पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन–2/सुशासन
सन्दर्भ
- आंध्र प्रदेश में कथित अभिरक्षा में मृत्यु के मामले में विशेष जाँच दल (SIT) ने निलंबित निरीक्षक को हिरासत में लिया।
अभिरक्षा में मृत्यु क्या है?
- अभिरक्षा में मृत्यु से तात्पर्य किसी व्यक्ति की पुलिस या न्यायिक अभिरक्षा के दौरान हुई मृत्यु से है। यह मृत्यु मुकदमे से पहले, पुलिस पूछताछ के दौरान अथवा दोषसिद्धि के बाद भी हो सकती है।
- मृत्यु का कारण यातना, लापरवाही, चिकित्सा सहायता से वंचित करना अथवा संदिग्ध परिस्थितियाँ हो सकती हैं।
यह निम्नलिखित संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है—
- अनुच्छेद 20(1): किसी व्यक्ति को कानून में निर्धारित दंड से अधिक दंड नहीं दिया जा सकता।
- अनुच्छेद 20(3): आत्म-दोषारोपण के विरुद्ध संरक्षण प्रदान करता है; दबाव या प्रताड़ना में दिया गया स्वीकारोक्ति कथन ग्राह्य नहीं होता।
- अनुच्छेद 21: जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा सुनिश्चित करता है, जिसमें पुलिस एवं न्यायिक अभिरक्षा भी शामिल है।
- भारत में अभिरक्षा में मृत्यु: संसदीय आँकड़ों के अनुसार 2016–17 से 2021–22 के बीच देश में 11,656 अभिरक्षा में मृत्यु के मामले दर्ज किए गए।
- उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक 2,630 मामले दर्ज हुए, जबकि दक्षिणी राज्यों में तमिलनाडु सबसे ऊपर रहा।
- राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो (NCRB) के अनुसार वर्ष 2026 के पहले 74 दिनों में देशभर में 170 अभिरक्षा में मृत्यु के मामले दर्ज किए गए, जो पिछले वर्ष के 140 मामलों से अधिक हैं।
- बिहार इस सूची में प्रथम स्थान पर रहा, इसके बाद राजस्थान और उत्तर प्रदेश का स्थान है।
भारत में अभिरक्षा में मृत्यु के अधिक मामलों के कारण
- प्रक्रियागत कमियाँ एवं विलंब: डी.के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (1997) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने अभिरक्षा में होने वाले अत्याचारों की रोकथाम हेतु महत्त्वपूर्ण दिशानिर्देश जारी किए थे।
- इसके बावजूद न्यायालय प्रायः मजिस्ट्रेटी जाँच पर निर्भर रहते हैं, जिनमें प्रक्रियागत कमियाँ एवं विलंब पाए जाते हैं।
- कमज़ोर जवाबदेही: अभिरक्षा में मृत्यु के मामलों की जाँच प्रायः उसी विभाग द्वारा की जाती है, जिस पर आरोप होता है।
- न्यायिक जाँच प्रारंभ होने पर भी वे अक्सर धीमी, अपारदर्शी तथा निष्कर्षहीन रहती हैं।
- राजनीतिक हस्तक्षेप: भारत में पुलिस व्यवस्था पर राजनीतिक दबाव का प्रभाव पड़ता है, जिससे निष्पक्ष कार्रवाई प्रभावित होती है और दोषी अधिकारियों को संरक्षण मिल जाता है।
- हाशिए पर स्थित एवं संवेदनशील वर्ग: अधिकांश पीड़ित सामाजिक एवं आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों से आते हैं। विधिक जागरूकता एवं संसाधनों के अभाव में उनके परिवार न्याय प्राप्त नहीं कर पाते।
चिंताएँ
- विधि के शासन का क्षरण: यह दर्शाता है कि अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन के अधिकार तथा अनुच्छेद 22 के अंतर्गत मनमानी गिरफ्तारी से संरक्षण जैसे संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन हो रहा है। इससे न्याय व्यवस्था में जनता का विश्वास कमजोर होता है।
- मानवाधिकार संबंधी छवि: अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) तथा ह्यूमन राइट्स वॉच जैसी संस्थाओं की रिपोर्टों में भारत की आलोचना होती है। इससे अन्य देशों में मानवाधिकारों के मुद्दों पर भारत की नैतिक विश्वसनीयता प्रभावित होती है।
