पाठ्यक्रम: GS2/ शासन
संदर्भ
- सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत एक हालिया रिपोर्ट से पता चलता है कि सांसदों और विधायकों के विरुद्ध आपराधिक मामलों के त्वरित निस्तारण के लिए गठित विशेष न्यायालय लंबित मामलों की संख्या को उल्लेखनीय रूप से कम करने में सफल नहीं हुए हैं।
पृष्ठभूमि
- अश्विनी कुमार उपाध्याय बनाम भारत संघ (2017) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने वर्तमान एवं पूर्व सांसदों तथा विधायकों से संबंधित आपराधिक मामलों के त्वरित निस्तारण के लिए 10 राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों में 12 विशेष न्यायालयों की स्थापना का निर्देश दिया था।
- न्यायालय ने इन न्यायालयों को पहले ऐसे मामलों को प्राथमिकता देने का निर्देश दिया, जिनमें आजीवन कारावास का दंड निर्धारित है तथा उसके बाद ऐसे अपराधों से संबंधित मामलों को प्राथमिकता देने को कहा, जिनमें 5 वर्ष या उससे अधिक के कारावास का प्रावधान है।
- उच्च न्यायालयों को निगरानी तंत्र स्थापित करने का निर्देश दिया गया, जबकि विचारण न्यायालयों को दुर्लभ एवं अपरिहार्य परिस्थितियों को छोड़कर कार्यवाही स्थगित करने से बचने का निर्देश दिया गया।
राजनीति का अपराधीकरण
- राजनीति का अपराधीकरण ऐसे व्यक्तियों की निर्वाचन राजनीति में बढ़ती भागीदारी को संदर्भित करता है, जिनकी आपराधिक पृष्ठभूमि रही है। गंभीर आपराधिक आरोप में ऐसे अपराध शामिल हैं, जिनमें अधिकतम 5 वर्ष या उससे अधिक के कारावास का दंड निर्धारित है अथवा जो गैर-जमानती हैं।
- लोकसभा में 543 में से 251 सांसदों ने अपने विरुद्ध लंबित आपराधिक मामलों की घोषणा की थी, जिनमें 170 मामले गंभीर आपराधिक मामलों की श्रेणी में आते हैं और जिनमें 5 वर्ष या उससे अधिक के कारावास का दंड निर्धारित है।
- राज्यसभा में 233 में से 75 सांसदों ने अपने विरुद्ध लंबित आपराधिक मामलों की घोषणा की थी, जिनमें 40 गंभीर आपराधिक मामले शामिल हैं।
- कुल 4,111 राज्य विधायकों में से 2,098 विधायकों ने अपने विरुद्ध लंबित आपराधिक मामलों की घोषणा की थी, जिनमें 1,286 गंभीर आपराधिक मामले शामिल हैं।
राजनीति के अपराधीकरण के कारण
- कमजोर अयोग्यता संबंधी कानून: जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के अंतर्गत उम्मीदवार को केवल दोषसिद्धि के बाद ही चुनाव लड़ने से अयोग्य ठहराया जाता है।
- चूँकि विचारण में कई वर्ष लग जाते हैं, इसलिए आरोपित उम्मीदवार किसी निर्णय के आने से पहले कई चुनाव लड़ सकते हैं।
- धन एवं बाहुबल: वित्तीय संसाधनों और स्थानीय प्रभाव वाले आपराधिक पृष्ठभूमि के व्यक्तियों को प्रायः “विजयी होने की अधिक संभावना वाले” उम्मीदवार के रूप में देखा जाता है।
- मतदाता जागरूकता का निम्न स्तर: शपथपत्रों के माध्यम से उम्मीदवारों से संबंधित जानकारी सार्वजनिक की जाती है, किंतु अनेक मतदाता इससे अवगत नहीं होते अथवा जाति एवं धार्मिक आधार पर मतदान करते हैं।
- राजनीतिक दलों की सहभागिता: राजनीतिक दल प्रायः आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों को चुनाव में उतारने को उनकी “लोकप्रियता” एवं “निर्वाचन संभावनाओं” का हवाला देकर उचित ठहराते हैं।
- वोहरा समिति की रिपोर्ट (1993): इस समिति ने संगठित अपराध, राजनीतिक व्यक्तियों तथा सरकार एवं प्रशासनिक तंत्र के अंदर विद्यमान तत्वों के बीच संबंधों का अध्ययन किया और विधि के शासन पर इनके दुष्परिणामों को रेखांकित किया।
राजनीति के अपराधीकरण के प्रभाव
- लोकतांत्रिक मूल्यों का क्षरण: यह प्रतिनिधिक लोकतंत्र की भावना को कमजोर करता है, क्योंकि इससे स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनावों की आधारभूत अवधारणा प्रभावित होती है तथा मतदाताओं के समक्ष विकल्प सीमित हो जाते हैं।
