पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन–2/सरकारी नीतियाँ एवं हस्तक्षेप; सामान्य अध्ययन–3/आंतरिक सुरक्षा
सन्दर्भ
- युवाओं में मादक पदार्थों के सेवन पर नियंत्रण के लिए स्वापक नियंत्रण ब्यूरो (NCB) के “स्वापक नियंत्रण दृष्टि दस्तावेज़ 2026–29” के अंतर्गत केंद्र सरकार ने हाल ही में आईआईटी (IIT), आईआईएम (IIM) जैसे शीर्ष उच्च शिक्षण संस्थानों में प्रवेश लेने वाले विद्यार्थियों के लिए वैकल्पिक एवं गोपनीय मादक द्रव्य परीक्षण की व्यवस्था शुरू की है।
स्वैच्छिक मादक द्रव्य जाँच पहल
- उच्च शिक्षा विभाग (शिक्षा मंत्रालय) ने केंद्र प्रायोजित उच्च शिक्षण संस्थानों से नए प्रवेश लेने वाले विद्यार्थियों को स्वेच्छा से मूत्र द्वारा मादक द्रव्य जाँच कराने के लिए प्रोत्साहित करने का आग्रह किया है।
- इस व्यवस्था को 2026–27 शैक्षणिक सत्र से चरणबद्ध तरीके से आईआईटी, आईआईएम तथा एक केंद्रीय विश्वविद्यालय में लागू किया जा रहा है।
- यह कार्यक्रम विद्यार्थियों में मादक पदार्थों की मांग कम करने तथा निवारक स्वास्थ्य देखभाल को बढ़ावा देने की भारत सरकार की व्यापक रणनीति का हिस्सा है।
पहल की प्रमुख विशेषताएँ
- स्वैच्छिक एवं गोपनीय: मूत्र द्वारा मादक द्रव्य जाँच अनिवार्य नहीं है, बल्कि विद्यार्थी अपनी इच्छा से यह परीक्षण करा सकते हैं।
- परीक्षण में एम्फेटामिन, कोकीन, मारिजुआना (भांग/कैनाबिस), बेंज़ोडायज़ेपीन तथा फेनसाइक्लिडीन (PCP) जैसे पदार्थों की जाँच की जाएगी।
- जाँच रिपोर्ट निर्धारित विद्यार्थी कल्याण समितियों को सीलबंद गोपनीय लिफाफे में प्रस्तुत करनी होगी।
- परिणाम गोपनीय एवं गुमनाम रखे जाएंगे तथा उनका उपयोग केवल परामर्श एवं छात्र कल्याण सहायता के लिए किया जाएगा।
- इसका प्रवेश प्रक्रिया या शैक्षणिक मूल्यांकन से कोई संबंध नहीं होगा।
- चरणबद्ध कार्यान्वयन
- वर्ष 2029 तक लगभग 170 केंद्रीय वित्तपोषित उच्च शिक्षण संस्थानों को इस पहल के अंतर्गत लाने का लक्ष्य है।
- 2026–27: आईआईटी, आईआईएम तथा एक केंद्रीय विश्वविद्यालय।
- 2027–28: 32 राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (NIT), 8 भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (IISER), 25 भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान (IIIT), 3 योजना एवं वास्तुकला विद्यालय (SPA) तथा 4 केंद्रीय वित्तपोषित तकनीकी संस्थान।
- 2028–29: 46 केंद्रीय विश्वविद्यालय तथा 4 मानित विश्वविद्यालय।
- संस्थानों के परामर्श में मुख्य रूप से गोपनीयता एवं परामर्श पर बल दिया गया है तथा स्पष्ट किया गया है कि परीक्षण के परिणामों का प्रवेश पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।
पहल का महत्त्व
- जन स्वास्थ्य आधारित दृष्टिकोण: यह योजना दंडात्मक व्यवस्था से हटकर शीघ्र पहचान, उपचार एवं पुनर्वास पर बल देती है, जो आधुनिक जन स्वास्थ्य पद्धति के अनुरूप है।
- प्रारंभिक हस्तक्षेप: जाँच के माध्यम से ऐसे विद्यार्थियों की समय रहते पहचान की जा सकती है जिन्हें मनोवैज्ञानिक या चिकित्सीय सहायता की आवश्यकता हो, इससे लत गंभीर होने से पहले उपचार संभव होगा।
- साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण: यह कार्यक्रम सरकार द्वारा प्रस्तावित मादक पदार्थों के उपयोग पर राष्ट्रीय सर्वेक्षण को अद्यतन आँकड़े उपलब्ध कराने में सहायता करेगा, जिससे बेहतर नीतियाँ बनाई जा सकेंगी।
