पाठ्यक्रम: GS3/कृषि; अर्थव्यवस्था
संदर्भ
- भारत ने मध्य पूर्व संघर्ष के कारण अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल और उर्वरक कीमतों में वृद्धि के बावजूद, व्यापक समर्थन तथा कृषि सब्सिडी के माध्यम से यूरिया एवं डीज़ल जैसे प्रमुख कृषि इनपुट्स के खुदरा मूल्य अपेक्षाकृत स्थिर बनाए रखे हैं।
कृषि सब्सिडी के बारे में
- कृषि सब्सिडी का तात्पर्य सरकार द्वारा किसानों को दी जाने वाली वित्तीय सहायता से है, जिसका उद्देश्य इनपुट लागत को कम करना, आय को स्थिर करना और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
- भारत का सब्सिडी ढांचा हरित क्रांति के दौरान उर्वरक उपयोग, सिंचाई और उच्च उत्पादकता वाली फसलों की खेती को प्रोत्साहित करने के लिए सशक्त रूप से उभरा।
भारत में प्रमुख कृषि सब्सिडियाँ
- उर्वरक सब्सिडी: भारत विश्व के सबसे बड़े उर्वरक सब्सिडी देने वाले देशों में से एक है। यह मुख्यतः यूरिया, डीएपी (डायमोनियम फॉस्फेट), पोटाशिक और फॉस्फेटिक उर्वरकों पर केंद्रित है।
- पोषक तत्व आधारित सब्सिडी (NBS): यह फॉस्फेटिक और पोटाशिक उर्वरकों पर लागू होती है तथा सब्सिडी पोषक तत्वों की मात्रा से जुड़ी होती है। किसान वास्तविक बाजार मूल्य का केवल एक अंश ही भुगतान करते हैं।
- खाद्य सब्सिडी: सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) और भारतीय खाद्य निगम (FCI) द्वारा खरीद के माध्यम से लागू।
- प्रमुख घटक: MSP खरीद, PDS, और पीएम गरीब कल्याण अन्न योजना का एकीकरण।
- राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA) के अंतर्गत लगभग 80 करोड़ लाभार्थी।
- विद्युत सब्सिडी: कई राज्यों में सिंचाई पंपों के लिए मुफ्त या अत्यधिक सब्सिडी वाली बिजली।
- राज्यों द्वारा सामूहिक रूप से ₹1.5–2 लाख करोड़ वार्षिक व्यय।
- प्रमुख लाभार्थी राज्य: पंजाब, हरियाणा, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु।
- सिंचाई सब्सिडी: नहर सिंचाई हेतु कम जल शुल्क और सूक्ष्म-सिंचाई के लिए समर्थन।
- आय सहायता: प्रत्यक्ष आय सहायता प्रदान की जाती है, जिससे केवल मूल्य सब्सिडी पर निर्भरता कम होती है।
- न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) सहायता: 22 अनिवार्य फसलों और गन्ने के लिए MSP घोषित।
- गेहूँ और धान की खरीद में प्रमुख हिस्सा।
- MSP प्रणाली मुख्यतः पंजाब, हरियाणा और तेलंगाना जैसे कुछ राज्यों को अधिक लाभ पहुँचाती है।
कृषि सब्सिडी का महत्व
- खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना: सब्सिडियों ने भारत को खाद्य-अभावग्रस्त राष्ट्र से खाद्य-समृद्ध अर्थव्यवस्था में बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- किसानों की आय का समर्थन: छोटे और सीमांत किसान (लगभग 86% भूमि धारक) कम इनपुट लागत से लाभान्वित होते हैं।
- कृषि उत्पादन स्थिर करना: सब्सिडियाँ किसानों को वैश्विक मूल्य अस्थिरता से बचाकर उत्पादन और ग्रामीण स्थिरता बनाए रखने में सहायक।
- ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बढ़ावा: कृषि समर्थन ग्रामीण मांग, रोजगार और संबद्ध क्षेत्रों को प्रोत्साहित करता है।
- रणनीतिक महत्व: स्थिर कृषि उत्पादन आयात पर निर्भरता कम करता है और राष्ट्रीय खाद्य संप्रभुता को सुदृढ़ करता है।
कृषि सब्सिडियों से जुड़ी प्रमुख चिंताएँ, मुद्दे और चुनौतियाँ
- राजकोषीय भार में वृद्धि: प्राकृतिक गैस और उर्वरकों की वैश्विक कीमतों में वृद्धि के कारण भारत का उर्वरक सब्सिडी व्यय हाल के वर्षों में तीव्रता से बढ़ा है।
- यह व्यय अवसंरचना, स्वास्थ्य और शिक्षा हेतु राजकोषीय स्थान को सीमित करता है।
- फसल पैटर्न में विकृति: सब्सिडी और MSP खरीद मुख्यतः गेहूँ एवं धान जैसी जल-प्रधान फसलों को बढ़ावा देती है, विशेषकर पंजाब तथा हरियाणा में।
