पाठ्यक्रम: GS1/सामाजिक मुद्दे
संदर्भ
- हाल ही में ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकाnरों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026 राज्यसभा द्वारा पारित किया गया (इससे पूर्व लोकसभा द्वारा पारित), जिसका उद्देश्य ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 में संशोधन करना है। यह अधिनियम लिंग, लैंगिक पहचान और इंटरसेक्स विविधताओं के बीच वैचारिक भ्रम तथा कमजोर क्रियान्वयन तंत्र से ग्रस्त है।
2026 संशोधन की प्रमुख प्रावधान
- संकीर्ण परिभाषा: ‘ट्रांसजेंडर व्यक्ति’ की परिभाषा को केवल सामाजिक-सांस्कृतिक पहचानों (हिजड़ा, किन्नर, अरवानी आदि), इंटरसेक्स विविधताओं तथा जबरन परिवर्तित व्यक्तियों (नपुंसकता, अंग-भंग आदि) तक सीमित किया गया है।
- इसमें जेंडर-फ्लुइड पहचान, गैर-हेटेरोनॉर्मेटिव लैंगिक अभिव्यक्तियाँ तथा यौन अभिविन्यास विविधता को बाहर रखा गया है।
- स्व-पहचान का निष्कासन: ‘स्व-धारित लैंगिक पहचान’ (धारा 4(2)) को हटाकर मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) की अध्यक्षता वाले मेडिकल बोर्ड से प्रमाणन अनिवार्य किया गया है।
- बढ़ी हुई चिकित्सकीय निगरानी: ट्रांसजेंडर शल्यक्रियाओं की अनिवार्य रिपोर्टिंग जिला मजिस्ट्रेट और चिकित्सकीय प्राधिकरण को करनी होगी।
- दंडात्मक प्रावधान: जबरन ट्रांसजेंडर प्रस्तुति और शोषण के लिए 5–14 वर्ष का कारावास।
विधेयक की संरचनात्मक समस्याएँ
- लिंग, लैंगिक पहचान और इंटरसेक्स का मिश्रण: विधेयक अब भी लिंग (पुरुष/महिला) को लैंगिक पहचान मानता है तथा इंटरसेक्स व्यक्तियों को ट्रांसजेंडर श्रेणी में सम्मिलित करता है।
- यह मिश्रण अनुच्छेद 21 (गोपनीयता, शारीरिक अखंडता) का उल्लंघन करता है और विशिष्ट स्वास्थ्य एवं कानूनी आवश्यकताओं की अनदेखी करता है।
- अंतरराष्ट्रीय मानकों का उल्लंघन: WHO और UN इंटरसेक्स को जन्मजात जैविक विविधता मानते हैं और पृथक सुरक्षा उपायों की आवश्यकता बताते हैं। भारत का दृष्टिकोण वैश्विक मानवाधिकार मानकों के विपरीत है।
- विश्वसनीय आँकड़ों का अभाव: ट्रांसजेंडर और इंटरसेक्स जनसंख्या पर कोई ठोस राष्ट्रीय आँकड़े उपलब्ध नहीं हैं।
- डेटा रहित नीति बहिष्करण और अदृश्यता को जन्म देती है।
- पहचान का चिकित्साकरण: स्व-पहचान से हटकर राज्य-नियंत्रित चिकित्सकीय प्रमाणन की ओर झुकाव।
- इसे स्वायत्तता के उल्लंघन और गेटकीपिंग की पुनःस्थापना के रूप में आलोचना मिली है।
- गैर-सहमति शल्यक्रियाओं पर प्रतिबंध का अभाव: शिशुओं पर ‘सामान्यीकरण’ शल्यक्रियाओं पर रोक नहीं है।
- इंटरसेक्स शल्यक्रियाएँ आजीवन आघात और अधिकार उल्लंघन से जुड़ी हैं।
- अलग कानूनी ढाँचे का अभाव: इंटरसेक्स व्यक्तियों के लिए अलग विधेयक की दीर्घकालिक माँग की अनदेखी।
- परिणामस्वरूप इंटरसेक्स व्यक्ति कानूनी रूप से अदृश्य बने रहते हैं।
संस्थागत एवं प्रशासनिक मुद्दे