- पुलिस राज्य की धारणा: अभिरक्षा में मृत्यु के बढ़ते मामले भारत को एक कल्याणकारी लोकतंत्र के बजाय पुलिस राज्य के रूप में प्रस्तुत कर सकते हैं।
- कमज़ोर आपराधिक न्याय प्रणाली: यह आधुनिक पुलिस व्यवस्था, न्यायालयिक विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी आधारित जाँच प्रणाली को प्रभावी ढंग से अपनाने में कमी को दर्शाता है।
संरक्षण हेतु अंतर्राष्ट्रीय विधिक ढाँचा
- संयुक्त राष्ट्र चार्टर (1945): संयुक्त राष्ट्र के उद्देश्यों एवं सिद्धांतों का निर्धारण करता है, जिनमें मानवाधिकारों का संवर्धन भी शामिल है।
- मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा (1948): यातना पर प्रतिबंध लगाती है तथा निर्दोषता की धारणा को मान्यता देती है।
- नागरिक एवं राजनीतिक अधिकारों पर अंतरराष्ट्रीय वाचा(Covenant) (1966): जीवन के अधिकार की रक्षा करती है तथा यातना पर प्रतिबंध लगाती है।
- नेल्सन मंडेला नियम (2015): जिन्हें आधिकारिक रूप से कैदियों के साथ व्यवहार के लिए संयुक्त राष्ट्र के मानक न्यूनतम नियम कहा जाता है, स्वतंत्रता से वंचित सभी व्यक्तियों के मानवीय व्यवहार के लिए न्यूनतम मानक निर्धारित करते हैं।
- यूरोपीय मानवाधिकार अभिसमय (1950): व्यक्ति की गरिमा तथा न्याय तक पहुँच के अधिकार को मान्यता देता है।
सुधार हेतु सिफारिशें
विधि आयोग की रिपोर्टें
- 69वीं रिपोर्ट (1977): भारतीय विधि आयोग ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम में धारा 26A जोड़ने का प्रस्ताव दिया था, जिससे वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के समक्ष दिए गए स्वीकारोक्ति कथनों को ग्राह्य बनाया जा सके।
- 273वीं रिपोर्ट: भारत में यातना-निरोधी कानून बनाने की अनुशंसा की तथा कहा कि वर्तमान कानूनी सुरक्षा उपाय पर्याप्त नहीं हैं।
पुलिस सुधार
- प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ (2006) मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए निर्देशों का प्रभावी क्रियान्वयन किया जाए, जिनमें पुलिस के अन्वेषण कार्य तथा कानून-व्यवस्था संबंधी कार्यों को अलग करना,पुलिस शिकायत प्राधिकरणों की स्थापना करना आदि शामिल हैं ।
प्रौद्योगिकी का अनिवार्य उपयोग
- पूछताछ कक्षों में सीसीटीवी कैमरे, पूछताछ का डिजिटल अभिलेखन तथा बॉडी कैमरों का उपयोग सामान्य व्यवस्था बनाया जाए।
न्यायिक सुधार
- अभिरक्षा में अपराधों के लिए त्वरित न्यायालयों की स्थापना की जाए तथा दोषी अधिकारियों के विरुद्ध कठोर दंड सुनिश्चित किया जाए।
आपराधिक कानून सुधार (2023)
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 (जो दंड प्रक्रिया संहिता का स्थान लेती है) गिरफ्तारी में अधिक पारदर्शिता, न्यायालयिक विज्ञान के उपयोग तथा नागरिक-केंद्रित प्रक्रियाओं का प्रावधान करती है।
- भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 तथा भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA), 2023 दंड एवं साक्ष्य संबंधी कानूनों का आधुनिकीकरण करते हैं तथा स्वीकारोक्ति-आधारित पुलिस व्यवस्था पर निर्भरता कम करते हैं।
निष्कर्ष
- संवैधानिक गारंटियों, कानूनी सुरक्षा उपायों तथा न्यायालयों के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद अभिरक्षा में यातना एवं दुर्व्यवहार की घटनाएँ अब भी बनी हुई हैं।
- भारत को अपने संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करने के साथ-साथ एक व्यापक यातना-निरोधी कानून बनाकर, संस्थागत ढाँचे को सुदृढ़ कर तथा जवाबदेही सुनिश्चित करके अपने अंतर्राष्ट्रीय दायित्वों का भी प्रभावी रूप से निर्वहन करना चाहिए।
स्रोत: TH
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