विनिर्माण केंद्र: एकीकृत औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण

पाठ्यक्रम: GS3/अर्थव्यवस्था

संदर्भ

  •  भारत की विनिर्माण रणनीति ने हाल के वर्षों में एकीकृत विनिर्माण केंद्रों के विकास पर बढ़ता हुआ ध्यान केंद्रित किया है।

भारत में विनिर्माण क्षेत्र 

  • विनिर्माण क्षेत्र सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में लगभग 16–17% का योगदान देता है तथा 27 मिलियन से अधिक श्रमिकों को रोजगार प्रदान करता है।
  •  जैसे-जैसे देश 2047 तक 3.7 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था से 30–35 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था में रूपांतरण की दिशा में अग्रसर है, विनिर्माण क्षेत्र की केंद्रीय भूमिका अपेक्षित है, जिसमें GDP में इसकी हिस्सेदारी कम से कम 25% तक बढ़ने की संभावना है।
  • भारत 14 पहचाने गए उभरते क्षेत्रों जैसे सेमीकंडक्टर, नवीकरणीय ऊर्जा घटक, चिकित्सा उपकरण, बैटरियाँ तथा श्रम-प्रधान उद्योगों, जिनमें चमड़ा और वस्त्र उद्योग शामिल हैं, पर ध्यान केंद्रित कर रहा है ताकि GDP में विनिर्माण की हिस्सेदारी को बढ़ाया जा सके।

भारत के विनिर्माण क्षेत्र के समक्ष चुनौतियाँ
अवसंरचना बाधाएँ: उच्च लॉजिस्टिक लागत, कमजोर बंदरगाह संपर्कता तथा विद्युत आपूर्ति में कमी के कारण उत्पादन स्तर कम रहता है।
अनुसंधान एवं नवाचार की कमी: भारत GDP का 1% से भी कम अनुसंधान एवं विकास (R&D) में निवेश करता है, जिससे उच्च-प्रौद्योगिकी विनिर्माण सीमित रहता है।
आयात पर निर्भरता: सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक घटकों तथा रक्षा उपकरणों के लिए आयात पर अत्यधिक निर्भरता।
कौशल अंतराल: कार्यबल के कौशल और उद्योग की आवश्यकताओं के बीच महत्वपूर्ण असंगति।
कम उत्पादकता: पुरानी मशीनरी, छोटे एवं बिखरे हुए उत्पादन इकाइयों तथा सीमित स्वचालन के कारण उत्पादकता निम्न बनी रहती है।
वैश्विक प्रतिस्पर्धा: वियतनाम, बांग्लादेश तथा चीन जैसे देश सस्ता उत्पादन और बेहतर पारिस्थितिकी तंत्र प्रदान करते हैं, जिससे भारतीय उत्पाद कम प्रतिस्पर्धी बनते हैं।
पर्यावरणीय चिंताएँ: सतत एवं हरित विनिर्माण के लिए बढ़ता दबाव तथा उच्च अनुपालन लागत।

भारत में विनिर्माण केंद्रों का विकास

  • भारत की विनिर्माण रणनीति ने एकीकृत विनिर्माण केंद्रों के विकास पर निरंतर बल दिया है।
    •  ये केंद्र पैमाने का समर्थन करने, लेन-देन लागत को कम करने तथा दीर्घकालिक विनिर्माण गतिविधियों को स्थिरता प्रदान करने के लिए अभिकल्पित हैं।
  •  इन केंद्रों की आवश्यकता: वे देश जो स्थिर उत्पादन वातावरण प्रदान करने में सक्षम होते हैं—जो अवसंरचना, लॉजिस्टिक्स, कौशल तथा संस्थागत समन्वय से समर्थित होते हैं—वे विनिर्माण गतिविधियों को बनाए रखने और दीर्घकालिक उत्पादन को आकर्षित करने में अधिक सक्षम होते हैं।

