भारत की केयर इकोनॉमी(देखभाल अर्थव्यवस्था) की पहचान और सुदृढ़ीकरण”

पाठ्यक्रम: GS1/ समाज, GS3/ अर्थव्यवस्था

संदर्भ 

  • प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) द्वारा जारी एक कार्यपत्र में भारत की “केयर इकोनॉमी” को सुदृढ़ करने हेतु एक रोडमैप प्रस्तुत किया गया है। इस क्षेत्र में बाल देखभाल, वृद्ध देखभाल तथा दिव्यांगजन सहायता जैसी सेवाएँ सम्मिलित हैं।

केयर इकोनॉमी क्या है?

  • केयर इकोनॉमी उन सभी भुगतान और अप्रदत्त गतिविधियों को संदर्भित करती है जो बच्चों, वृद्धजनों एवं दिव्यांग व्यक्तियों की देखभाल से जुड़ी होती हैं।
    • यह कार्य मानव विकास, श्रम उत्पादकता और आधुनिक समाजों की सामाजिक कल्याण प्रणाली का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है।
  • अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार, देखभाल सेवाओं में निवेश बढ़ाने से वर्ष 2030 तक वैश्विक स्तर पर 475 मिलियन रोजगार सृजित हो सकते हैं।
    • भारत में यदि सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का 2% प्रत्यक्ष सार्वजनिक निवेश किया जाए तो लगभग 1.1 करोड़ रोजगार उत्पन्न हो सकते हैं, जिनमें से लगभग 70% महिलाओं को प्राप्त होंगे।

केयर सेवाओं की मांग में वृद्धि के कारण

  • जनसांख्यिकीय परिवर्तन: वृद्धजन जनसंख्या में वृद्धि से दीर्घकालिक देखभाल की आवश्यकता बढ़ रही है।
  • शहरीकरण और प्रवासन: संयुक्त परिवार प्रणाली के कमजोर होने से परमाणु परिवारों में अनौपचारिक देखभाल नेटवर्क का अभाव है।
  • महिला कार्यबल भागीदारी: अधिक महिलाएँ कार्यबल में शामिल हो रही हैं, जिससे संगठित बाल देखभाल और अन्य सेवाओं की मांग बढ़ी है।

सरकारी पहल 

  • राष्ट्रीय वयोश्री योजना : वरिष्ठ नागरिकों को आयु-संबंधी अक्षमताओं हेतु भौतिक सहायक उपकरण और सहायक जीवन-यापन साधन प्रदान करती है।
  • मिशन शक्ति :महिलाओं की सुरक्षा, सशक्तिकरण और सहयोग प्रणालियों को सुदृढ़ करने का उद्देश्य रखता है। इसमें बाल देखभाल और सामाजिक सुरक्षा सेवाएँ भी सम्मिलित हैं।
  • एकीकृत बाल विकास सेवाएँ : 1975 में प्रारंभ की गई।
    • आंगनवाड़ी केन्द्रों के माध्यम से प्रारंभिक बाल देखभाल, पोषण, स्वास्थ्य सेवाएँ और पूर्व-प्राथमिक शिक्षा प्रदान करती है।
    • लक्षित समूह: 0–6 वर्ष के बच्चे, गर्भवती महिलाएँ और स्तनपान कराने वाली माताएँ।
    • सेवाएँ: पूरक पोषण, टीकाकरण, स्वास्थ्य परीक्षण और पूर्व-प्राथमिक शिक्षा।
  • पोषण अभियान:  महिलाओं और बच्चों में अविकसित वृद्धि, कुपोषण और एनीमिया को कम करने पर केंद्रित।
    • व्यवहार परिवर्तन को प्रोत्साहित करता है।
    • तकनीक (पोषण ट्रैकर) के उपयोग और स्वास्थ्य व पोषण सेवाओं के अभिसरण को बढ़ावा देता है।
  • मिशन शक्ति : महिला सशक्तिकरण और सुरक्षा हेतु एक व्यापक कार्यक्रम।
    • इसमें बाल देखभाल सेवाओं और महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण को समर्थन देने वाली योजनाएँ सम्मिलित हैं।
  • पालना योजना (राष्ट्रीय क्रेच योजना): 6 माह से 6 वर्ष तक के बच्चों के लिए डे-केयर सुविधा प्रदान करती है।
    • पोषण, स्वास्थ्य देखभाल और प्रारंभिक शिक्षा समर्थन उपलब्ध कराती है।
    • माताओं को कार्यबल में भागीदारी हेतु सक्षम बनाती है।
    • मिशन शक्ति के अंतर्गत संचालित होती है तथा केंद्र–राज्य वित्तीय सहयोग से समर्थित है।

चुनौतियाँ 

  • वित्तीय सीमाएँ : देखभाल अवसंरचना का विस्तार और कार्यबल प्रशिक्षण हेतु पर्याप्त सार्वजनिक निवेश तथा दीर्घकालिक वित्तीय प्रतिबद्धता की आवश्यकता होती है।
  • देखभाल कार्य के प्रति सामाजिक दृष्टिकोण: देखभाल कार्य को अब भी निजी पारिवारिक जिम्मेदारी माना जाता है, न कि सार्वजनिक नीति का विषय।
  • गहरे पितृसत्तात्मक मानदंड : अप्रदत्त देखभाल कार्य को मान्यता देने में बाधा उत्पन्न करते हैं।
  • कमज़ोर नियामक क्षमता : भारत में देखभाल संस्थानों की गुणवत्ता मानकों को सुनिश्चित करना और निगरानी करना प्रशासनिक दृष्टि से चुनौतीपूर्ण है।
  • कुशल देखभाल कार्यबल का अभाव : भारत में पेशेवर रूप से प्रशिक्षित देखभालकर्ताओं की कमी है, विशेषकर वृद्ध देखभाल, दिव्यांगजन सहायता और प्रारंभिक बाल देखभाल के क्षेत्र में।

आगे की राह

  • देखभाल सेवाओं को शिक्षा और स्वास्थ्य की तरह आवश्यक सामाजिक अवसंरचना के रूप में मान्यता दी जाए।
  • बाल देखभाल केन्द्रों, वृद्ध देखभाल संस्थानों, पुनर्वास केन्द्रों और सामुदायिक सहयोग प्रणालियों में सार्वजनिक निवेश बढ़ाया जाए।
  • देखभाल नीतियों को श्रम सुधार, लैंगिक बजटिंग और महिला सशक्तिकरण कार्यक्रमों से जोड़ा जाए।
  • समय-उपयोग सर्वेक्षण और सांख्यिकीय ढाँचे को सुदृढ़ कर अप्रदत्त देखभाल कार्य के आर्थिक योगदान का आकलन किया जाए।

Source: ET

 

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