भारत में उर्वरक सब्सिडी: मूल्य सुधार और लक्षित किसान समर्थन की आवश्यकता

पाठ्यक्रम: कक्षा 3/अर्थव्यवस्था; कृषि

संदर्भ

  • भारत में हाल के वर्षों में उर्वरक सब्सिडी, विशेषकर यूरिया, ने पोषक तत्वों में असंतुलन, राजकोषीय दबाव और पर्यावरणीय क्षरण को उत्पन्न कर दिया है। इससे स्पष्ट होता है कि कृषि में सर्वोत्तम परिणामों के बजाय सब्सिडी की संरचना और वितरण प्रणाली में त्वरित सुधार की आवश्यकता है।

भारत में उर्वरक सब्सिडी की आवश्यकता

  • खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना: उर्वरक फसल उत्पादकता बढ़ाने के लिए आवश्यक हैं। सब्सिडी किसानों को सस्ती दरों पर उपलब्ध कराकर अधिक उत्पादन सुनिश्चित करती है।
    • हरित क्रांति में भूमिका: इसने खाद्यान्न में आत्मनिर्भरता हासिल करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
  • छोटे और सीमांत किसानों का समर्थन: भारत में 85% से अधिक किसान छोटे और सीमांत हैं। सब्सिडी इनकी लागत का भार कम करती है और खेती को व्यवहार्य बनाती है।
  • कृषि आय स्थिर करना: वैश्विक उर्वरक कीमतों में उतार-चढ़ाव से किसानों को बचाती है और लागत पूर्वानुमेय बनाती है।
  • कृषि विकास को बढ़ावा: आधुनिक इनपुट्स के उपयोग को प्रोत्साहित करती है, जिससे उत्पादकता और कृषि GDP में वृद्धि होती है।
  • बाज़ार विफलताओं का समाधान: उर्वरक बाज़ार मूल्य अस्थिरता और आपूर्ति बाधाओं से प्रभावित होते हैं।
    • सरकारी सब्सिडी उपलब्धता एवं वहनीयता सुनिश्चित करती है।
  • गरीबी उन्मूलन और ग्रामीण कल्याण: कम लागत से किसानों की शुद्ध आय बढ़ती है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को समर्थन मिलता है।
  • राष्ट्रीय स्थिरता के लिए सामरिक महत्व: खाद्य सुरक्षा आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक स्थिरता से जुड़ी है।
    • उर्वरक सब्सिडी अप्रत्यक्ष रूप से राष्ट्रीय खाद्य प्रणाली को समर्थन देती है।

भारत में उर्वरक सब्सिडी की मुख्य समस्याएँ

  • राजकोषीय भार और अस्थिरता: यह सरकारी व्यय का बड़ा हिस्सा है। वैश्विक कीमतें बढ़ने से सब्सिडी का भार बढ़ता है और सिंचाई व अनुसंधान जैसे उत्पादक निवेश प्रभावित होते हैं।
  • मूल्य विकृति (यूरिया पक्षपात): यूरिया पर भारी सब्सिडी और मूल्य नियंत्रण है, जबकि P एवं K उर्वरक NBS के अंतर्गत आते हैं। इससे नाइट्रोजन की कीमत कृत्रिम रूप से कम हो जाती है और किसानों की पसंद विकृत होती है।
  • असंतुलित उपयोग (NPK समस्या): आदर्श अनुपात 4:2:1 है, जबकि भारत में सस्ती यूरिया के कारण नाइट्रोजन का अत्यधिक उपयोग होता है। इससे मृदा की गुणवत्ता घटती है, उत्पादकता कम होती है और सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी होती है।
  • लीकेज, विचलन और भ्रष्टाचार: सब्सिडी वाले उर्वरक उद्योगों, काले बाज़ार और सीमा-पार तस्करी में चले जाते हैं।
  • अप्रभावी लक्ष्यीकरण और असमानता: सब्सिडी आय पर आधारित न होकर इनपुट पर आधारित है। बड़े किसान अधिक लाभ उठाते हैं, जबकि छोटे किसानों को अपेक्षाकृत कम लाभ मिलता है।
  • पर्यावरणीय क्षरण: नाइट्रोजन की अधिकता से मृदा  की सेहत खराब होती है, जल प्रदूषण (यूट्रोफिकेशन) होता है और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन (N₂O) बढ़ता है।

