श्री अरविंद
पाठ्यक्रम: GS1/इतिहास
संदर्भ
- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने श्री अरविंद की जयंती पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। श्री अरविंद का जन्म 15 अगस्त 1872 को हुआ था और उनका निधन 5 दिसंबर 1950 को हुआ।
प्रारंभिक जीवन
- उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा इंग्लैंड में सेंट पॉल्स स्कूल, लंदन तथा किंग्स कॉलेज, कैम्ब्रिज से प्राप्त की।
- वर्ष 1893 में वे भारत लौटे और अगले तेरह वर्षों तक बड़ौदा रियासत में तथा बड़ौदा कॉलेज में प्राध्यापक के रूप में कार्य किया।
स्वतंत्रता संग्राम में भूमिका
- उन्होंने युवाओं को संगठित करने के लिए कई युवा संगठनों की स्थापना में सहायता की। इनमें वर्ष 1902 में कलकत्ता में स्थापित अनुशीलन समिति भी शामिल थी।
- वर्ष 1906 में अरविंद को कलकत्ता के नेशनल कॉलेज (बंगाल नेशनल कॉलेज) का प्रथम प्राचार्य नियुक्त किया गया। उन्होंने भारतीय युवाओं को राष्ट्रीय शिक्षा प्रदान करना प्रारंभ किया।
- वे भारत के पहले ऐसे राजनीतिक नेताओं में थे जिन्होंने अपने समाचार-पत्र ‘वंदे मातरम्’ के माध्यम से देश के लिए पूर्ण स्वतंत्रता का विचार खुले रूप से प्रस्तुत किया।
- वर्ष 1907 में कांग्रेस के सूरत अधिवेशन में उन्होंने उग्र राष्ट्रवादी नेताओं के साथ नेतृत्व किया। वर्ष 1908 में उन्हें अलीपुर बम कांड के संबंध में गिरफ्तार किया गया।
योगिक जीवन
- श्री अरविंद ने वर्ष 1905 में बड़ौदा में योग का अभ्यास प्रारंभ किया था। वर्ष 1910 में उन्होंने राजनीति से स्वयं को अलग कर लिया और अपने आंतरिक आध्यात्मिक जीवन एवं साधना के लिए पूरी तरह समर्पित होने के उद्देश्य से पांडिचेरी चले गए।
- पांडिचेरी में अपने लगभग चालीस वर्षों के प्रवास के दौरान उन्होंने आध्यात्मिक साधना की एक नई पद्धति विकसित की, जिसे उन्होंने ‘समन्वित योग’ कहा।
- वर्ष 1926 में उन्होंने श्री अरविंद आश्रम की स्थापना की।
साहित्यिक कृतियाँ
- द लाइफ डिवाइन: इसमें समन्वित योग के दार्शनिक पक्ष का विवेचन किया गया है।
- सिंथेसिस ऑफ योगा: इसमें समन्वित योग के सिद्धांतों और पद्धतियों का वर्णन किया गया है।
- सावित्री: ए लीजेंड एंड ए सिंबल: यह एक महाकाव्यात्मक काव्य रचना है।
- उन्होंने दो साप्ताहिक पत्र भी प्रारंभ किए—अंग्रेजी में ‘कर्मयोगिन’ और बंगाली में ‘धर्म’।
स्रोत: AIR
शाही भारतीय नौसेना विद्रोह
पाठ्यक्रम: GS1/इतिहास
समाचार में
- भारत के 80वें स्वतंत्रता दिवस का अवसर वर्ष 1946 के शाही भारतीय नौसेना विद्रोह को स्मरण करने का अवसर प्रदान करता है। इस विद्रोह ने ब्रिटिश शासन को गंभीर चुनौती दी और भारत की स्वतंत्रता की प्रक्रिया को तीव्र करने में योगदान दिया।
शाही भारतीय नौसेना विद्रोह
- यह विद्रोह फरवरी 1946 में हुआ था। यह ब्रिटिश शासन के विरुद्ध भारतीय नौसैनिक बलों का एक व्यापक औपनिवेशिक-विरोधी विद्रोह था।
- इसकी शुरुआत बंबई से हुई और शीघ्र ही यह ब्रिटिश भारत के विभिन्न नौसैनिक प्रतिष्ठानों तक फैल गया। इसमें लगभग 20,000 व्यक्ति, 78 जहाज और 20 तटीय प्रतिष्ठान शामिल हुए।
