पाठ्यक्रम: GS3/ कृषि
संदर्भ
- NSO की ‘फसल सांख्यिकी में सुधार योजना पर वार्षिक रिपोर्ट, 2023-24’ ने फसल कटाई प्रयोगों (CCEs) में गंभीर प्रक्रियात्मक कमियों को उजागर किया है। CCEs भारत में फसल उत्पादन के अनुमान तैयार करने की आधारभूत प्रक्रिया हैं।
उत्पादन के अनुमान कैसे तैयार किए जाते हैं?
- अंतिम उत्पादन = फसल के अंतर्गत क्षेत्रफल × प्रति हेक्टेयर औसत उपज
- उपज का अनुमान मुख्यतः फसल कटाई प्रयोगों (CCEs) के माध्यम से लगाया जाता है। इसमें वैज्ञानिक रूप से चयनित भूखंड से फसल की कटाई, मड़ाई और तौल की जाती है तथा इसके आधार पर प्रति हेक्टेयर उपज निर्धारित की जाती है। इसके बाद इस आंकड़े को जिला, राज्य एवं राष्ट्रीय स्तर तक विस्तारित किया जाता है।
- CCEs का संचालन राज्य कृषि सांख्यिकी प्राधिकरणों (SASAs) द्वारा किया जाता है, जबकि सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) के फील्ड ऑपरेशंस डिवीजन द्वारा तकनीकी मार्गदर्शन प्रदान किया जाता है।
- CCEs का दायरा 1973-74 में 1.73 लाख से बढ़कर 2023-24 में 11.62 लाख से अधिक हो गया है। हालांकि, नागालैंड और सिक्किम में अभी भी फसल अनुमान सर्वेक्षण आयोजित नहीं किए जाते हैं।
फसल कटाई प्रयोग
- फसल सांख्यिकी सुधार (ICS) योजना वर्ष 1973-74 में शुरू की गई थी।
- भूमि अभिलेखों का रखरखाव करने वाले 19 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों (UTs) में फसल उपज का आकलन और CCEs की निगरानी की गई।
- CCEs का संचालन तथा आंकड़ों का संकलन राज्य कृषि सांख्यिकी प्राधिकरणों (SASAs) की जिम्मेदारी है, जबकि MoSPI के अधीन फील्ड ऑपरेशंस डिवीजन राज्यों को तकनीकी मार्गदर्शन प्रदान करता है।
- इन आंकड़ों के आधार पर राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) 33 प्रमुख फसलों के लिए औसत उपज, सांख्यिकीय त्रुटि तथा प्रति हेक्टेयर उपज के अनुमान तैयार करता है।
- इन ‘त्वरित अनुमानों ’ का उपयोग राज्यों द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों के सत्यापन के लिए किया जाता है।
रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष
- प्रक्रियात्मक अनुपालन में कमी: 2023-24 में केवल 72% CCEs निर्धारित वैज्ञानिक प्रक्रिया के अनुरूप संचालित किए गए, जबकि 28% CCEs में प्रक्रियात्मक कमियाँ, नियमों का उल्लंघन या अन्य त्रुटियाँ पाई गईं।
- इसका अर्थ है कि लगभग प्रत्येक चार में से एक CCE निर्धारित मानकों के अनुरूप संचालित नहीं किया गया।
- रिकॉर्डिंग संबंधी त्रुटियाँ: लगभग 10% मामलों में सहायक जानकारी दर्ज करने में गंभीर त्रुटियाँ पाई गईं।
- सिंचाई, बीज की किस्म, उर्वरक आदि से संबंधित सहायक विवरण बाद के विश्लेषण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
- यदि यह जानकारी गलत हो, तो उत्पादन के विश्लेषण और तुलनात्मक आकलन दोनों प्रभावित हो सकते हैं।
- नमूना प्रतिस्थापन संबंधी उल्लंघन: राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न मौसमों में पर्यवेक्षण की दर 80% से 88% के बीच रही। इसका अर्थ है कि लगभग प्रत्येक पाँच में से एक CCE बिना पर्यवेक्षण के संचालित हुआ।
- अप्रशिक्षित कर्मियों का उपयोग: झारखंड में 41% CCEs और उत्तर प्रदेश में 40% CCEs अप्रशिक्षित कर्मचारियों द्वारा संचालित किए गए।
निहितार्थ
- नीति-निर्धारण में विकृति: गलत उपज संबंधी आंकड़े न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) के अंतर्गत खरीद के लक्ष्यों, सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के बफर स्टॉक की योजना तथा निर्यात या आयात संबंधी निर्णयों को प्रभावित कर सकते हैं। इसके परिणामस्वरूप किसानों की आय और उपभोक्ता कीमतों पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।
- फसल बीमा: कई राज्य बीमा दावों के निपटान को CCE-आधारित उपज अनुमानों से जोड़ते हैं। आंकड़ों में त्रुटियों के कारण दावों को गलत तरीके से अस्वीकार किया जा सकता है या आवश्यकता से अधिक भुगतान किया जा सकता है।
- अंतरराष्ट्रीय विश्वसनीयता: वैश्विक एजेंसियाँ और व्यापारिक साझेदार भारत के आधिकारिक उत्पादन आंकड़ों का उपयोग करते हैं। आंकड़ों में विसंगतियाँ व्यापार वार्ताओं और खाद्य सुरक्षा आकलनों में भारत की स्थिति एवं विश्वसनीयता को प्रभावित कर सकती हैं।
- संघीय समन्वय में कमी: राज्यों के बीच अनुपालन में व्यापक अंतर SASAs की क्षमता और निगरानी व्यवस्था में असमानता को दर्शाता है। यह सांख्यिकीय संघवाद में व्यापक शासन संबंधी चुनौती की ओर संकेत करता है।
आगे की राह
- GCES योजनाओं को नियमित रूप से अद्यतन किया जाना चाहिए और समय पर क्षेत्र चयन सुनिश्चित किया जाना चाहिए, ताकि मजबूरी में गांव या भूखंड बदलने की स्थिति को रोका जा सके।
- प्रशासनिक उपायों के माध्यम से CCEs के 100% पर्यवेक्षण को अनिवार्य किया जाना चाहिए। इसके लिए जियो-टैगिंग और मोबाइल-आधारित रिपोर्टिंग जैसी प्रौद्योगिकियों का उपयोग करते हुए वास्तविक समय निगरानी व्यवस्था विकसित की जा सकती है।
- CCEs के लिए केवल प्रशिक्षित कर्मियों की तैनाती की जानी चाहिए तथा समय-समय पर पुनश्चर्या प्रशिक्षण और जवाबदेही तंत्र सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
- सर्वेक्षण के समय प्रयोगात्मक फसलों की अनुपलब्धता को कम करने के लिए SASAs और किसानों के बीच समन्वय को सुदृढ़ किया जाना चाहिए।
- जमीनी स्तर पर किए जाने वाले CCEs के साथ रिमोट सेंसिंग और उपग्रह-आधारित उपज अनुमान को एक क्रॉस-वैलिडेशन उपकरण के रूप में शामिल करने पर विचार किया जाना चाहिए। इसे डिजिटल कृषि मिशन जैसी पहलों के अंतर्गत प्रायोगिक स्तर पर लागू किया जा रहा है।
स्रोत: DTE
Previous article
गगनयान की तापीय सुरक्षा प्रणाली
Next article
सरकार द्वारा नई स्वदेशीकरण सूची अधिसूचित