भारत में विनिर्माण केंद्रों के प्रकार 

  •  बड़े एकीकृत विनिर्माण केंद्र: ये सुव्यवस्थित (master-planned) औद्योगिक क्षेत्र होते हैं जिनमें प्लग-एंड-प्ले अवसंरचना उपलब्ध होती है और जहाँ प्रमुख निर्माताओं तथा उनके आपूर्तिकर्ता नेटवर्क को एक ही स्थान पर स्थापित किया जाता है।
  • क्षेत्र-विशिष्ट विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र: ये केंद्र उत्पादन इकाइयों को आपूर्तिकर्ता नेटवर्क, परीक्षण सुविधाओं, नियामकीय ढाँचे तथा कौशल विकास अवसंरचना के साथ एकीकृत करते हैं, जिससे संपूर्ण मूल्य शृंखला को समर्थन मिलता है।
    •  बल्क ड्रग पार्क योजना: गुजरात, हिमाचल प्रदेश तथा आंध्र प्रदेश में तीन बल्क ड्रग पार्कों की स्थापना को प्रोत्साहित किया जा रहा है, जिससे बल्क दवाओं के उत्पादन की लागत कम हो सके।
    •  सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स पारिस्थितिकी तंत्र को सेमिकॉन इंडिया कार्यक्रम तथा इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट्स विनिर्माण योजना(ECMS) 2.0 के अंतर्गत समर्थन दिया जा रहा है, जिसमें निर्माण, संयोजन, पैकेजिंग तथा परीक्षण शामिल हैं।
  • सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSME) विनिर्माण क्लस्टर: माइक्रो एवं स्मॉल एंटरप्राइजेज – क्लस्टर डेवलपमेंट प्रोग्राम (MSE-CDP) के अंतर्गत अवसंरचना निर्माण, सामान्य सुविधा केंद्र (CFCs) तथा तकनीकी उन्नयन को समर्थन दिया जाता है।
    • भारत औद्योगिक भूमि बैंक (IILB): यह देशभर में औद्योगिक क्षेत्रों, क्लस्टरों, पार्कों तथा क्षेत्रों का मानचित्रण करता है।
    •  राज्य औद्योगिक विकास निगम MSMEs के लिए औद्योगिक क्षेत्रों का विकास एवं प्रबंधन करते हैं।
  • कॉरिडोर-लिंक्ड औद्योगिक नोड्स: ये कॉरिडोर मूलभूत अवसंरचना, माल परिवहन संपर्कता तथा बहु-मोडल लॉजिस्टिक्स प्रदान करते हैं, जिससे बड़े पैमाने पर औद्योगिक एकाग्रता संभव होती है।
    •  दिल्ली–मुंबई औद्योगिक कॉरिडोर (DMIC), चेन्नई–बेंगलुरु औद्योगिक कॉरिडोर (CBIC), अमृतसर–कोलकाता औद्योगिक कॉरिडोर (AKIC) तथा विशाखापट्टनम–चेन्नई औद्योगिक कॉरिडोर (VCIC) जैसे औद्योगिक कॉरिडोर विनिर्माण केंद्रों को समर्थन देने के लिए विकसित किए जा रहे हैं।

प्रमुख सरकारी नीतियाँ

  • राष्ट्रीय औद्योगिक गलियारा विकास कार्यक्रम (NICDP):भारत में ग्रीनफील्ड औद्योगिक स्मार्ट शहरों की स्थापना हेतु अभिकल्पित, जिससे देश को वैश्विक विनिर्माण केंद्र के रूप में स्थापित किया जा सके।
    •  सरकार द्वारा 20 औद्योगिक स्मार्ट शहरों को स्वीकृति प्रदान की गई है, जो 7 औद्योगिक कॉरिडोर तथा 13 राज्यों में विस्तृत हैं।
  • PM MITRA (प्रधानमंत्री मेगा एकीकृत वस्त्र क्षेत्र और परिधान):यह वस्त्र मूल्य शृंखला के लिए विशेष रूप से तैयार बड़े एकीकृत विनिर्माण केंद्र हैं, जिनमें प्रसंस्करण, निर्माण, लॉजिस्टिक्स तथा सामान्य सुविधाएँ एक ही परिसर में उपलब्ध होती हैं।
    •  ये पार्क तमिलनाडु, तेलंगाना, गुजरात, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश तथा महाराष्ट्र सहित सात राज्यों में घोषित किए गए हैं।
  • PM Gati Shakti राष्ट्रीय मास्टर प्लान: यह एक समेकित मंच है जो 44 केंद्रीय मंत्रालयों तथा 36 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों की अवसंरचना संबंधी परियोजनाओं और डेटा को एकीकृत करता है।
    •  यह पहल परिवहन, लॉजिस्टिक्स तथा उपयोगिता अवसंरचना की समन्वित योजना को सक्षम बनाती है, जिसमें बहु-मोडल संपर्कता, अंतिम चरण (last-mile) कनेक्टिविटी तथा समयबद्ध कार्यान्वयन पर विशेष बल दिया जाता है।
  • बायोफार्मा शक्ति: पाँच वर्षों में ₹10,000 करोड़ के व्यय के साथ जैव-फार्मा विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र के निर्माण हेतु, जिसमें तीन नए NIPER संस्थान तथा 1,000 से अधिक मान्यता प्राप्त क्लिनिकल परीक्षण स्थलों का राष्ट्रीय नेटवर्क शामिल है।
  • राष्ट्रीय विनिर्माण मिशन(NMM): इसे केंद्रीय बजट 2025–26 में एक दीर्घकालिक रणनीतिक रूपरेखा के रूप में घोषित किया गया, जो नीति, कार्यान्वयन तथा शासन को एकीकृत दृष्टिकोण में समाहित करता है।
  •  सार्वजनिक व्यय (Public Expenditure): सरकार का पूंजीगत व्यय FY2014–15 में ₹2 लाख करोड़ से बढ़कर 2026–27 के बजट अनुमान में ₹12.2 लाख करोड़ तक पहुँच गया है।

Source: PIB

 

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