- इसे स्वतंत्रता से पहले ब्रिटिश शासन के लिए उत्पन्न अंतिम बड़े खतरों में से एक माना जाता है।
उत्पत्ति एवं इसके पीछे के कारण
- शाही भारतीय नौसेना की स्थापना वर्ष 1934 में हुई थी। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान इसका तीव्रता से विस्तार हुआ और इसकी संख्या 2,000 से भी कम कर्मियों से बढ़कर लगभग 30,000 हो गई।
- युद्ध की समाप्ति के पश्चात ब्रिटेन ने नौसैनिक बलों का विसैन्यीकरण करने तथा इसकी संख्या घटाकर लगभग 11,000 करने की योजना बनाई। इससे नौसैनिकों में भय और असंतोष उत्पन्न हुआ।
- नौसैनिक अपने युद्धकालीन योगदान के बाद उचित सम्मान तथा रोजगार के बेहतर अवसरों की अपेक्षा कर रहे थे।
- उन्हें नस्लीय भेदभाव, खराब भोजन, असंतोषजनक आवास व्यवस्था, अपर्याप्त वेतन एवं भत्तों तथा ब्रिटिश अधिकारियों के कठोर व्यवहार का सामना करना पड़ रहा था।
- वर्ष 1942 से 1945 के बीच शाही भारतीय नौसेना में पहले ही नौ अलग-अलग विद्रोह हो चुके थे, जो मनोबल और नेतृत्व से जुड़ी गंभीर समस्याओं को उजागर करते थे।
- भारतीय राष्ट्रीय सेना के मुकदमों ने नौसैनिकों के बीच सुदृढ़ राजनीतिक और राष्ट्रवादी वातावरण तैयार किया।
- बंबई स्थित एचएमआईएस तलवार में असंतोष बढ़ रहा था और नवंबर 1945 से नौसैनिक ब्रिटिश-विरोधी नारे लिख और प्रदर्शित कर रहे थे।
- तनाव तब चरम पर पहुँच गया जब कमांडर आर्थर फ्रेडरिक किंग पर नौसैनिकों का अपमान करने और उनके साथ दुर्व्यवहार करने का आरोप लगा। उन्होंने कथित रूप से उन्हें अपमानजनक शब्दों से संबोधित किया और उनकी शिकायतें सुनने से मना कर दिया।
- 18 फरवरी 1946 को नौसैनिकों ने काम का बहिष्कार शुरू कर दिया, जो वायरलेस संदेशों के माध्यम से शीघ्र ही अन्य नौसैनिक केंद्रों तक फैल गया।
नौसैनिकों की प्रमुख माँगें
- नौसैनिक बेहतर भोजन और आवास की स्थिति, शाही नौसेना के समान वेतन एवं भत्ते, उचित विसैन्यीकरण तथा रोजगार की संभावनाएँ, एनएएएफआई की सुविधाओं के उपयोग और प्रताड़ना से सुरक्षा की माँग कर रहे थे।
- उनकी माँगों का स्वरूप शीघ्र ही राजनीतिक भी हो गया। उन्होंने कमांडर किंग के विरुद्ध कार्रवाई, भारतीय राष्ट्रीय सेना के बंदियों की रिहाई एवं निष्पक्ष सुनवाई, इंडोनेशिया से ब्रिटिश सैनिकों की वापसी तथा ब्रिटिश साम्राज्यवादी हितों के लिए भारतीय सैनिकों की तैनाती रोकने की माँग की।
विस्तार
- विद्रोह बंबई से फैलकर कराची, कलकत्ता, विशाखापत्तनम, मद्रास, जामनगर और अन्य नौसैनिक केंद्रों तक पहुँच गया।
- नौसैनिकों ने नौसैनिक हड़ताल समिति का गठन किया। उन्होंने स्वयं को भारतीय राष्ट्रीय नौसेना/आजाद हिंद के रूप में संबोधित किया तथा ब्रिटिश झंडों के स्थान पर कांग्रेस और मुस्लिम लीग के झंडे लगाए। यह राष्ट्रवादी एकता का प्रतीक था।
- उन्होंने बुचर द्वीप (जवाहर द्वीप) पर भी नियंत्रण स्थापित कर लिया तथा बंबई में औपनिवेशिक शासन के प्रमुख प्रतीकों को तोपों के लक्ष्य के रूप में निर्धारित कर दिया।
ब्रिटिश प्रतिक्रिया एवं जनसमर्थन
- इस विद्रोह को विशेष रूप से बंबई में व्यापक जनसमर्थन मिला।
