पाठ्यक्रम: GS2/शासन, GS3/पर्यावरण
संदर्भ
- न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) बी. पी. कटाके की अध्यक्षता में गठित एक समिति ने मेघालय सरकार की व्यापक खदान बंदी नीति लागू करने में देरी तथा राज्य में अवैध चूहे के बिल जैसी संकरी सुरंगों वाली कोयला खनन पद्धति को रोकने में विफलता की आलोचना की है।
पृष्ठभूमि
- राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने वर्ष 2014 में रैट-होल खनन पर प्रतिबंध लगा दिया था, क्योंकि इससे पर्यावरण को गंभीर क्षति पहुँचती है और खनिकों के जीवन को खतरा रहता है।
- मेघालय उच्च न्यायालय ने वर्ष 2022 में न्यायमूर्ति बृजेंद्र प्रसाद कटाके की अध्यक्षता में एक सदस्यीय समिति का गठन किया था। समिति को राष्ट्रीय हरित अधिकरण के निर्देशों के अनुपालन में राज्य सरकार को आवश्यक उपाय सुझाने का दायित्व सौंपा गया था।
समिति द्वारा उजागर किए गए प्रमुख मुद्दे
- खदान बंदी नीति में देरी: मेघालय में परित्यक्त और अवैध रूप से संचालित कोयला खदानों को बंद करने तथा उनका पुनर्वास करने के लिए अभी तक व्यापक नीति लागू नहीं की गई है।
- कई खुली खदान सुरंगों को अब तक न तो सुरक्षा उपायों के अंतर्गत लाया गया है और न ही उन्हें बंद किया गया है, जिससे मनुष्यों एवं पशुओं के लिए गंभीर जोखिम बना हुआ है।
- बड़ी संख्या में परित्यक्त खदानें: जयंतिया कोयला खदान मालिक एवं व्यापारी संघ के अनुसार, अकेले पूर्वी जयंतिया हिल्स जिले के 360 गाँवों में लगभग 60,000 खदानें हैं। इनमें से अधिकांश खदानें परित्यक्त हैं, लेकिन उन्हें खुला छोड़ दिया गया है।
- अपर्याप्त पुनर्वास योजना: केंद्रीय खनन योजना एवं अभिकल्प संस्थान लिमिटेड ने दो प्रारंभिक पुनर्वास परियोजनाओं के लिए विस्तृत परियोजना प्रतिवेदन तैयार किए हैं।
- पहली परियोजना पूर्वी जयंतिया हिल्स के सुतंगा में प्रस्तावित है, जिसकी अनुमानित लागत 63 लाख रुपये है।
- दूसरी परियोजना दक्षिण गारो हिल्स जिले के अरेंगटिम में प्रस्तावित है, जिसकी अनुमानित लागत 92.78 लाख रुपये है।
- हालाँकि, दोनों प्रस्ताव अभी भी राष्ट्रीय हरित अधिकरण द्वारा गठित निगरानी समिति के समक्ष लंबित हैं।
- कोयला आधारित उद्योगों का कमजोर नियमन: समिति ने कोयले पर अत्यधिक निर्भर कोक भट्ठी संयंत्रों की जाँच और निगरानी में कमियों की पहचान की है।
रैट-होल खनन क्या है?
