पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन–2/राजव्यवस्था एवं सुशासन
सन्दर्भ
- सर्वोच्च न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय कॉलेजियम की सिफारिशों में पारदर्शिता की कमी पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि बिना कारण बताए की गई नियुक्तियाँ न्यायपालिका की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकती हैं।
पृष्ठभूमि
- सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि कॉलेजियम ने संवैधानिक न्यायालयों में नियुक्ति अथवा पदोन्नति के लिए उम्मीदवारों की अनुशंसा के कारण प्रकाशित करना बंद कर दिया है, जो पहले कारणयुक्त प्रस्ताव (Reasoned Resolutions) जारी करने की उसकी परंपरा से अलग है।
- न्यायालय ने न्यायिक कार्यवाही के सीधे प्रसारण (Live Streaming) का समर्थन किया, किंतु साथ ही यह भी चेतावनी दी कि चुनिंदा संपादित वीडियो क्लिपों के दुरुपयोग से न्यायिक कार्यवाही की वास्तविकता विकृत हो सकती है।
न्यायिक नियुक्तियों से संबंधित संवैधानिक प्रावधान
- अनुच्छेद 124: राष्ट्रपति द्वारा संवैधानिक प्राधिकारियों से परामर्श के बाद सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति का प्रावधान करता है।
- अनुच्छेद 217: उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति से संबंधित है।
- अनुच्छेद 222: राष्ट्रपति को भारत के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श के बाद एक उच्च न्यायालय के न्यायाधीश का दूसरे उच्च न्यायालय में स्थानांतरण करने का अधिकार देता है।
- अनुच्छेद 50: राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों के अंतर्गत राज्य को न्यायपालिका को कार्यपालिका से पृथक करने का निर्देश देता है, जिससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता सुदृढ़ होती है।
कॉलेजियम प्रणाली क्या है?
- कॉलेजियम प्रणाली वह व्यवस्था है जिसके माध्यम से सर्वोच्च न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति तथा स्थानांतरण स्वयं न्यायपालिका द्वारा किया जाता है। इसके लिए संविधान या किसी विधि में कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है।
- यह व्यवस्था सर्वोच्च न्यायालय के तीन न्यायाधीश प्रकरणों (Three Judges Cases) के निर्णयों के माध्यम से विकसित हुई, जिनमें न्यायिक नियुक्तियों में न्यायपालिका की प्रधानता स्थापित की गई।
- सर्वोच्च न्यायालय स्तर पर, कॉलेजियम में भारत के मुख्य न्यायाधीश तथा सर्वोच्च न्यायालय के चार वरिष्ठतम न्यायाधीश शामिल होते हैं।
- उच्च न्यायालय स्तर पर, कॉलेजियम में संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश तथा उस न्यायालय के दो वरिष्ठतम न्यायाधीश शामिल होते हैं।
प्रक्रिया-स्मरण-पत्र (Memorandum of Procedure-MoP) क्या है?
- प्रक्रिया-स्मरण-पत्र (MoP) सर्वोच्च न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति से संबंधित नियमों एवं प्रक्रियाओं का दस्तावेज़ है। इसे सरकार एवं न्यायपालिका द्वारा संयुक्त रूप से तैयार किया जाता है।
यह प्रक्रिया सर्वोच्च न्यायालय के तीन प्रसिद्ध निर्णयों के माध्यम से विकसित हुई—
- एस.पी. गुप्ता बनाम भारत संघ (1981)
- सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन बनाम भारत संघ (1993)
- विशेष संदर्भ संख्या–1, 1998
- इन निर्णयों के बाद केंद्र सरकार ने 1999 में प्रक्रिया-स्मरण-पत्र तैयार किया।
- राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) को वर्ष 2015 में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निरस्त किए जाने के बाद न्यायालय ने न्यायिक नियुक्तियों में पारदर्शिता, जवाबदेही एवं दक्षता बढ़ाने के लिए प्रक्रिया-स्मरण-पत्र में संशोधन करने का निर्देश दिया।
- हालांकि, कई दौर की चर्चाओं के बावजूद संशोधित प्रक्रिया-स्मरण-पत्र अभी तक अंतिम रूप नहीं ले सका है।
कॉलेजियम प्रणाली का विकास
- प्रथम न्यायाधीश प्रकरण (1981): सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि न्यायिक नियुक्तियों में कार्यपालिका की प्रधानता होगी तथा भारत के मुख्य न्यायाधीश की राय बाध्यकारी नहीं होगी।
- द्वितीय न्यायाधीश प्रकरण (1993): सर्वोच्च न्यायालय ने अपने पूर्व निर्णय को पलटते हुए कहा कि भारत के मुख्य न्यायाधीश, वरिष्ठ न्यायाधीशों के साथ सामूहिक रूप से कार्य करते हुए, न्यायिक नियुक्तियों में प्रधानता रखेंगे। इसी निर्णय से कॉलेजियम प्रणाली की स्थापना हुई।
- तृतीय न्यायाधीश प्रकरण (1998): सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि कॉलेजियम में भारत के मुख्य न्यायाधीश तथा सर्वोच्च न्यायालय के चार वरिष्ठतम न्यायाधीश होंगे। इस प्रकार वर्तमान कॉलेजियम व्यवस्था को संस्थागत स्वरूप प्राप्त हुआ।
कॉलेजियम प्रणाली में पारदर्शिता का महत्त्व
- जवाबदेही में वृद्धि: नियुक्तियों के कारण सार्वजनिक करने से न्यायिक नियुक्तियों की समीक्षा एवं परीक्षण संभव होता है।
- जनविश्वास में वृद्धि: पारदर्शी नियुक्तियाँ न्यायपालिका की स्वतंत्रता के प्रति लोगों का विश्वास मजबूत करती हैं।
- योग्यता आधारित चयन को बढ़ावा: इससे यह स्पष्ट होता है कि नियुक्तियाँ क्षमता, सत्यनिष्ठा एवं संवैधानिक मूल्यों के आधार पर की गई हैं।
- मनमाने निर्णयों की रोकथाम: कारण दर्ज करने से व्यक्तिपरक एवं अपारदर्शी निर्णयों की संभावना कम होती है।
कॉलेजियम प्रणाली से संबंधित चुनौतियाँ
- वैधानिक ढाँचे का अभाव।
- पात्रता एवं मूल्यांकन के स्पष्ट एवं संहिताबद्ध मानदंडों का अभाव।
- विचार-विमर्श की सीमित सार्वजनिक जानकारी।
- स्वतंत्र समीक्षा की औपचारिक व्यवस्था का अभाव।
- अपारदर्शिता एवं पक्षपात के आरोप लगातार बने हुए हैं।
- नियुक्तियों में विलंब के कारण न्यायालयों में रिक्त पदों की संख्या बढ़ना।
आगे की राह
- न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया में अधिक पारदर्शिता, वस्तुनिष्ठता एवं जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए नए प्रक्रिया-स्मरण-पत्र (MoP) को शीघ्र अंतिम रूप दिया जाए।
- कॉलेजियम की प्रत्येक अनुशंसा के साथ संक्षिप्त कारण भी प्रकाशित किए जाएँ, जबकि वास्तव में गोपनीय रखी जाने वाली सूचनाओं की सुरक्षा भी सुनिश्चित की जाए।
स्रोत: TH
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