- लगभग तीन लाख श्रमिक, बंदरगाह कर्मचारी, रेलवे कर्मचारी और विद्यार्थी हड़ताल पर चले गए तथा विरोध प्रदर्शनों के कारण यातायात एवं व्यापारिक गतिविधियाँ बाधित हुईं।
- स्थानीय नागरिकों ने भी नौसैनिकों के लिए भोजन पहुँचाया।
- ब्रिटिश शासन ने बल प्रयोग के माध्यम से प्रतिक्रिया दी। 22 फरवरी को पुलिस की गोलीबारी में कथित रूप से कम-से-कम 400 लोग, जिनमें अधिकांश नागरिक थे, मारे गए और लगभग 1,500–2,000 लोग घायल हुए।
- शाही भारतीय वायु सेना और भारतीय सेना के कुछ हिस्सों में भी अशांति की घटनाओं ने ब्रिटिश अधिकारियों की चिंता बढ़ा दी।
महत्व
- इस विद्रोह ने ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की दमनकारी शक्ति के आधार को कमजोर किया।
- इससे स्पष्ट हुआ कि भारतीय सशस्त्र बलों की निष्ठा को अब ब्रिटिश शासन के पक्ष में स्वाभाविक रूप से सुनिश्चित नहीं माना जा सकता था।
- भारतीय राष्ट्रीय सेना के आंदोलन के साथ मिलकर इस विद्रोह ने ब्रिटिश शासन के आत्मविश्वास को गहरा आघात पहुँचाया, भारत से ब्रिटिश वापसी की माँग को बल दिया तथा यह प्रदर्शित किया कि औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध संघर्ष में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच सहयोग संभव था।
- इस विद्रोह ने नौसैनिकों की आर्थिक एवं सेवा संबंधी शिकायतों को व्यापक राष्ट्रीय आंदोलन से भी जोड़ दिया।
स्रोत:IE
राजस्थान वृक्ष (संरक्षण) विधेयक-2026
पाठ्यक्रम: GS2/राजव्यवस्था एवं शासन
संदर्भ
- राजस्थान मंत्रिमंडल ने राजस्थान वृक्ष (संरक्षण) विधेयक-2026 को स्वीकृति प्रदान की है।
परिचय
- यह विधेयक गैर-वन भूमि पर निर्दिष्ट 29 वृक्ष प्रजातियों की कटाई को विनियमित करेगा। इस सूची में राज्य वृक्ष खेजड़ी, रोहिड़ा, बरगद, पीपल, लसोड़ा, तेंदू, महुआ, कैर और चिरौंजी आदि शामिल हैं।
- किसी व्यक्ति के स्वामित्व या उसके नियन्त्रण वाली भूमि पर निर्दिष्ट वृक्ष को काटने या कटवाने के लिए अधिकृत प्राधिकारी से पूर्व अनुमति लेना आवश्यक होगा।
- प्रस्तावित कानून के अंतर्गत अपराध संज्ञेय और जमानतीय होंगे। अवैध रूप से वृक्ष काटने के दोषी व्यक्ति को एक वर्ष तक के कारावास, एक लाख रुपये तक के जुर्माने या दोनों से दंडित किया जा सकता है।
- यदि किसी वृक्ष को अनुमति लेकर हटाया जाता है, तो संबंधित व्यक्ति को हटाए गए प्रत्येक वृक्ष के बदले उसी क्षेत्र में निर्धारित संख्या में नए वृक्ष लगाना अनिवार्य होगा।
स्रोत: TH
छद्म विज्ञापन
पाठ्यक्रम: GS2/शासन
संदर्भ
- महाराष्ट्र के खाद्य एवं औषधि प्रशासन ने कुछ अभिनेताओं को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। आरोप है कि विमल इलायची के लिए उनका विज्ञापन विमल पान मसाला के छद्म विज्ञापन के रूप में कार्य करता है।
परिचय
- छद्म विज्ञापन विपणन का ऐसा तरीका है, जिसके माध्यम से उन उत्पादों का अप्रत्यक्ष रूप से प्रचार किया जाता है जिनके विज्ञापन पर सरकारी नियमों के अंतर्गत प्रतिबंध या सीमाएँ लागू हैं। इनमें शराब, तंबाकू और पान मसाला जैसे उत्पाद शामिल हैं।
