पाठ्यक्रम: GS2/शासन
संदर्भ
- हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने सड़क परिवहन मंत्रालय को सीट बेल्ट, हेलमेट एवं बच्चों के लिए सुरक्षा प्रणाली के नियमित उपयोग की आदत विकसित करने तथा सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मृत्युओं को कम करने के उपायों की समीक्षा करने को कहा।
भारत में सड़क दुर्घटनाओं से होने वाली मृत्यु
- भारत में विश्व के लगभग 1% वाहन होने के बावजूद वैश्विक सड़क दुर्घटना मृत्यु का लगभग 11% भारत में होता है, जो देश में सड़क सुरक्षा की गंभीर चुनौती को दर्शाता है।
- राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के अनुसार, वर्ष 2024 में यातायात दुर्घटनाओं में 1.99 लाख लोगों की मृत्यु हुई, जो वर्ष 2023 की तुलना में 0.79% अधिक है।
- सड़क दुर्घटनाएँ: वर्ष 2024 में दर्ज 1.99 लाख यातायात-संबंधी मौतों में से 1.75 लाख (88%) मृत्युएँ सड़क दुर्घटनाओं के कारण हुईं।
- सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के आँकड़ों के अनुसार, वर्ष 2024 में सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मृत्युओं में दोपहिया वाहन चालकों की हिस्सेदारी 46.2%, जबकि पैदल यात्रियों की हिस्सेदारी 20.6% थी।
भारत में सड़क दुर्घटनाओं की बढ़ती संख्या के कारण
- अत्यधिक गति एवं लापरवाह वाहन चालन: अत्यधिक गति, खतरनाक ढंग से ओवरटेक करना, नशे में वाहन चलाना तथा वाहन चलाते समय मोबाइल फोन का उपयोग सड़क दुर्घटनाओं के प्रमुख कारणों में शामिल हैं।
- खराब सड़क अवसंरचना: खराब रखरखाव वाली सड़कें, गड्ढे, अपर्याप्त संकेतक, अपर्याप्त प्रकाश व्यवस्था तथा असुरक्षित सड़क अभिकल्पना दुर्घटनाओं के जोखिम को बढ़ाते हैं।
- यातायात नियमों का कमजोर प्रवर्तन: अपर्याप्त निगरानी तथा यातायात कानूनों के असंगत प्रवर्तन के कारण सुरक्षा नियमों के अनुपालन का स्तर कम रहता है।
- उचित चालक प्रशिक्षण का अभाव: कमजोर लाइसेंसिंग व्यवस्था तथा अपर्याप्त चालक प्रशिक्षण के कारण अकुशल एवं गैर-जिम्मेदार वाहन चालन व्यवहार को बढ़ावा मिलता है।
- वाहनों की तीव्र वृद्धि एवं यातायात जाम: सड़क अवसंरचना के समानुपातिक विस्तार के बिना वाहनों की संख्या में वृद्धि से अव्यवस्थित एवं असुरक्षित यातायात परिस्थितियाँ उत्पन्न होती हैं।
- आपातकालीन एवं आघात चिकित्सा व्यवस्था की कमजोरी: चिकित्सीय सहायता में विलंब तथा विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में पर्याप्त आघात चिकित्सा सुविधाओं का अभाव दुर्घटना के बाद होने वाली मौतों की संख्या बढ़ाता है।
सुरक्षित प्रणाली दृष्टिकोण की आवश्यकता
- सुरक्षित सड़क अवसंरचना: सरकारों को तकनीकी उपायों, बेहतर चौराहा अभिकल्पना, पर्याप्त प्रकाश व्यवस्था तथा यातायात के उचित पृथक्करण के माध्यम से दुर्घटना-प्रवण क्षेत्रों एवं दुर्घटना संभावित स्थलों की पहचान कर उनका सुधार करना चाहिए।
- गति प्रबंधन: सड़कों का निर्माण एवं विनियमन आसपास के वातावरण के अनुरूप सुरक्षित परिचालन गति को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए। विशेष रूप से विद्यालय क्षेत्रों तथा अधिक पैदल यात्री गतिविधि वाले क्षेत्रों में गति सीमा का प्रभावी प्रबंधन आवश्यक है।
- अधिक सुरक्षित वाहन: वाहन निर्माताओं को प्रभावी सीट बेल्ट चेतावनी प्रणालियों तथा अन्य सुरक्षा प्रणालियों को शामिल करने के लिए प्रोत्साहित या बाध्य किया जाना चाहिए, जिन्हें निष्क्रिय करना या उनमें छेड़छाड़ करना कठिन हो।
- असुरक्षित सड़क उपयोगकर्ताओं का संरक्षण: सड़क नियोजन में पैदल यात्रियों, साइकिल चालकों, बच्चों एवं दोपहिया वाहन उपयोगकर्ताओं को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, क्योंकि दुर्घटना की स्थिति में उन्हें अपेक्षाकृत कम शारीरिक सुरक्षा प्राप्त होती है।