- भ्रष्टाचार: आपराधिक समूहों की उपस्थिति के कारण मतदाताओं को डराना-धमकाना, मतदान केंद्रों पर नियंत्रण तथा चुनावी अभियानों में काले धन के उपयोग सहित चुनावी कदाचार की घटनाओं में वृद्धि हो सकती है।
- जनविश्वास में कमी: भ्रष्ट एवं आपराधिक पृष्ठभूमि वाले विधायकों का बार-बार निर्वाचित होना मतदाताओं की चुनावी भागीदारी में कमी तथा लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति जनविश्वास के ह्रास का कारण बन सकता है।
प्रमुख समितियों की सिफारिशें
- विधि आयोग की 244वीं रिपोर्ट (2014): विधि आयोग ने ऐसे अपराधों के संबंध में, जिनमें अधिकतम 5 वर्ष या उससे अधिक के कारावास का दंड निर्धारित है, उम्मीदवारों के विरुद्ध आरोप निर्धारित होते ही उन्हें चुनाव लड़ने से अयोग्य ठहराने की सिफारिश की।
- रिपोर्ट में वर्तमान सांसदों एवं विधायकों के विरुद्ध मामलों के त्वरित निस्तारण के लिए त्वरित विचारण न्यायालयों की स्थापना के माध्यम से विचारण में तीव्रता लाने की विशेष सिफारिश की गई।
- संविधान के कार्यकरण की समीक्षा हेतु राष्ट्रीय आयोग (2002): आयोग ने राजनीतिक दलों की जवाबदेही बढ़ाने के लिए राजनीतिक दलों के चुनावी व्यय का वैधानिक लेखापरीक्षण तथा उम्मीदवारों की संपत्ति एवं देनदारियों के प्रकटीकरण सहित विभिन्न उपायों की सिफारिश की।
- इंद्रजीत गुप्ता समिति (1998) एवं द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (2007): दोनों ने काले धन के उपयोग पर अंकुश लगाने और भ्रष्टाचार को कम करने के लिए चुनावों के आंशिक राज्य वित्तपोषण की सिफारिश की।
सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप
- लिली थॉमस बनाम भारत संघ (2013): न्यायालय ने निर्णय दिया कि किसी वर्तमान सांसद, विधायक या विधान परिषद सदस्य को ऐसे अपराध में दोषसिद्धि होने पर, जिसमें दो वर्ष या उससे अधिक के कारावास का दंड दिया गया हो, तत्काल अयोग्य घोषित कर दिया जाएगा।
- पब्लिक इंटरेस्ट फाउंडेशन बनाम भारत संघ (2018): न्यायालय ने राजनीतिक दलों को उम्मीदवारों के आपराधिक अभिलेख सार्वजनिक करने का निर्देश दिया, जिसमें अपराधों एवं आरोपों की प्रकृति का विवरण शामिल हो।
- 2020 में: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने राजनीतिक दलों को निर्देश दिया कि वे लंबित आपराधिक मामलों वाले उम्मीदवारों का विवरण अपनी ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म, सोशल मीडिया और समाचार-पत्रों में प्रकाशित करें। साथ ही, उम्मीदवार के चयन के 48 घंटे के अंदर उसके चयन के कारणों का भी उल्लेख करने का निर्देश दिया गया।
आगे की राह
- राजनीतिक हस्तक्षेप से संस्थागत सुरक्षा उपायों के साथ स्वतंत्र अभियोजन शाखाओं की स्थापना की जानी चाहिए।
- उच्च न्यायालयों के समक्ष लंबित स्थगन एवं आरोप निरस्तीकरण याचिकाओं के समयबद्ध निस्तारण की व्यवस्था की जानी चाहिए।
- साक्षी संरक्षण योजना, 2018 के प्रभावी क्रियान्वयन को सुदृढ़ किया जाना चाहिए।
- जाँच, आरोप-पत्र दाखिल करने, समन की तामील, गवाहों की उपस्थिति, स्थगन तथा स्थगनादेशों की निगरानी के लिए अंकीय वाद-निगरानी प्रणालियों का उपयोग किया जाना चाहिए।
- निर्वाचन संबंधी अयोग्यता के किसी भी सुधार में राजनीति के अपराधीकरण को रोकने के उद्देश्य तथा उचित प्रक्रिया एवं निर्दोषता की पूर्वधारणा के सिद्धांत के बीच संतुलन स्थापित किया जाना चाहिए।
स्रोत: TH
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संक्षिप्त समाचार 15-09-2026