशाखा दिशानिर्देश न्यायपालिका द्वारा जारी अंतरिम निर्देशों के रूप में लागू थे।
- संवैधानिक दायित्व: यह अधिनियम अनुच्छेद 14 (समानता), अनुच्छेद 15 (भेदभाव का निषेध), अनुच्छेद 19(1)(g) (किसी भी पेशे का अभ्यास करने का अधिकार) तथा अनुच्छेद 21 (जीवन एवं गरिमा का अधिकार) को कामकाजी महिलाओं के संदर्भ में प्रभावी रूप से लागू करता है।
- महिला श्रमबल की बढ़ती भागीदारी: जैसे-जैसे अधिक महिलाएँ संगठित और असंगठित क्षेत्रों में कार्यबल का हिस्सा बनीं, सुरक्षित और जवाबदेह कार्य वातावरण का अभाव कार्यबल में महिलाओं को बनाए रखने तथा उनके करियर विकास में प्रत्यक्ष बाधा बनने लगा।
- अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताएँ: भारत CEDAW (महिलाओं के विरुद्ध सभी प्रकार के भेदभाव के उन्मूलन संबंधी अभिसमय) का हस्ताक्षरकर्ता है। इसके अंतर्गत सदस्य देशों को भेदभाव रहित कार्य परिस्थितियाँ सुनिश्चित करने की प्रतिबद्धता होती है।
महत्व
- संस्थागत विश्वास का निर्माण: एक प्रभावी POSH तंत्र संगठन की जवाबदेही को दर्शाता है। इससे महिलाओं को शिकायत दर्ज कराने के लिए प्रोत्साहन मिलता है, बजाय इसके कि वे उत्पीड़न को चुपचाप सहें या कार्यबल से बाहर हो जाएँ।
- शासन एवं ESG के साथ एकीकरण: SEBI के BRSR (व्यावसायिक उत्तरदायित्व और स्थिरता रिपोर्टिंग) ढाँचे के अंतर्गत POSH अनुपालन को अब कॉर्पोरेट गवर्नेंस के आकलन से जोड़ा गया है, जिससे यह प्रतिष्ठा और निवेश से संबंधित एक महत्वपूर्ण मानदंड बन गया है।
- FLFPR में वृद्धि का माध्यम: सुरक्षित कार्यस्थल भारत में लगातार कम महिला श्रमबल भागीदारी दर (FLFPR) में सुधार के लिए आवश्यक शर्त है। यह भारत के जनसांख्यिकीय लाभांश को साकार करने में एक प्रमुख संरचनात्मक बाधा है।
- सांस्कृतिक बदलाव: सहकर्मियों द्वारा किए जाने वाले उत्पीड़न तथा डिजिटल माध्यमों से होने वाले उत्पीड़न की बढ़ती रिपोर्टिंग सहमति और पेशेवर आचरण की अधिक विकसित होती समझ को दर्शाती है।
कार्यान्वयन की चुनौतियाँ
- असंगठित क्षेत्र में अंतर: भारत के कार्यबल का एक बड़ा हिस्सा प्रभावी सुरक्षा से बाहर है, क्योंकि विशेष रूप से ग्रामीण और अर्ध-शहरी जिलों में LCC या तो प्रभावी रूप से कार्यरत नहीं हैं या उनका गठन ही नहीं हुआ है।
- जागरूकता का अभाव: कई छोटे और मध्यम आकार के उद्यम अपने लिए ICC का गठन करना वैधानिक रूप से अनिवार्य होने से अनभिज्ञ हैं। परिणामस्वरूप, अनुपालन कई मामलों में केवल औपचारिकता तक सीमित रह जाता है।
- साक्ष्य संबंधी जटिलताएँ: डिजिटल उत्पीड़न तथा सहकर्मी-से-सहकर्मी शिकायतों जैसी उभरती श्रेणियाँ ICC के समक्ष नई चुनौतियाँ प्रस्तुत करती हैं। मूल रूप से पदानुक्रम आधारित और प्रत्यक्ष रूप से होने वाले कदाचार से निपटने के लिए बनाए गए तंत्र को अब इन नए स्वरूपों से भी निपटना पड़ रहा है।
- प्रतिशोध का भय: पेशेवर प्रतिकूल परिणामों, सामाजिक कलंक तथा अपर्याप्त व्हिसलब्लोअर सुरक्षा के भय के कारण शिकायतों की कम रिपोर्टिंग अभी भी बनी हुई है।
- समिति के गठन से संबंधित समस्याएँ: समितियों का अनुचित गठन या उनका निष्क्रिय रहना शिकायत निवारण प्रक्रिया की विश्वसनीयता को ही कमजोर करता है।
आगे की राह
- ढाँचे का आधुनिकीकरण: डिजिटल और हाइब्रिड कार्यस्थलों पर होने वाले उत्पीड़न को स्पष्ट रूप से संबोधित करने के लिए नियमों में संशोधन किया जाना चाहिए तथा साक्ष्यों से संबंधित स्पष्ट प्रक्रियाएँ निर्धारित की जानी चाहिए।
- क्षमता निर्माण: शिकायतों के बदलते स्वरूप तथा अचेतन पूर्वाग्रह से संबंधित विषयों पर ICC और LCC के सदस्यों के लिए नियमित प्रशिक्षण आयोजित किया जाना चाहिए।
- श्रम संहिताओं के साथ एकीकरण: POSH अनुपालन की निगरानी को आगामी श्रम संहिताओं के साथ समन्वित किया जाना चाहिए, ताकि संगठित और असंगठित दोनों प्रकार के रोजगार में इसके प्रावधानों का एकसमान प्रवर्तन सुनिश्चित किया जा सके।
स्रोत: BS
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संक्षिप्त समाचार 19-09-2026