- परिणामस्वरूप भूजल का क्षय, मृदा ह्रास और फसल विविधीकरण में कमी।
- पर्यावरणीय चिंताएँ: सब्सिडी वाले यूरिया के अत्यधिक उपयोग से मृदा पोषक असंतुलन, उर्वरता में कमी और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में वृद्धि।
- आर्थिक सर्वेक्षण ने बार-बार नाइट्रोजनयुक्त उर्वरकों के अति-उपयोग पर प्रकाश डाला है।
- अप्रभावी लक्ष्यीकरण: बड़े किसान अधिक भूमि और इनपुट उपयोग के कारण सब्सिडी का असमान रूप से बड़ा हिस्सा प्राप्त करते हैं।
- कई बटाईदार और भूमिहीन कृषक इससे वंचित रहते हैं।
- संरचनात्मक सुधारों में विलंब: तीन कृषि कानूनों की वापसी के बाद सरकारें सुधारों को लेकर सतर्क हो गई हैं।
- परिणामस्वरूप बाजार सुधार अधूरे हैं, निजी निवेश सीमित है और कृषि उत्पादकता वृद्धि मध्यम स्तर पर है।
- सब्सिडी संस्कृति पर निर्भरता: सब्सिडियों पर अत्यधिक निर्भरता नवाचार, विविधीकरण और संसाधनों के कुशल उपयोग को हतोत्साहित कर सकती है।
प्रमुख प्रयास एवं सरकारी पहल
- पीएम-किसान योजना: किसानों को प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) के माध्यम से ₹6,000 वार्षिक आय सहायता।
- नीम-लेपित यूरिया: विचलन को कम करने और नाइट्रोजन उपयोग दक्षता बढ़ाने हेतु लागू।
- उर्वरकों में प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT): पारदर्शिता बढ़ाने और रिसाव कम करने के लिए लागू।
- पीएम-कुसुम योजना: कृषि में सौर पंप और नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा।
- प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY): ‘प्रति बूंद अधिक फसल’ पर केंद्रित, सूक्ष्म-सिंचाई और जल उपयोग दक्षता को प्रोत्साहित करती है।
- ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई प्रणाली का विस्तार तथा सिंचाई कवरेज में वृद्धि।
- राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन (NMSA): जलवायु-संवेदनशील और संसाधन-कुशल खेती को प्रोत्साहित करता है।
- राष्ट्रीय कृषि बाज़ार (e-NAM): कृषि बाज़ारों का डिजिटल एकीकरण और मूल्य खोज में सुधार का लक्ष्य।
आगे की राह: कृषि सब्सिडी तंत्र को सुदृढ़ करना
- सब्सिडियों का युक्तिकरण: सब्सिडियों को धीरे-धीरे उत्पाद-आधारित समर्थन से आय-आधारित समर्थन की ओर स्थानांतरित करना चाहिए, जबकि कमजोर किसानों की सुरक्षा सुनिश्चित हो।
- संतुलित संक्रमण राजकोषीय दबाव को कम कर सकता है बिना किसान कल्याण को प्रभावित किए।
- फसल विविधीकरण को बढ़ावा: नीतियों को गेहूँ-धान की अत्यधिक खेती के बजाय दलहन, तिलहन और मोटे अनाज को प्रोत्साहित करना चाहिए।
- ‘श्री अन्न’ के रूप में मोटे अनाज की घोषणा इस दिशा में एक कदम है।
- सतत कृषि को प्रोत्साहन: जैविक खेती, प्राकृतिक खेती, सटीक कृषि और सूक्ष्म-सिंचाई को समर्थन देकर उत्पादकता बढ़ाई जा सकती है और पारिस्थितिक दबाव कम किया जा सकता है।
- प्रौद्योगिकी के माध्यम से बेहतर लक्ष्यीकरण: आधार-लिंक्ड डेटाबेस, भूमि अभिलेखों का डिजिटलीकरण और DBT प्रणाली का उपयोग सब्सिडी दक्षता बढ़ा सकता है तथा रिसाव कम कर सकता है।
- कृषि बाज़ारों को सुदृढ़ करना: सुधारों को भंडारण अवसंरचना, किसान उत्पादक संगठन (FPOs), कृषि-लॉजिस्टिक्स, मूल्य श्रृंखला और खाद्य प्रसंस्करण पर केंद्रित होना चाहिए।
- कल्याण और राजकोषीय विवेक का संतुलन: दीर्घकालिक स्थिरता के लिए कल्याणकारी उपायों और राजकोषीय अनुशासन के बीच संतुलन आवश्यक है। साथ ही उत्पादकता-वर्धक सुधारों को बढ़ावा देते हुए सब्सिडियाँ ग्रामीण स्थिरता हेतु अनिवार्य बनी रहनी चाहिए।
| दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न [प्रश्न] भारत में कृषि सब्सिडियों के महत्व पर चर्चा कीजिए। वर्तमान सब्सिडी व्यवस्था से जुड़ी प्रमुख चुनौतियों की समीक्षा कीजिए। |
स्रोत: IE
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