RTE अधिनियम एवं सामाजिक समावेशन की अवधारणा 

पाठ्यक्रम: GS2/शिक्षा से संबंधित मुद्दे

संदर्भ

  • हाल ही में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 की धारा 12(1)(c) की दृष्टि को पुनः पुष्टि की, जो संविधान के अनुच्छेद 14 और 21A के अंतर्गत ‘स्थिति की समानता’ का प्रतीक है।
  • यह केवल एक कल्याणकारी योजना नहीं, बल्कि सामाजिक एकीकरण की संवैधानिक रणनीति को दर्शाता है।

शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE Act), 2009 के बारे में

  • बच्चों को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 (RTE Act) भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21A को क्रियान्वित करता है, जिसे 86वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2002 द्वारा जोड़ा गया था। इसके अंतर्गत 6–14 वर्ष आयु के बच्चों के लिए शिक्षा मौलिक अधिकार बन गई।
  • यह कल्याण-आधारित विद्यालयी व्यवस्था से अधिकार-आधारित ढाँचे की ओर परिवर्तन को चिह्नित करता है।
  • उद्देश्य:
    • सार्वभौमिक प्राथमिक शिक्षा सुनिश्चित करना
    • समानता और सामाजिक समावेशन को बढ़ावा देना
    • शिक्षा की गुणवत्ता और अधिगम परिणामों में सुधार करना
    • ड्रॉपआउट दर और असमानताओं को कम करना

संवैधानिक एवं नीतिगत महत्व

  • अनुच्छेद 21A: 6–14 वर्ष आयु के बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा की गारंटी।
  • नीति निर्देशक तत्व (अनुच्छेद 38, 39, 46): सामाजिक न्याय को बढ़ावा देना और असमानताओं को कम करना।
  • धारा 12(1)(c): विद्यालयी स्थानों में विविधता को समाहित कर इन प्रावधानों को क्रियान्वित करता है।

प्रमुख विशेषताएँ / प्रावधान

  • निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा: 6–14 वर्ष आयु के बच्चों से कोई शुल्क नहीं लिया जाएगा; प्रवेश, उपस्थिति और पूर्णता सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी सरकार की होगी।
  • नो डिटेंशन नीति (बाद में संशोधित): प्रारंभ में कक्षा 8 तक किसी बच्चे को रोका या निष्कासित नहीं किया जा सकता था; 2019 में संशोधन कर कक्षा 5 एवं 8 में परीक्षा की अनुमति दी गई।
  • मानक एवं मानदंड: छात्र-शिक्षक अनुपात (PTR), आधारभूत संरचना (कक्षाएँ, शौचालय, पेयजल), तथा शिक्षक की योग्यता (NCTE के अनुसार)।
  • भेदभाव का निषेध: प्रवेश हेतु कोई स्क्रीनिंग प्रक्रिया नहीं; शारीरिक दंड या मानसिक उत्पीड़न निषिद्ध।
  • विद्यालय प्रबंधन समितियाँ (SMCs): अभिभावकों और स्थानीय प्राधिकरणों से गठित, विद्यालय विकास योजना एवं निगरानी की जिम्मेदारी।

सामाजिक एकीकरण क्यों महत्वपूर्ण है?

  • भारत की शिक्षा प्रणाली ऐतिहासिक रूप से वर्ग, जाति और आय के आधार पर विभाजित रही है, जहाँ अभिजात्य निजी विद्यालय एवं संसाधन-विहीन सरकारी विद्यालयों के बीच असमानता रही है।
  • इससे सामाजिक अलगाव, असमानता की पुनरावृत्ति और सीमित गतिशीलता उत्पन्न होती है।
  • RTE अधिनियम ‘साझा विद्यालयी स्थानों’ को संस्थागत बनाकर हस्तक्षेप करता है, जो अनुच्छेद 14 (समानता), अनुच्छेद 21A (शिक्षा का अधिकार), और अनुच्छेद 38 (न्याय पर आधारित सामाजिक व्यवस्था) के अनुरूप है।

