पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन–2/सुशासन
चर्चा में क्यों?
- हाल ही में नीति आयोग की एक रिपोर्ट में कहा गया कि पिछले एक दशक में लगभग 94,000 सरकारी विद्यालय बंद कर दिए गए, अर्थात् औसतन प्रतिदिन 25 विद्यालय बंद हुए। इसके परिणामस्वरूप सरकारी विद्यालयों में नामांकन में 2.26 करोड़ की कमी दर्ज की गई।
सरकारी विद्यालयों का बंद होना
- सरकारी विद्यालय आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों, अनुसूचित जातियों (SC), अनुसूचित जनजातियों (ST), अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) तथा अनेक अल्पसंख्यक समुदायों के लिए शिक्षा का प्रमुख माध्यम हैं।
- शिक्षा समवर्ती सूची का विषय है, किंतु केंद्र सरकार की भी जिम्मेदारी है, क्योंकि शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 (RTE Act, 2009) एक केंद्रीय कानून है, जो प्रत्येक बच्चे के लिए पड़ोस में विद्यालय (Neighbourhood School) उपलब्ध कराना अनिवार्य बनाता है।
- सरकारी विद्यालयों में अध्ययनरत विद्यार्थियों की हिस्सेदारी 2005 में 71% से घटकर 2024–25 में 49.24% रह गई है, जो सार्वजनिक शिक्षा से निजी शिक्षा की ओर बड़े बदलाव को दर्शाती है।
विद्यालयों के बंद होने का परिमाण
- विभिन्न राज्य सरकारों ने विद्यालय युक्तिकरण (Rationalisation), समेकन (Consolidation) तथा विद्यालय समूह के विकास की नीति के अंतर्गत हजारों सरकारी विद्यालयों को बंद या विलय कर दिया है।
- इन उपायों का उद्देश्य संसाधनों का बेहतर उपयोग करना है तथा ये राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP), 2020 के अनुरूप बताए जाते हैं।
- विद्यालयों के युक्तिकरण के कारण विशेषकर गरीब एवं ग्रामीण बच्चों के लिए पड़ोस के विद्यालयों तक पहुँच में उल्लेखनीय कमी आई है।
- उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश तथा जम्मू-कश्मीर सबसे अधिक प्रभावित राज्य हैं।
- मध्य प्रदेश में 7.37 लाख से अधिक बच्चों का विद्यालयी अभिलेख उपलब्ध नहीं है, 11.38 लाख बच्चे विद्यालय छोड़ने के जोखिम में हैं तथा हजारों सरकारी विद्यालयों में अत्यंत कम या शून्य नामांकन है।
- जम्मू-कश्मीर में विद्यालयों के विलय के कारण बच्चों को 4–6 किलोमीटर की दूरी तय करके विद्यालय जाना पड़ रहा है, जिससे शिक्षा का अधिकार अधिनियम के पड़ोस के विद्यालय के सिद्धांत का ह्रास हुआ है तथा शिक्षा में पहुँच और समानता को लेकर प्रश्न खड़े हुए हैं।
- राष्ट्रीय UDISE+ आँकड़ों के अनुसार सरकारी विद्यालयों की संख्या 2014–15 में 11.07 लाख से घटकर 2023–24 में 10.17 लाख रह गई है, जबकि निजी विद्यालयों की संख्या में वृद्धि हुई है।
सरकारी विद्यालयों के बंद होने के प्रमुख कारण
- राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 के अंतर्गत संसाधनों का एकीकरण: अनेक राज्य सरकारें कम नामांकन वाले विद्यालयों का विलय विद्यालय परिसरों में कर रही हैं ताकि भवन, शिक्षक एवं अन्य संसाधनों का साझा उपयोग किया जा सके।
- निजी विद्यालयों की ओर झुकाव: खराब आधारभूत संरचना, शिक्षकों की अनुपस्थिति, अपर्याप्त स्वच्छता सुविधाएँ तथा अंग्रेज़ी माध्यम की बढ़ती मांग के कारण अभिभावक निजी विद्यालयों को प्राथमिकता दे रहे हैं।
- शिक्षकों की कमी: सरकारें शिक्षकों के रिक्त पद भरने के बजाय कम नामांकन वाले, विशेषकर एकल शिक्षक वाले विद्यालयों का विलय या बंद करना अधिक उपयुक्त मान रही हैं।
- सुशासन संबंधी समस्याएँ: घटता नामांकन शिक्षा की मांग में कमी के बजाय प्रशासनिक उपेक्षा तथा विद्यालयों की निम्न गुणवत्ता का परिणाम है।
प्रभाव
- शिक्षा के अधिकार (RTE) का कमजोर होना: विद्यालयों के विलय से विद्यालय तक पहुँचने की दूरी बढ़ जाती है, जो पड़ोस के विद्यालय की अवधारणा का उल्लंघन है।
- बालिकाओं पर अधिक प्रभाव: विद्यालय की दूरी बढ़ने से सुरक्षा संबंधी चिंताएँ, विद्यालय छोड़ने की संभावना तथा कम आयु में विवाह का जोखिम बढ़ जाता है।
- वंचित समुदायों पर प्रतिकूल प्रभाव: अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों को परिवहन एवं निजी विद्यालयों तक पहुँच के अभाव में शिक्षा प्राप्त करने में अधिक कठिनाई होती है।
- विद्यालय छोड़ने वालों की संख्या में वृद्धि: विद्यालयों के बड़े पैमाने पर समेकन के कारण जोखिमग्रस्त तथा पता न चल पाने वाले विद्यार्थियों की संख्या बढ़ी है, जिससे विद्यालय छोड़ने की संभावना भी बढ़ गई है।
सुझाव
- विद्यालयों का समेकन शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 के अनुरूप होना चाहिए तथा जहाँ विलय अपरिहार्य हो, वहाँ सुरक्षित एवं निःशुल्क परिवहन उपलब्ध कराया जाए।
- विद्यालय बंद करने या विलय करने से पहले बालिकाओं, अनुसूचित जाति/जनजाति समुदायों, दिव्यांग बच्चों तथा प्रवासी बच्चों पर उसके प्रभाव का समुचित आकलन किया जाए।
- शिक्षकों के रिक्त पद शीघ्र भरे जाएँ, प्रारंभिक बाल्यावस्था शिक्षा को सुदृढ़ किया जाए तथा विद्यालयों की आधारभूत संरचना में सुधार कर नामांकन बढ़ाया जाए।
- विद्यालयों के विलय अथवा बंद करने से संबंधित निर्णयों में विद्यालय प्रबंधन समितियों (SMCs), ग्राम पंचायतों तथा अभिभावकों की भागीदारी सुनिश्चित की जाए।
- केंद्र एवं राज्य सरकारें संयुक्त रूप से विद्यालय युक्तिकरण की निगरानी करें ताकि यह राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 के अनुरूप होने के साथ-साथ शिक्षा तक समान एवं न्यायसंगत पहुँच भी सुनिश्चित कर सके।
स्रोत: TH
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