- महाराष्ट्र ने खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006 की धारा 30(2)(a) के अंतर्गत वर्ष 2012 से तंबाकू या निकोटीन युक्त गुटखा और पान मसाला पर प्रतिबंध लगा रखा है।
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के अंतर्गत भ्रामक विज्ञापन
- इसके अंतर्गत भ्रामक विज्ञापन से आशय ऐसे विज्ञापन से है, जो किसी उत्पाद या सेवा के संबंध में:
- ऐसे उत्पाद या सेवा का गलत विवरण प्रस्तुत करता हो; या
- उपभोक्ताओं को उत्पाद या सेवा की प्रकृति, संघटन, मात्रा या गुणवत्ता के संबंध में गलत आश्वासन देता हो अथवा उन्हें भ्रमित करने की संभावना रखता हो; या
- ऐसा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष दावा करता हो, जो निर्माता, विक्रेता या सेवा प्रदाता द्वारा किए जाने पर अनुचित व्यापार व्यवहार माना जाता; या
- महत्वपूर्ण जानकारी को जानबूझकर छिपाता हो।
- वर्तमान दिशा-निर्देशों में “छद्म विज्ञापन” की परिभाषा ऐसे वस्तु, उत्पाद या सेवा के विज्ञापन के रूप में की गई है, जिसके विज्ञापन पर कानून द्वारा प्रतिबंध या सीमा लागू है।
- इसमें ऐसे प्रतिबंध या सीमा से बचने के उद्देश्य से संबंधित वस्तु, उत्पाद या सेवा को किसी अन्य ऐसी वस्तु, उत्पाद या सेवा के विज्ञापन के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, जिसके विज्ञापन पर कानून द्वारा प्रतिबंध या सीमा लागू नहीं है।
दंड
- केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण (CCPA) भ्रामक विज्ञापन के लिए निर्माताओं, विज्ञापनदाताओं और विज्ञापन में शामिल व्यक्तियों पर 10 लाख रुपये तक का जुर्माना लगा सकता है।
- बार-बार उल्लंघन किए जाने पर केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण 50 लाख रुपये तक का जुर्माना लगा सकता है।
- केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण भ्रामक विज्ञापन का समर्थन करने वाले व्यक्ति को एक वर्ष तक किसी भी उत्पाद या सेवा का समर्थन करने से प्रतिबंधित कर सकता है। दोबारा उल्लंघन होने पर यह प्रतिबंध तीन वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है।
स्रोत: IE
सप्तधारा
पाठ्यक्रम: GS3/अर्थव्यवस्था
समाचार में
- प्रधानमंत्री ने वर्ष 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को शीघ्र प्राप्त करने के लिए सात सूत्रीय ‘सप्तधारा’ सुधार रूपरेखा का शुभारंभ किया।
सप्तधारा
- यह भारत की प्रगति और राष्ट्रीय शक्ति से संबंधित सात रणनीतिक धाराएँ हैं, जिनका उल्लेख प्रधानमंत्री ने स्वतंत्रता दिवस 2026 के संबोधन में किया।
- इसमें उद्योग, कृषि, प्रौद्योगिकी, आधारभूत संरचना, रक्षा, हरित एवं नीली अर्थव्यवस्था तथा सांस्कृतिक प्रभाव को भारत के विकास के आगामी चरण के परस्पर जुड़े प्रमुख आधारों के रूप में शामिल किया गया है।
प्रमुख स्तंभ
- विनिर्माण शक्ति: भारत को वैश्विक विनिर्माण और आपूर्ति शृंखला का प्रमुख केंद्र बनाना, जिसमें लागत प्रतिस्पर्धा, गुणवत्ता, बड़े पैमाने पर उत्पादन, सटीकता, कल-पुर्जों तथा तैयार उत्पादों पर विशेष ध्यान दिया जाए।
- भारत को कल-पुर्जों और अभिकल्पना से लेकर तैयार उत्पादों के निर्माण तक पूरी मूल्य शृंखला विकसित करनी होगी तथा वैश्विक आपूर्ति शृंखला के एक विश्वसनीय केंद्र के रूप में अपनी स्थिति सुदृढ़ करनी होगी।
