पाठ्यक्रम: GS3/पर्यावरण/आपदा प्रबंधन
संदर्भ
- केंद्रीय पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्री ने बताया कि ओडिशा की 564 किलोमीटर लंबी तटरेखा का लगभग 28 प्रतिशत भाग तटीय कटाव से प्रभावित हो रहा है।
परिचय
- यह जानकारी राष्ट्रीय तटीय अनुसंधान केंद्र (NCCR) द्वारा किए गए एक अध्ययन पर आधारित है। केंद्र ने वर्ष 1990 से 2022 के बीच ओडिशा के तट पर तटरेखा में होने वाले परिवर्तनों का व्यापक आकलन एवं मानचित्रण किया।
- राष्ट्रीय तटीय अनुसंधान केंद्र भारतीय तटरेखा में दीर्घकालिक तटीय परिवर्तनों की निगरानी करता है।
- ओडिशा की लगभग 28.3 प्रतिशत तटरेखा कटाव से प्रभावित हो रही है, जबकि 17.6 प्रतिशत तटरेखा स्थिर है और 54.1 प्रतिशत तटरेखा में निक्षेपण अथवा विस्तार हो रहा है।
तटीय कटाव
- तटीय कटाव वह प्रक्रिया है, जिसमें स्थानीय समुद्र-स्तर में वृद्धि, तीव्र लहरों तथा तटीय बाढ़ के कारण तट के किनारे स्थित चट्टानें, मृदा और रेत धीरे-धीरे घिसकर नष्ट होती हैं या प्रवाहित हो जाती हैं।
- पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अंतर्गत राष्ट्रीय तटीय अनुसंधान केंद्र ने वर्ष 1990 से 2018 के दौरान पूरे भारतीय तट की तटरेखा में होने वाले परिवर्तनों की निगरानी की।
- अध्ययन में पाया गया कि भारत की 33.6 प्रतिशत तटरेखा कटाव के प्रति संवेदनशील थी, 26.9 प्रतिशत तटरेखा में निक्षेपण अथवा विस्तार हो रहा था, जबकि 39.6 प्रतिशत तटरेखा स्थिर थी।
- प्रभाव: तटीय कटाव आजीविका के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न करता है, विशेष रूप से उन मछुआरा समुदायों के लिए जो तटीय स्थिरता पर निर्भर हैं।
- सड़क, आवास और पत्तन जैसी आधारभूत संरचनाएँ भी गंभीर रूप से प्रभावित होती हैं। वहीं, ज्वारनदमुख और मैंग्रोव क्षेत्रों जैसे जैव-विविधता से समृद्ध क्षेत्र भी नष्ट होने के जोखिम का सामना कर रहे हैं।
- तटीय कटाव के लिए उत्तरदायी कारक:
- समुद्र-स्तर में वृद्धि: जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्र के स्तर में वृद्धि हो रही है, जिससे समुद्री तूफानों के दौरान जल-उछाल तथा तटीय बाढ़ का प्रभाव बढ़ जाता है।
- रेत खनन और आधारभूत संरचना परियोजनाएँ: अनियंत्रित रूप से रेत निकालने तथा पत्तनों, समुद्री दीवारों और तरंग-रोधी संरचनाओं के निर्माण से तलछट के प्राकृतिक प्रवाह में बाधा उत्पन्न होती है। इससे संवेदनशील क्षेत्रों में तटीय कटाव की गति बढ़ जाती है।
- मैंग्रोव का क्षरण: मैंग्रोव जैसे प्राकृतिक अवरोधों के नष्ट होने से तटरेखा तेज लहरों के सीधे प्रभाव के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाती है।
समुद्री कटाव से निपटने के लिए सरकार द्वारा उठाए गए कदम
- पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने देश की पूरी तटरेखा के लिए जोखिम रेखा निर्धारित की है।
- जोखिम रेखा तटरेखा में होने वाले परिवर्तनों, जिनमें जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्र-स्तर में होने वाली वृद्धि भी शामिल है, को दर्शाती है।
- इस रेखा का उपयोग तटीय राज्यों की संबंधित एजेंसियों द्वारा आपदा प्रबंधन तथा अनुकूलन एवं जोखिम न्यूनीकरण उपायों की योजना बनाने के लिए एक महत्वपूर्ण साधन के रूप में किया जाना है।
- पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने तटीय क्षेत्रों, समुद्री क्षेत्रों के संरक्षण तथा मछुआरों और अन्य स्थानीय समुदायों की आजीविका की सुरक्षा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से तटीय विनियमन क्षेत्र अधिसूचना, 2019 जारी की है।
- मंत्रालय ने सभी तटीय राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के लिए दिशानिर्देशों के साथ तटीय संरक्षण की राष्ट्रीय रणनीति भी तैयार की है।
- जल शक्ति मंत्रालय की बाढ़ प्रबंधन योजना, जिसमें समुद्री कटाव-रोधी योजनाएँ भी शामिल हैं, राज्यों की प्राथमिकताओं के अनुसार राज्य सरकारों द्वारा अपने संसाधनों से तैयार और क्रियान्वित की जाती हैं।
- तटीय प्रबंधन सूचना प्रणाली (CMIS): केंद्रीय क्षेत्र की योजना ‘जल संसाधन सूचना प्रणाली का विकास’ के अंतर्गत तटीय प्रबंधन सूचना प्रणाली का एक नया घटक शुरू किया गया है।
- तटीय प्रबंधन सूचना प्रणाली के अंतर्गत तट के निकट के क्षेत्रों से संबंधित आँकड़े एकत्र किए जाते हैं। इन आँकड़ों का उपयोग संवेदनशील तटीय क्षेत्रों में योजना निर्माण, अभिकल्पना, निर्माण तथा रखरखाव के लिए किया जा सकता है।
- संवेदनशील तटीय क्षेत्रों में तटीय संरक्षण उपायों की अभिकल्पना तथा तटरेखा प्रबंधन योजनाओं की तैयारी के लिए तटीय राज्यों को तकनीकी सहायता भी प्रदान की गई है।
स्रोत: IE
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