- रैट-होल शब्द भूमि के अंदर खोदी जाने वाली अत्यंत संकरी सुरंगों के लिए प्रयुक्त होता है। ये सुरंगें सामान्यतः लगभग 3–4 फीट ऊँची होती हैं और इतनी ही चौड़ी होती हैं कि एक व्यक्ति उनमें प्रवेश कर सके तथा कोयला निकाल सके।
- सुरंग खोदने के बाद खनिक रस्सियों या बाँस की सीढ़ियों के सहारे नीचे उतरकर कोयले की परतों तक पहुँचते हैं।
- इसके बाद कुदाल, फावड़े और टोकरियों जैसे साधारण उपकरणों की सहायता से कोयला हाथ से निकाला जाता है।
रैट-होल खनन से संबंधित चिंताएँ
- सुरक्षा संबंधी चिंताएँ: रैट-होल खनन अत्यंत छोटी और अस्थिर सुरंगों में किया जाता है, जहाँ उचित वेंटिलेशन, संरचनात्मक सहारा एवं श्रमिकों के लिए आवश्यक सुरक्षा उपकरण जैसी मूलभूत सुरक्षा व्यवस्थाएँ प्रायः उपलब्ध नहीं होतीं।
- वर्ष 2018 में मेघालय के पूर्वी जयंतिया हिल्स जिले की एक कोयला खदान में लगभग 15 रैट-होल खनिकों की मृत्यु हो गई थी।
- पर्यावरणीय समस्याएँ: खनन की यह प्रक्रिया भूमि क्षरण, वनों की कटाई और जल प्रदूषण का कारण बन सकती है।
- मेघालय में रैट-होल खनन के कारण कोपिली नदी का जल अम्लीय हो गया था। यह नदी मेघालय और असम से होकर प्रवाहित होती है।
- जनहानि: खनन की इस पद्धति में कार्य की परिस्थितियाँ अत्यंत जोखिमपूर्ण होती हैं। इसके कारण अनेक दुर्घटनाएँ हुई हैं, जिनमें श्रमिक घायल हुए हैं और कई लोगों की मृत्यु हुई है।
- बाल श्रम: सुरंगें अत्यंत संकरी होने के कारण खदानों में बच्चों से भी कार्य कराया जाता है, क्योंकि वे घुटनों के बल इन संकरे स्थानों से होकर निकल सकते हैं।
रैट-होल खनन के जारी रहने के कारण
- वैकल्पिक आजीविका का अभाव: कुछ क्षेत्रों में रोजगार के वैकल्पिक अवसर बहुत सीमित हैं। इसलिए खनिकों के लिए दूसरे व्यवसायों में जाना कठिन हो जाता है।
- राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव: कई क्षेत्रों में रैट-होल खनन आय का प्रमुख स्रोत है। इसलिए संबंधित प्राधिकारी इस गतिविधि को नियंत्रित करने के लिए कठोर कार्रवाई नहीं करते।
- गरीबी: आर्थिक कठिनाइयाँ और गरीबी लोगों को आजीविका के साधन के रूप में रैट-होल खनन में शामिल होने के लिए बाध्य करती हैं।
- आर्थिक व्यवहार्यता: मेघालय में कोयले की परत अत्यंत पतली है। ऐसे में पहाड़ी क्षेत्र से चट्टानों को हटाना और खदान के अंदर उसके ढहने से रोकने के लिए सहारे के खंभे बनाना अधिक खर्चीला होगा। इसलिए अन्य खनन पद्धतियाँ आर्थिक रूप से व्यवहार्य नहीं मानी जातीं।
अवैध कोयला खनन पर रोक लगाने के लिए सरकार द्वारा उठाए गए कदम
- भारत सरकार ने अनधिकृत कोयला खनन गतिविधियों की सूचना देने के लिए ‘खनन प्रहरी’ नामक एक मोबाइल अनुप्रयोग तथा कोयला खदान निगरानी एवं प्रबंधन प्रणाली नामक एक वेब आधारित प्रणाली शुरू की है। इनके माध्यम से संबंधित कानून-व्यवस्था लागू करने वाले प्राधिकारी अनधिकृत खनन की निगरानी कर आवश्यक कार्रवाई कर सकते हैं।
- कोल इंडिया लिमिटेड की कुछ सहायक कंपनियों में अवैध खनन के विभिन्न पहलुओं की निगरानी के लिए विभिन्न स्तरों पर—खंड, अनुमंडल, जिला और राज्य स्तर—समितियों या कार्यबलों का गठन किया गया है।
- वैज्ञानिक कोयला खनन की ओर बढ़ता कदम: मेघालय ने लागू खनन एवं पर्यावरणीय नियमों के अंतर्गत विनियमित और वैज्ञानिक तरीके से कोयला खनन की दिशा में कदम बढ़ाया है।
- नई व्यवस्था के अंतर्गत आधिकारिक रूप से अनुमति प्राप्त पहली कोयला खदानों में वर्ष 2025 में उत्पादन शुरू हुआ।
आगे की राह
- समुदाय की भागीदारी: स्थानीय समुदायों के साथ मिलकर अवैध खनन से होने वाले जोखिमों और उसके दुष्परिणामों के बारे में जागरूकता बढ़ाई जानी चाहिए तथा अवैध खनन के विरुद्ध कार्रवाई में उनका सहयोग प्राप्त किया जाना चाहिए।
- आर्थिक विकास: खनन पर निर्भर क्षेत्रों में वैकल्पिक आजीविका के अवसर तथा आर्थिक विकास से संबंधित योजनाएँ उपलब्ध कराई जानी चाहिए, ताकि लोगों की अवैध खनन पर निर्भरता कम की जा सके।
- बेहतर निगरानी: खनन गतिविधियों की निगरानी तथा नियमों के अनुपालन को सुनिश्चित करने के लिए उन्नत तकनीकों का प्रभावी उपयोग किया जाना चाहिए।
स्रोत: TH