- लागत, गुणवत्ता और उत्पादन के स्तर, प्रतिस्पर्धी कारखानों, उपयोगकर्ता-अनुकूल वस्तुओं, आकर्षक पैकेजिंग तथा दोषरहित एवं सटीक विनिर्माण पर विशेष बल दिया जा रहा है। भारतीय उत्पादन का मूल मंत्र गुणवत्ता होना चाहिए और गुणवत्ता से किसी भी प्रकार का समझौता नहीं किया जाना चाहिए।
- कृषि एवं खाद्य उत्पादन: मुक्त व्यापार समझौतों के माध्यम से भारतीय कृषि उत्पादों को वैश्विक बाजार से जोड़ना तथा भारतीय मोटे अनाज, मसालों, फलों, सब्जियों और पारंपरिक खाद्य पदार्थों को विश्वस्तरीय ब्रांड के रूप में बढ़ावा देना।
- रसायन-मुक्त कृषि तथा कृषि उत्पादों को भी वैश्विक बाजार की आवश्यकताओं के अनुरूप बनाना होगा।
- प्रौद्योगिकी एवं नवाचार: यूपीआई और डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना की उपलब्धियों के आधार पर स्वदेशी छठी पीढ़ी की दूरसंचार प्रणाली को विकसित करना, ताकि भारत आँकड़ा केंद्रों, रोबोट, नई प्रौद्योगिकियों तथा अगली पीढ़ी के संचार के क्षेत्र में नवाचार का प्रमुख केंद्र बन सके।
- गतिशक्ति: सड़कों, द्रुतमार्गों, उच्च गति वाली रेल तथा पत्तन आधारित विकास के माध्यम से निर्बाध और तीव्र बहु-माध्यम संपर्क स्थापित करके माल परिवहन संबंधी बाधाओं को कम करना।
- पत्तन केवल वस्तुओं के लदान और उतारने के केंद्र नहीं हैं, बल्कि वे पत्तन आधारित विकास एवं आर्थिक प्रगति के प्रमुख साधन भी हैं।
- रक्षा शक्ति: आत्मनिर्भर रक्षा विनिर्माण को बढ़ावा देना, जिसमें ड्रोन, ड्रोन-रोधी प्रणालियों तथा आगामी पीढ़ी की रक्षा प्रौद्योगिकियों पर विशेष ध्यान दिया जाए। साथ ही, भारत को विश्व के प्रमुख रक्षा आपूर्तिकर्ताओं में शामिल करने का प्रयास किया जाए।
- एक अन्य क्षेत्र, जिसमें भारतीय युवाओं की क्षमता का उपयोग भारत और विश्व दोनों के हित में किया जा सकता है, वह साइबर सुरक्षा है।
- हरित एवं नीली अर्थव्यवस्था: हरित हाइड्रोजन, नवीकरणीय ऊर्जा और ऊर्जा भंडारण के क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व प्राप्त करना तथा मत्स्य पालन, तटीय पर्यटन एवं समुद्री प्रौद्योगिकी के माध्यम से नीली अर्थव्यवस्था का प्रभावी उपयोग करना।
- भारत की सांस्कृतिक शक्ति: योग, हस्तशिल्प, सिनेमा, एनीमेशन, खेल, डिजिटल सामग्री, पर्यटन और सृजनात्मक अर्थव्यवस्था के माध्यम से भारत की वैश्विक सांस्कृतिक पहुँच को सुदृढ़ करना।
सप्तधारा का महत्व
- सप्तधारा आर्थिक विकास, तकनीकी क्षमता, आधारभूत संरचना, ऊर्जा सुरक्षा और सांस्कृतिक प्रभाव को विकास की एक व्यापक रूपरेखा में एक-दूसरे से जोड़ती है।
- यह भारत की वैश्विक अर्थव्यवस्था में स्थिति सुदृढ़ करने के लिए निर्यात, आपूर्ति शृंखला, नवाचार और संपर्क व्यवस्था को विशेष महत्व देती है।
स्रोत: PIB
फ्रेडराइख एटैक्सिया (FRDA)
पाठ्यक्रम: GS3/विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी
संदर्भ
- भारत में कई समुदायों में रक्त-संबंधी विवाह की प्रथा प्रचलित है। इससे उन आनुवंशिक रोगों का जोखिम काफी बढ़ जाता है, जो सामान्यतः दुर्लभ होते हैं। फ्रेडराइख एटैक्सिया ऐसा ही एक आनुवंशिक रोग है।