- दुर्घटना के बाद बेहतर सहायता: समय पर आघात चिकित्सा, आपातकालीन चिकित्सा सेवाएँ तथा दुर्घटना पीड़ितों को शीघ्र अस्पताल पहुँचाने की व्यवस्था गंभीर दुर्घटनाओं के बाद जीवित बचने की संभावना को काफी बढ़ा सकती है।
सड़क सुरक्षा के लिए उठाए गए कदम
- वैश्विक स्तर पर उपाय:
- सड़क सुरक्षा एक सार्वजनिक स्वास्थ्य एवं विकास संबंधी प्राथमिकता है और संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
- वर्ष 2020 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 2021–2030 के लिए सड़क सुरक्षा कार्रवाई दशक प्रारंभ किया, जिसका उद्देश्य वर्ष 2030 तक सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मृत्यु एवं चोटों को कम से कम 50% तक कम करना है।
- ब्रासीलिया घोषणा-पत्र: भारत वर्ष 2015 में ब्रासीलिया घोषणा-पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले प्रारंभिक 100 से अधिक देशों में शामिल था। इसके माध्यम से भारत ने सतत विकास लक्ष्य 3.6 को प्राप्त करने की प्रतिबद्धता व्यक्त की, जिसका उद्देश्य वर्ष 2030 तक सड़क दुर्घटनाओं से होने वाली वैश्विक मृत्यु एवं चोटों की संख्या को आधा करना है।
- भारत द्वारा उठाए गए कदम:
- मोटर वाहन (संशोधन) अधिनियम, 2019 का क्रियान्वयन: इस अधिनियम के अंतर्गत यातायात नियमों के उल्लंघन पर जुर्माने में वृद्धि, नियमों के उल्लंघन की इलेक्ट्रॉनिक निगरानी तथा नाबालिगों द्वारा वाहन चलाने के मामलों में दंड को अधिक कठोर बनाया गया है।
- वाहन परीक्षण एवं बीमा संबंधी सुधार: वाहनों की उपयुक्तता जाँच का कंप्यूटरीकरण एवं स्वचालन, दोषपूर्ण वाहनों को वापस मंगाने की व्यवस्था, तृतीय-पक्ष बीमा व्यवस्था को सुव्यवस्थित करना तथा दुर्घटना कर भागने के मामलों में बढ़ा हुआ मुआवजा आदि उपाय किए गए हैं।
- इलेक्ट्रॉनिक विस्तृत दुर्घटना प्रतिवेदन / एकीकृत सड़क दुर्घटना आँकड़ा तंत्र: यह सड़क दुर्घटनाओं के आँकड़ों के केंद्रीकृत संकलन, प्रबंधन एवं विश्लेषण की व्यवस्था है, जिसका उद्देश्य सड़क सुरक्षा में सुधार करना है।
- सद्भावी सहायक व्यवस्था: यह व्यवस्था आम नागरिकों को अनावश्यक कानूनी या प्रक्रियात्मक उत्पीड़न के भय के बिना सड़क दुर्घटना के पीड़ितों की सहायता करने के लिए प्रोत्साहित करती है।
प्रमुख समितियाँ एवं नीतिगत ढाँचे
- सड़क सुरक्षा पर सर्वोच्च न्यायालय की समिति: सर्वोच्च न्यायालय की सड़क सुरक्षा समिति ने मोटर वाहन अधिनियम, 1988 के अनुरूप सड़क सुरक्षा में सुधार के लिए प्रत्येक जिले में जिला सड़क सुरक्षा समितियों के गठन को अनिवार्य किया है।
- सुंदर समिति : सड़क सुरक्षा एवं यातायात प्रबंधन, 2005: समिति ने राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा नीति के निर्माण की सिफारिश की, जिसे वर्ष 2010 में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने स्वीकृति प्रदान की।
- समिति ने सुरक्षा संबंधी नियमों एवं उनके प्रवर्तन की निगरानी के लिए राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा बोर्ड की स्थापना का भी प्रस्ताव दिया।
निष्कर्ष
- सड़क दुर्घटनाओं से होने वाली मृत्युओं को कम करने के लिए भारत को सड़क सुरक्षा को केवल यातायात नियमों के अनुपालन का विषय मानने के बजाय इसे एक प्रमुख सार्वजनिक नीति प्राथमिकता के रूप में देखना होगा।
- प्रवर्तन को सुदृढ़ करने के साथ-साथ सुरक्षित सड़क अवसंरचना, उत्तरदायी वाहन अभिकल्पना, प्रभावी गति प्रबंधन तथा समयबद्ध आघात चिकित्सा व्यवस्था को समान रूप से सुदृढ़ करना आवश्यक है।
Source: TH
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