पाठ्यक्रम: GS3/अवसंरचना
संदर्भ
- भारत में शासन-व्यवस्था में डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI) के माध्यम से मौलिक परिवर्तन आया है।
भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था
- वर्तमान में डिजिटल अर्थव्यवस्था भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में लगभग 12–14% का योगदान देती है और अगले दशक में इसके बढ़कर 20% तक पहुँचने का अनुमान है।
- State of India’s Digital Economy Report 2026 के अनुसार, भारत अब विश्व की पाँचवीं सबसे अधिक डिजिटलीकृत अर्थव्यवस्था तथा G20 देशों में चौथी सर्वोच्च रैंक वाली अर्थव्यवस्था है।
- भारत की डिजिटल आत्मनिर्भरता के परिदृश्य में प्रमुख उपलब्धियाँ:

- तीसरा सबसे बड़ा निर्यात क्षेत्र: इलेक्ट्रॉनिक वस्तुएँ अब भारत की तीसरी सबसे बड़ी निर्यात श्रेणी बन गई हैं।
- रोजगार एवं महिलाओं की भागीदारी: इलेक्ट्रॉनिक विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र लगभग 25 लाख रोजगार को समर्थन प्रदान करता है, जिसमें महिलाओं की भागीदारी लगभग 30% है।
- वैश्विक मोबाइल विनिर्माण केंद्र: भारत अब विश्व का दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल फोन निर्माता है।
डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI)
- संयुक्त राष्ट्र डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना को आधारभूत डिजिटल प्रणालियों के एक ऐसे समूह के रूप में परिभाषित करता है, जो आधुनिक समाजों की आधारशिला का कार्य करता है।
- ये प्रणालियाँ लोगों, व्यवसायों और सरकारों के बीच सुरक्षित एवं निर्बाध अंतःक्रिया को सक्षम बनाती हैं।
- डिजिटल अवसंरचना को सार्वजनिक हित में प्रभावी बनाने के लिए इसका समावेशी, अंतःप्रचालनीय और सार्वजनिक हित में संचालित होना आवश्यक है।
- जब इसे भुगतान और डेटा विनिमय के ढाँचे से जोड़ा जाता है, तो यह एक एकीकृत डिजिटल संरचना का निर्माण करती है, जो राज्य की क्षमता को सुदृढ़ करती है और अवसरों का विस्तार करती है।
भारत की DPI की आधारशिला: JAM त्रिमूर्ति
- जन-धन बैंक खाते, आधार नामांकन और व्यापक मोबाइल फोन पहुँच ने भारत के डिजिटल परिवर्तन के लिए आधारभूत संरचना तैयार की।
- प्रधानमंत्री जन-धन योजना (2014): इसे वित्तीय समावेशन के लिए राष्ट्रीय मिशन के रूप में शुरू किया गया था। इसका उद्देश्य भारत के प्रत्येक बैंकिंग सुविधा से वंचित वयस्क को बैंक खाता उपलब्ध कराना था।
- इससे वित्तीय भागीदारी का विस्तार हुआ और बचत औपचारिक वित्तीय प्रणाली में शामिल हुई, जिससे लोगों की आर्थिक निर्णय लेने की क्षमता सुदृढ़ हुई।
- आधार: इसने कुशल सेवा वितरण के लिए विशिष्ट पहचान और सुरक्षित प्रमाणीकरण की सुविधा प्रदान की। इससे सेवाओं तक पहुँच अधिक विश्वसनीय एवं पारदर्शी हुई।
- सस्ती मोबाइल डेटा सेवाएँ: वायरलेस डेटा की लागत में भारी कमी आई, जिससे डिजिटल सेवाएँ अधिक किफायती और सुलभ हुईं।
- मोबाइल फोन एवं कनेक्टिविटी: पाँचवीं पीढ़ी (5G) की मोबाइल सेवाएँ अब 99.9% जिलों में उपलब्ध हैं और 85% जनसंख्या को कवर करती हैं।
- इस व्यापक डिजिटल पहुँच ने यह सुनिश्चित किया कि पहचान और बैंकिंग सेवाएँ केवल शहरी केंद्रों तक सीमित न रहें।