RTE के अंतर्गत सामाजिक एकीकरण की व्यवस्था

  • निजी विद्यालयों में 25% आरक्षण (धारा 12(1)(c)): निजी अप्रतिबंधित विद्यालयों को आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (EWS) और वंचित समूहों के लिए 25% सीटें आरक्षित करनी होती हैं। इससे सामाजिक-आर्थिक विभाजनों के पार संवाद को बढ़ावा मिलता है।
  • पड़ोस विद्यालय अवधारणा: स्थानीय, समावेशी विद्यालयी समुदायों को प्रोत्साहित करता है और भौगोलिक एवं वर्गीय विभाजन को कम करता है।
  • समावेशी कक्षा मानदंड: भेदभाव, स्क्रीनिंग या पृथक्करण की अनुमति नहीं; सभी को समान सुविधाओं, गतिविधियों और अवसरों तक पहुँच।

सामाजिक एकीकरण का प्रभाव

  • सकारात्मक परिणाम (प्रमाण-आधारित): बच्चों में पूर्वाग्रह और भेदभाव में कमी, सामाजिक व्यवहार एवं सहानुभूति में सुधार, सामाजिक पूँजी तथा सहपाठी नेटवर्क तक पहुँच, वंचित बच्चों में आकांक्षाओं और आत्मविश्वास में वृद्धि।
  • वृहत्तर सामाजिक लाभ: समावेशी नागरिकता को बढ़ावा, पीढ़ीगत असमानता में कमी, राष्ट्रीय एकीकरण और लोकतांत्रिक मूल्यों को सुदृढ़ करना।
  • क्रियान्वयन से प्रमाण: 50 लाख से अधिक बच्चों का प्रवेश; कई राज्यों में 90% से अधिक प्रतिधारण दर।
    • दिल्ली और अहमदाबाद जैसे शहरी केंद्रों में समेकित कक्षाओं का सामान्यीकरण।
  • नीति एवं शासन सुधार: डिजिटल प्रवेश प्रणाली (राजस्थान, गुजरात, दिल्ली); MIS-आधारित निगरानी और प्रतिपूर्ति; विवेकाधिकार में कमी और पारदर्शिता में वृद्धि।

सीमाएँ एवं चुनौतियाँ

  • छिपा हुआ पृथक्करण: कक्षा में लेबलिंग, कलंक या सूक्ष्म बहिष्करण के उदाहरण।
  • असमान भागीदारी: EWS छात्रों को भाषा अवरोध, सांस्कृतिक अंतर और वित्तीय कठिनाइयाँ (यूनिफॉर्म, परिवहन) का सामना।
  • संस्थागत बाधाएँ: कुछ निजी विद्यालयों का प्रतिरोध; समावेशन मानदंडों का अपर्याप्त प्रवर्तन।
  • प्रशासनिक अंतराल: विलंबित प्रतिपूर्ति, कमजोर शिकायत निवारण तंत्र, राज्यों में असमान क्रियान्वयन।
    • गुणवत्ता की कमी, आधारभूत संरचना की कमी और शिक्षक अनुपस्थिति जैसी अन्य समस्याएँ।

निष्कर्ष एवं आगे की राह

  • RTE अधिनियम की धारा 12(1)(c) एक परिवर्तनकारी संवैधानिक प्रयोग का प्रतिनिधित्व करती है, जो औपचारिक समानता से आगे बढ़कर वास्तविक समानता की ओर ले जाती है।
  • सर्वोच्च न्यायालय की पुनः पुष्टि स्पष्ट करती है कि यह प्रावधान साझा सामाजिक स्थानों के निर्माण के बारे में है, जहाँ असमानता को सक्रिय रूप से समाप्त किया जाता है।
  • अब वास्तविक चुनौती प्रभावी क्रियान्वयन में है, ताकि सामाजिक एकीकरण का वादा प्रत्येक बच्चे के लिए मूर्त वास्तविकता बन सके।
  • आवश्यक कदम:
  • RTE क्रियान्वयन के साथ-साथ सार्वजनिक शिक्षा को सुदृढ़ करना।
  • निजी विद्यालयों को समय पर प्रतिपूर्ति सुनिश्चित करना।
  • सख्त विनियमन द्वारा छिपी हुई लागतों को समाप्त करना।
  • अभिभावकों हेतु शिकायत निवारण प्रणाली में सुधार।
  • वंचित समूहों में जागरूकता और पहुँच बढ़ाना।
  • कक्षा में समावेशन प्रथाओं की निगरानी करना, ताकि भेदभाव रोका जा सके।
दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न
[प्रश्न] शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE Act), 2009 सामाजिक समावेशन का एक संवैधानिक साधन है। टिप्पणी कीजिए। इसके प्रभावी क्रियान्वयन में आने वाली चुनौतियों का विश्लेषण कीजिए।

स्रोत: TH

 

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