- पुराना संस्थागत ढाँचा: राष्ट्रीय ट्रांसजेंडर व्यक्तियों परिषद को यथावत रखा गया है; जबकि GIESC (लिंग पहचान/अभिव्यक्ति और लैंगिक विशेषताएं) ढाँचे का प्रस्ताव नज़रअंदाज़ किया गया।
- वर्तमान ढाँचा वैज्ञानिक रूप से गलत और बहिष्कारी है।
- गोपनीयता संबंधी चिंताएँ: शल्यक्रियाओं की अनिवार्य रिपोर्टिंग; और सुदृढ़ डेटा संरक्षण उपायों का अभाव।
शोषण और सामाजिक संरचनाएँ
- आंशिक अपराधीकरण: बाहरी दबाव को दंडित करता है; लेकिन आंतरिक शोषणकारी प्रणालियों को नियंत्रित नहीं करता।
- उदाहरण: हिजड़ा जमात-घराना संरचनाएँ।
- बाल संरक्षण की कमी: लापता बच्चों और जेंडर-नॉनकन्फ़ॉर्मिंग नाबालिगों की तस्करी पर कोई ढाँचा नहीं।
- अंतरविभागीयता का अभाव: जाति (SC/ST), विकलांगता, गरीबी और धर्म से संबंधित प्रावधानों का अभाव।
- इससे बहुस्तरीय भेदभाव होता है, जिसका कोई समाधान नहीं।
- नागरिक अधिकारों का अभाव: विवाह, गोद लेना, उत्तराधिकार, तलाक और संपत्ति हस्तांतरण पर विधेयक मौन है।
- यह संविधान के अंतर्गत पूर्ण नागरिकता और गरिमा के विपरीत है।
संवैधानिक और नैतिक चिंताएँ
- संवैधानिक प्रावधानों के विपरीत: समानता (अनुच्छेद 14), अभिव्यक्ति (अनुच्छेद 19), तथा जीवन एवं गरिमा (अनुच्छेद 21) का उल्लंघन।
- NALSA निर्णय (2014) के विपरीत: NALSA ने स्व-पहचानी गई लैंगिक पहचान के अधिकार को मान्यता दी थी।
- संशोधन इस सिद्धांत को निरस्त करता है।
आगे की राह
- कानूनी सुधार: ट्रांसजेंडर और इंटरसेक्स व्यक्तियों के लिए अलग-अलग कानून; स्व-पहचान सिद्धांत की पुनःस्थापना।
- वैज्ञानिक वर्गीकरण: लिंग, लैंगिक पहचान और यौन अभिविन्यास को अलग-अलग परिभाषित करना।
- हानिकारक प्रथाओं पर प्रतिबंध: गैर-सहमति इंटरसेक्स शल्यक्रियाओं पर रोक।
- संस्थागत सुधार: GIESC आधारित ढाँचे की ओर बदलाव।
- सामाजिक संरक्षण: शोषणकारी प्रणालियों का नियमन; और जेंडर-नॉनकन्फ़ॉर्मिंग बच्चों की सुरक्षा।
- नागरिक अधिकारों का समावेश: पारिवारिक कानून अधिकारों का विस्तार।
निष्कर्ष
- ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026 प्रशासनिक सख़्ती का प्रयास करता है, किंतु मूलभूत खामियों को दूर करने में विफल रहता है।
- यह रेखांकित करता है कि अधिकार-आधारित, साक्ष्य-प्रेरित और भेद-संवेदनशील ढाँचे ही सार्थक समावेशन के लिए आवश्यक हैं। अन्यथा, यह बहिष्करण को समाप्त करने के बजाय उसे और सुदृढ़ करने का जोखिम उत्पन्न करता है, जब तक कि जैविक लिंग, लैंगिक पहचान एवं इंटरसेक्स विविधताओं को अलग-अलग न किया जाए।
| मुख्य परीक्षा दैनिक अभ्यास प्रश्न [प्रश्न] ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026 की प्रमुख कमियों की विवेचना कीजिए। एक अधिक अधिकार-आधारित एवं अंतर्विभाजित (intersectional) कानूनी ढाँचे को सुनिश्चित करने हेतु उपाय सुझाइए। |
स्रोत: TH
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