- परिसर का समग्र कल्याण: नशामुक्त परिसर की दिशा में यह पहल विद्यार्थियों के स्वास्थ्य, शैक्षणिक सफलता, परिसर की सुरक्षा तथा मानसिक स्वास्थ्य को बढ़ावा दे सकती है।
मादक पदार्थों की समस्या के प्रमुख कारण
- रणनीतिक स्थिति: भारत का गोल्डन क्रेसेंट और गोल्डन ट्रायंगल के निकट स्थित होना इसे सीमा-पार मादक पदार्थों की तस्करी के प्रति अधिक संवेदनशील बनाता है।
- संगठित अपराध: मादक पदार्थों की तस्करी संगठित अपराध, धन शोधन तथा नार्को-आतंकवाद को बढ़ावा देती है।
- तस्करी के बदलते तरीके: समुद्री मार्गों, वाणिज्यिक मालवाहक परिवहन, एन्क्रिप्टेड संचार तथा आधुनिक तकनीक का बढ़ता उपयोग।
संबंधित सरकारी पहलें
- काशी घोषणा (2025): युवाओं के नेतृत्व में नशा मुक्ति अभियान के लिए पाँच वर्षीय कार्य-योजना प्रदान करती है।
- नशा मुक्त भारत अभियान (NMBA): देशव्यापी जन-जागरूकता अभियानों के माध्यम से मादक पदार्थों के विरुद्ध जागरूकता फैलाता है।
- विकसित भारत संकल्प के लिए नशा मुक्त युवा अभियान: यह सरकार के व्यापक नशा मुक्त भारत अभियान का हिस्सा है।
- मादक पदार्थों की मांग में कमी हेतु राष्ट्रीय कार्ययोजना (NAPDDR): सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय द्वारा संचालित यह योजना नशामुक्ति केंद्रों, निवारक शिक्षा, उपचार, पुनर्वास, कौशल विकास तथा समाज में पुनर्स्थापन को समर्थन देती है।
- स्वापक औषधि एवं मनःप्रभावी पदार्थ अधिनियम, 1985 (NDPS Act): अवैध मादक पदार्थों की तस्करी की रोकथाम, स्वापक औषधियों एवं मनःप्रभावी पदार्थों के नियंत्रण तथा संबंधित अपराधों के दंड हेतु विधिक ढाँचा प्रदान करता है।
- कानून प्रवर्तन: मादक पदार्थ निरोधक कार्यबल (ANTFs), संयुक्त समन्वय समिति (JCC) तथा राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (NIA)।
चिंताएँ एवं चुनौतियाँ
- गोपनीयता एवं निजता: संवेदनशील स्वास्थ्य संबंधी जानकारी के दुरुपयोग एवं सामाजिक कलंक से बचने के लिए पूर्ण गोपनीयता सुनिश्चित करनी होगी।
- सूचित सहमति: विद्यार्थियों को यह विश्वास दिलाना आवश्यक है कि परीक्षण पूर्णतः स्वैच्छिक है और उन पर किसी प्रकार का दबाव नहीं डाला जाएगा।
- कलंकित होने का जोखिम: गोपनीय परीक्षण के बावजूद यदि परामर्श व्यवस्था पर्याप्त न हो या गोपनीयता भंग हो जाए तो विद्यार्थियों में भय एवं सामाजिक कलंक की भावना उत्पन्न हो सकती है।
- संस्थागत क्षमता: उच्च शिक्षण संस्थानों को पर्याप्त प्रशिक्षित परामर्शदाता, मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ, मानक संचालन प्रक्रियाएँ तथा प्रभावी डेटा संरक्षण व्यवस्था सुनिश्चित करनी होगी।
- नैतिक पक्ष: चिकित्सीय नैतिकता के अनुसार स्वायत्तता का सम्मान, स्वास्थ्य अभिलेखों की गोपनीयता, भेदभावरहित व्यवहार तथा सहयोगात्मक दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है।
आगे की राह
- परिसरों में मानसिक स्वास्थ्य एवं नशा मुक्ति परामर्श की निःशुल्क उपलब्धता सुनिश्चित की जाए।
- प्रभावी डेटा गोपनीयता एवं निजता संरक्षण व्यवस्था विकसित की जाए।
- अभिभावकों, शिक्षकों एवं सहपाठियों के लिए जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाएँ।
- उच्च शिक्षा में जीवन कौशल शिक्षा एवं मानसिक स्वास्थ्य को बढ़ावा दिया जाए।
- कार्यक्रम की प्रभावशीलता एवं संभावित दुष्परिणामों का समय-समय पर मूल्यांकन किया जाए।
- शिक्षा, स्वास्थ्य, कानून प्रवर्तन एजेंसियों तथा सामुदायिक संगठनों को साथ लेकर बहु-विषयक दृष्टिकोण अपनाया जाए।
स्रोत: TH
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