पाठ्यक्रम: GS3/ साइबर सुरक्षा
संदर्भ
- इंस्टाग्राम और फेसबुक की मूल कंपनी मेटा ने भारत में बाल यौन शोषण सामग्री को भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र द्वारा संचालित साइबर अपराध पोर्टल के साथ साझा करने पर सहमति व्यक्त की है।
परिचय
- यह कदम मेटा की बढ़ती जाँच-पड़ताल के बीच सामने आया है। ऐसी रिपोर्टें सामने आई थीं कि सोशल मीडिया मंचों पर विज्ञापनों के माध्यम से बाल यौन शोषण से संबंधित सामग्री प्रदर्शित की जा रही थी।
- इससे पहले, भारतीय एजेंसियाँ राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो और लापता एवं शोषित बच्चों के लिए राष्ट्रीय केंद्र के बीच वर्ष 2019 में हुए समझौता ज्ञापन के माध्यम से ऐसी रिपोर्टों तक पहुँच प्राप्त करती थीं।
बाल यौन शोषण सामग्री
- बाल यौन शोषण सामग्री, जिसे सामान्यतः “बाल अश्लील सामग्री” भी कहा जाता है, 18 वर्ष से कम आयु के व्यक्तियों से संबंधित यौन रूप से स्पष्ट कृत्यों के किसी भी दृश्य निरूपण को संदर्भित करती है।
- बाल यौन शोषण सामग्री शोषण की दर्ज की गई प्रति होती है, चाहे वह यौन, शारीरिक, मानसिक, सामाजिक अथवा भावनात्मक शोषण से संबंधित हो, जिसे व्यापक ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म के माध्यम से प्रसारित एवं उपलब्ध कराया जाता है।
सोशल मीडिया बच्चों को किस प्रकार अधिक सुभेद्य बना रहे हैं?
- ऑनलाइन विश्वास अर्जन: अपराधी यौन शोषण अथवा उत्पीड़न के उद्देश्य से बच्चों का विश्वास हासिल करने के लिए सोशल मीडिया का उपयोग करते हैं।
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता द्वारा निर्मित शोषणकारी सामग्री: यह एक उभरती हुई चिंता है, क्योंकि ऐसी सामग्री की पहचान एवं जाँच को अधिक जटिल बना देती है।
- भ्रामक संरचनाएँ एवं व्यसनकारी अभिकल्पना: ये बच्चों को अत्यधिक समय तक मंचों से जुड़े रहने के लिए प्रेरित करती हैं तथा उन्हें चालाकीपूर्ण वाणिज्यिक अथवा हानिकारक सामग्री के संपर्क में लाती हैं।
- धोखाधड़ी एवं प्रतिरूपण: बच्चों की सीमित अंकीय जागरूकता का दुरुपयोग नकली प्रोफाइल, छलपूर्ण संदेशों, खेल संबंधी घोटालों तथा हानिकारक कड़ियों के माध्यम से किया जाता है।
ऑनलाइन बाल शोषण को रोकने के उपाय
- यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम, 2012: इसकी धारा 13 से 15 तक बच्चों का अश्लील उद्देश्यों के लिए उपयोग तथा बाल यौन शोषण सामग्री के भंडारण एवं नियंत्रण से संबंधित प्रावधान किए गए हैं।
- सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000: इसकी धारा 67ख बच्चों को यौन रूप से स्पष्ट कृत्यों में दर्शाने वाली इलेक्ट्रॉनिक सामग्री के प्रकाशन, प्रसारण, अवलोकन, डाउनलोड, विज्ञापन अथवा वितरण को अपराध घोषित करती है।
- भारतीय न्याय संहिता, 2023: इसमें तस्करी किए गए बच्चों के यौन शोषण के विरुद्ध प्रावधान किए गए हैं, जो यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम तथा सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के प्रावधानों के पूरक हैं।
- सहयोग पोर्टल: यह पूरे भारत में अधिकृत एजेंसियों द्वारा अवैध सामग्री को हटाने के लिए मध्यस्थ संस्थाओं को स्वचालित एवं केंद्रीकृत सूचनाएँ भेजने की सुविधा प्रदान करता है।
सोशल मीडिया से उत्पन्न अन्य उभरते खतरे
- भ्रामक सूचना: गलत अथवा जानबूझकर भ्रामक जानकारी तीव्रता से प्रसारित हो सकती है तथा लोगों के ज्ञान एवं निर्णयों को प्रभावित कर सकती है।
- कृत्रिम रूप से परिवर्तित दृश्य-श्रव्य सामग्री: कृत्रिम बुद्धिमत्ता द्वारा निर्मित ऐसी सामग्री का उपयोग प्रतिरूपण, धोखाधड़ी, प्रतिष्ठा को क्षति पहुँचाने तथा सार्वजनिक विमर्श में हेरफेर के लिए किया जा सकता है।
- साइबर अपराध एवं वित्तीय धोखाधड़ी: सोशल मीडिया मंचों का उपयोग छलपूर्ण संदेशों, पहचान की चोरी, निवेश संबंधी योजनाओं तथा प्रतिरूपण सहित साइबर अपराध एवं वित्तीय धोखाधड़ी के लिए तीव्रता से किया जा रहा है।
- प्रतिध्वनि कक्ष एवं ध्रुवीकरण: ये वर्तमान विचारों को और अधिक सुदृढ़ कर सकते हैं, विभिन्न प्रकार के विचारों के संपर्क को सीमित कर सकते हैं तथा सामाजिक विभाजन को बढ़ा सकते हैं।
- साइबर उत्पीड़न: यह व्यक्तियों की सुरक्षा, गरिमा तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कमजोर कर सकता है।
- कट्टरपंथीकरण एवं दुर्भावनापूर्ण प्रचार: सोशल मीडिया के नेटवर्क का उपयोग भर्ती, लामबंदी तथा चरमपंथी विचारों के प्रसार के लिए किया जा सकता है।
आगे की राह
- चूँकि सोशल मीडिया व्यक्तिगत एवं सार्वजनिक जीवन को निरंतर अधिक प्रभावित कर रहे हैं, इसलिए अंकीय सुरक्षा को सुशासन का अभिन्न अंग बनाया जाना आवश्यक है। इसके अंतर्गत नवाचार और निजता, सुरक्षा तथा मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करना होगा।
- भारत के दृष्टिकोण को केवल सामग्री के नियंत्रण से आगे बढ़कर सुरक्षा-आधारित अभिकल्पना की ओर विकसित होना चाहिए। इसके अंतर्गत सोशल मीडिया मंचों में तकनीकी अभिकल्पना के प्रारंभिक चरण से ही उभरते अंकीय खतरों से सुरक्षा के उपायों को अंतर्निहित किया जाना सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
स्रोत: TH