संबंधित सुधार एवं प्रयास

  • पोषक तत्व आधारित सब्सिडी (NBS) योजना, 2010: P और K उर्वरकों के लिए लागू। सब्सिडी को उत्पाद के बजाय पोषक तत्वों से जोड़ा गया।
  • उर्वरकों में प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT): किसानों को बिक्री के बाद कंपनियों को सब्सिडी भुगतान। PoS मशीन और आधार प्रमाणीकरण से सक्षम।
  • नीम-लेपित यूरिया (NCU): यूरिया पर अनिवार्य नीम तेल लेप।
    • औद्योगिक उपयोग में विचलन कम करता है।
    • नाइट्रोजन उपयोग दक्षता बढ़ाता है।
    • पोषक तत्वों का धीमा उत्सर्जन सुनिश्चित करता है।
  • मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना (2015): किसानों को मृदा की पोषक स्थिति और फसल-विशिष्ट उर्वरक अनुशंसा प्रदान करती है।
  • नई यूरिया नीति (2015): घरेलू उत्पादन अधिकतम करने, आयात निर्भरता घटाने और ऊर्जा दक्षता बढ़ाने पर केंद्रित।
  • नैनो यूरिया एवं वैकल्पिक उर्वरक: IFFCO द्वारा तरल नैनो यूरिया का परिचय। पारंपरिक यूरिया की खपत घटाने एवं दक्षता बढ़ाने का लक्ष्य।
  • डिजिटल कृषि पहल (AgriStack): किसानों का डिजिटल डेटाबेस तैयार करना। बेहतर लक्ष्यीकरण और निगरानी में सहायक।
  • परिवहन सब्सिडी एवं मूल्य नियंत्रण तंत्र: सरकार परिवहन लागत वहन करती है ताकि पूरे भारत में उर्वरक की कीमतें समान रहें।

आवश्यक सुधार: मूल्य सुधार एवं लक्षित किसान समर्थन

  • मूल्य सुधार की आवश्यकता
    • यूरिया को पोषक तत्व आधारित सब्सिडी (NBS) में लाना: नाइट्रोजन की कीमत को P एवं K उर्वरकों के साथ संरेखित करना और कृत्रिम मूल्य विकृति को समाप्त करना।
    • यूरिया मूल्य का क्रमिक नियंत्रणमुक्तिकरण: अचानक आघातों से बचने हेतु चरणबद्ध मूल्य वृद्धि अपनाना और राजनीतिक व्यवहार्यता बनाए रखना।
    • घरेलू कीमतों को वैश्विक कीमतों से संरेखित करना: लीकेज और तस्करी जैसी अवसरवादी गतिविधियों को कम करना तथा उर्वरक बाज़ार की दक्षता सुधारना।
    • DAP और जटिल उर्वरकों पर सब्सिडी का तर्कसंगतिकरण: विशिष्ट पोषक तत्वों पर अत्यधिक सब्सिडी से बचना और संतुलित पोषक तत्व उपयोग को बढ़ावा देना।
  • लक्षित किसान समर्थन (आय-आधारित दृष्टिकोण)
    • इनपुट सब्सिडी से प्रत्यक्ष आय समर्थन की ओर बदलाव: उर्वरक सब्सिडी को प्रति-एकड़ हस्तांतरण और प्रति-किसान आय समर्थन (जैसे PM-KISAN विस्तार) से प्रतिस्थापित करना।
    • सब्सिडी को भूमि स्वामित्व / फसल क्षेत्र से जोड़ना: सार्वभौमिक मूल्य सब्सिडी की तुलना में बेहतर लक्ष्यीकरण; बड़े किसानों को असमान लाभ कम करना।
    • मृदा स्वास्थ्य डेटा को सब्सिडी से जोड़ना: संतुलित उर्वरक उपयोग और फसल-विशिष्ट पोषक तत्व अनुप्रयोग हेतु प्रोत्साहन देना।
    • सतत प्रथाओं हेतु सशर्त समर्थन: जैविक इनपुट्स / नैनो उर्वरक और प्रिसीजन फार्मिंग को प्रोत्साहित करना; भुगतान को परिणामों (मृदा स्वास्थ्य, दक्षता) से जोड़ना।
    • डिजिटल लक्ष्यीकरण को सुदृढ़ करना (AgriStack + DBT 2.0): भूमि अभिलेख और फसल डेटा का उपयोग कर लाभार्थियों की सटीक पहचान सुनिश्चित करना।

निष्कर्ष

  • भारत की उर्वरक सब्सिडी समस्या मूलतः मूल्य निर्धारण और नीतिगत संरचना का मुद्दा है, न कि केवल अस्थायी राजकोषीय आघात।
  • यद्यपि सब्सिडी ने खाद्य सुरक्षा को समर्थन दिया है, इसकी वर्तमान संरचना ने पोषक तत्वों के असंतुलित उपयोग, अक्षमता और बढ़ते राजकोषीय बोझ को जन्म दिया है।
  • सतत सुधार हेतु इनपुट-आधारित सब्सिडी से आय और परिणाम-आधारित समर्थन की ओर बदलाव आवश्यक है, जिससे कृषि उत्पादकता एवं राजकोषीय विवेक दोनों सुनिश्चित हो सकें।
दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न
प्रश्न: भारत में उर्वरकों के मूल्य सुधार की आवश्यकता का परीक्षण कीजिए और चर्चा कीजिए कि लक्षित किसान समर्थन किस प्रकार राजकोषीय स्थिरता एवं कृषि उत्पादकता दोनों सुनिश्चित कर सकता है।

स्रोत: BS

 

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