परिचय
- फ्रेडराइख एटैक्सिया या FRDA एक आनुवंशिक विकार है, जो धीरे-धीरे तंत्रिकाओं और हृदय को क्षतिग्रस्त करता है।
- प्रभावित व्यक्तियों में सामान्यतः 5 से 15 वर्ष की आयु के बीच इसके लक्षण दिखाई देने लगते हैं।
- लक्षण:
- शरीर के संतुलन और गतिविधियों के समन्वय में अस्थिरता तथा कठिनाई।
- बोलने की गति धीमी हो जाना और अस्पष्ट उच्चारण।
- निगलने में कठिनाई।
- सुनने और देखने की क्षमता में गिरावट।
- अत्यधिक थकान और संवेदनशीलता का कम होना।
- रोग बढ़ने पर अधिकांश रोगियों की अपेक्षाकृत कम आयु में हृदय रोग के कारण मृत्यु हो जाती है।
- इस रोग का वर्तमान में कोई स्थायी उपचार उपलब्ध नहीं है।
- FRDA होने की संभावना तब अधिक होती है, जब माता और पिता दोनों में दोषपूर्ण जीन उपस्थित हो। यह रोग FXN जीन में होने वाले आनुवंशिक उत्परिवर्तन के कारण होता है।
- रक्त-संबंधी विवाह अर्थात रिश्तेदारों, जैसे चचेरे या ममेरे भाई-बहन के बीच विवाह, में इस बात की संभावना बढ़ जाती है कि दोनों माता-पिता में एक ही दुर्लभ आनुवंशिक उत्परिवर्तन उपस्थित हो।
स्रोत: TH
हारा मैंग्रोव वन
पाठ्यक्रम: GS3/पर्यावरण
संदर्भ
- ईरान के दक्षिणी तट के निकट तेल के बड़े पैमाने पर फैलाव ने हारा मैंग्रोव वनों के लिए गंभीर पारिस्थितिक खतरा उत्पन्न कर दिया है।
हारा मैंग्रोव वन
- हारा वन, जिन्हें क़ेश्म–हारा मैंग्रोव वन के नाम से भी जाना जाता है, दक्षिणी ईरान में क़ेश्म द्वीप और होर्मुज़ जलडमरूमध्य के आसपास स्थित हैं।
- इन वनों में मुख्य रूप से ग्रे मैंग्रोव (Avicennia marina) पाए जाते हैं। यह प्रजाति लवणीय तटीय वातावरण के अनुकूल रहने में अत्यधिक सक्षम है।
- इस क्षेत्र को यूनेस्को जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र के रूप में मान्यता प्राप्त है।
मैंग्रोव क्या हैं?
- मैंग्रोव ऐसे लवण-सहिष्णु वृक्ष और झाड़ियाँ हैं, जो समुद्र के ज्वार-भाटा से प्रभावित तटीय क्षेत्रों में पाए जाते हैं। इनका विस्तार विशेष रूप से उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में होता है।
- ये पारिस्थितिकी तंत्र लवणीय परिस्थितियों, ज्वार के दौरान जलमग्न होने तथा कम ऑक्सीजन वाली मिट्टी में जीवित रहने के लिए विशेष रूप से अनुकूलित होते हैं।
- जड़ तंत्र: मैंग्रोव में विशेष प्रकार की जड़ संरचनाएँ पाई जाती हैं, जैसे आधार जड़ें और श्वसन जड़ें। ये जलभराव वाली परिस्थितियों में श्वसन में सहायता करती हैं तथा पौधों को भौतिक स्थिरता प्रदान करती हैं।
- आवास: मैंग्रोव मुख्य रूप से ज्वारनदमुख, ज्वारीय जलधाराओं, कीचड़युक्त तटीय क्षेत्रों और डेल्टा क्षेत्रों में पाए जाते हैं।
भारत में मैंग्रोव
- भारत में लगभग 4,900 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में मैंग्रोव वन पाए जाते हैं।
- भारत के प्रमुख मैंग्रोव क्षेत्रों में सुंदरबन, भितरकनिका तथा कृष्णा-गोदावरी डेल्टा शामिल हैं।
स्रोत: TH
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संक्षिप्त समाचार 17-08-2026