चुनौतियाँ
- खंडित संघीय समन्वय: DPI के क्रियान्वयन के लिए प्रायः केंद्र सरकार, राज्य सरकारों, स्थानीय निकायों और निजी हितधारकों के बीच समन्वय आवश्यक होता है।
- राज्यों में डिजिटल तैयारी और प्रशासनिक क्षमता में अंतर के कारण इसके क्रियान्वयन एवं सेवा वितरण में असमानता उत्पन्न होती है।
- निजी प्रौद्योगिकी पारिस्थितिकी तंत्र पर निर्भरता: यद्यपि DPI सार्वजनिक क्षेत्र के नेतृत्व में संचालित है, अनेक सेवाएँ निजी फिनटेक कंपनियों पर काफी निर्भर हैं। इससे प्रणालीगत कमजोरियाँ उत्पन्न हो सकती हैं तथा रणनीतिक स्वायत्तता प्रभावित हो सकती है।
- भाषा एवं सुगम्यता संबंधी बाधाएँ: अनेक डिजिटल प्लेटफॉर्म अभी भी क्षेत्रीय भाषाओं या दिव्यांगजनों के लिए पूर्ण रूप से सुलभ नहीं हैं।
- नागरिकों में विश्वास की कमी: व्यक्तिगत डेटा के दुरुपयोग, डिजिटल धोखाधड़ी, निगरानी तथा ऑनलाइन ठगी से संबंधित चिंताएँ डिजिटल प्रणालियों के प्रति जनविश्वास को कमजोर करती हैं।
- कमजोर शिकायत निवारण तंत्र: शिकायतों के समाधान में होने वाली देरी DPI प्रणालियों की प्रभावशीलता और विश्वसनीयता को कम करती है।
- सीमापार डेटा एवं संप्रभुता संबंधी चिंताएँ: डिजिटल प्लेटफॉर्म और क्लाउड अवसंरचना के बढ़ते वैश्विक एकीकरण के साथ डेटा स्थानीयकरण, सीमापार डेटा प्रवाह एवं राष्ट्रीय डिजिटल संप्रभुता की सुरक्षा से संबंधित चिंताएँ बढ़ रही हैं।
- पर्यावरणीय एवं ऊर्जा लागत: बड़े पैमाने पर डिजिटल अवसंरचना, डेटा सेंटर, दूरसंचार नेटवर्क और क्लाउड कंप्यूटिंग प्रणालियाँ पर्याप्त ऊर्जा की खपत करती हैं तथा पर्यावरण पर दबाव बढ़ाती हैं।
सरकारी पहल
- यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI): यह व्यक्तियों और व्यापारियों के बीच वास्तविक समय में त्वरित, अंतःप्रचालनीय एवं सुरक्षित लेन-देन को सक्षम बनाता है।
- अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने बढ़ते खुदरा डिजिटल भुगतानों पर अपनी 2025 की रिपोर्ट में लेन-देन की मात्रा के आधार पर UPI को विश्व की सबसे बड़ी खुदरा त्वरित भुगतान प्रणाली के रूप में मान्यता दी।
- वित्त वर्ष 2025-26 में भारत के डिजिटल भुगतान लेन-देन की मात्रा में UPI की हिस्सेदारी 85% थी।

- सार्वजनिक वित्तीय प्रबंधन प्रणाली (PFMS): यह एक वेब-आधारित ऑनलाइन लेन-देन प्रणाली है, जो सरकारी धन की शुरुआत से अंत तक निगरानी तथा कार्यान्वयन एजेंसियों और लाभार्थियों को इलेक्ट्रॉनिक भुगतान की सुविधा प्रदान करती है।
- इस सुधार से डुप्लिकेट और फर्जी लाभार्थियों को हटाने तथा वित्तीय रिसाव को कम करने में सहायता मिली।
- ओपन नेटवर्क फॉर डिजिटल कॉमर्स (ONDC): वर्ष 2022 में शुरू किया गया ONDC एक खुला नेटवर्क है, जिसका उद्देश्य किसी एकल मार्केटप्लेस के बजाय अंतःप्रचालनीय प्लेटफॉर्मों के माध्यम से खरीदारों और विक्रेताओं को जोड़कर डिजिटल वाणिज्य का लोकतंत्रीकरण करना है।
- डिजिलॉकर: वर्ष 2015 में शुरू किया गया डिजिलॉकर नागरिकों के लिए एक सुरक्षित डिजिटल दस्तावेज़ वॉलेट के रूप में विकसित किया गया। यह व्यक्तियों को प्रमाणित इलेक्ट्रॉनिक दस्तावेजों को सुरक्षित रखने, उन तक पहुँचने तथा सहमति-आधारित पहुँच के माध्यम से साझा करने की सुविधा देता है।
- उमंग(UMANG): वर्ष 2017 में शुरू किया गया UMANG (नवीन युग के शासन के लिए एकीकृत मोबाइल अनुप्रयोग) भारत में मोबाइल शासन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से विकसित किया गया। यह केंद्र, राज्य और स्थानीय सरकारों की सेवाओं तक पहुँच के लिए एकल-खिड़की मोबाइल एवं वेब प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराता है।
- IndiaAI मिशन: यह कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) शिक्षा, अवसंरचना और उत्तरदायी AI के उपयोग को सुदृढ़ कर रहा है। इसके माध्यम से स्कूलों, उच्च शिक्षण संस्थानों एवं व्यावसायिक प्रशिक्षण कार्यक्रमों में AI कौशल को बढ़ावा दिया जा रहा है।
- पीएम गतिशक्ति: वर्ष 2021 में शुरू किया गया पीएम गतिशक्ति राष्ट्रीय मास्टर प्लान एक GIS-आधारित डिजिटल प्लेटफॉर्म है, जो अवसंरचना परियोजनाओं की एकीकृत योजना और समन्वित क्रियान्वयन में सहायता करता है।
- वैश्विक साझेदारी: भारत सरकार ने 24 देशों के साथ इंडिया स्टैक और डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना के क्षेत्र में सहयोग के लिए समझौता ज्ञापन (MoU) और समझौते किए हैं।
- इन साझेदारियों का उद्देश्य तकनीकी ज्ञान का आदान-प्रदान करना तथा डिजिटल शासन के प्लेटफॉर्मों को अन्य देशों में दोहराने और अपनाने में सहायता करना है।
निष्कर्ष
- भारत ने अपेक्षाकृत कम समय में विश्वस्तरीय डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना का निर्माण किया है और इसने सार्वजनिक सेवाओं के वितरण में समावेशन, दक्षता तथा सुरक्षा को स्पष्ट रूप से बेहतर बनाया है।
- आगे की चुनौती इस डिजिटल संरचना को प्रतिस्थापित करना नहीं, बल्कि इसकी पहुँच को और व्यापक बनाना, इसके शासन तंत्र को सुदृढ़ करना तथा डिजिटल अर्थव्यवस्था के हाशिये पर रह गए लोगों तक इसके लाभों का विस्तार करना है।
स्रोत: PIB
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