“क्या भारतीय परिप्रेक्ष्य में अनिवार्य मतदान (Compulsory Voting) व्यवहार्य है?”

पाठ्यक्रम: GS2/राजव्यवस्था और शासन

संदर्भ

  • हाल ही में भारत के प्रधान न्यायाधीश ने यह टिप्पणी की कि भारत को मतदाता भागीदारी बढ़ाने और लोकतांत्रिक सहभागिता को सुदृढ़ करने हेतु अनिवार्य मतदान की व्यवस्था पर विचार करना चाहिए।

भारत में मतदान का अधिकार

  • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 326 यह प्रावधान करता है कि प्रत्येक भारतीय नागरिक, जिसकी आयु 18 वर्ष या उससे अधिक है, उसे लोकसभा तथा राज्य विधानसभाओं के चुनावों में वयस्क मताधिकार के आधार पर मतदाता के रूप में पंजीकृत होने का अधिकार है।
  • हालाँकि, मतदान एक वैधानिक अधिकार है, मौलिक अधिकार नहीं (जैसा कि सर्वोच्च न्यायालय ने विभिन्न निर्णयों में स्पष्ट किया है)।

अनिवार्य मतदान क्या है?

  • अनिवार्य मतदान के अंतर्गत नागरिकों को चुनावों में भाग लेना अनिवार्य होता है, अन्यथा उन पर दंड लगाया जा सकता है।
  • यह व्यवस्था 20 से अधिक देशों में लागू है, जैसे:
    • ऑस्ट्रेलिया: मतदान न करने पर जुर्माना; 1924 से मतदाता उपस्थिति लगातार 90% से अधिक।
    • बेल्जियम: सबसे पुरानी प्रणाली (1893); उपस्थिति प्रायः 85–90%।
    • ब्राज़ील: 18–70 आयु वर्ग के लिए अनिवार्य।
  • भारतीय अनुभव: गुजरात ने 2009 में गुजरात स्थानीय प्राधिकरण कानून (संशोधन) अधिनियम के माध्यम से स्थानीय निकायों में अनिवार्य मतदान लागू करने वाला प्रथम राज्य बना; किंतु गुजरात उच्च न्यायालय ने कानूनी चिंताओं को देखते हुए इसके क्रियान्वयन पर रोक लगा दी।

अनिवार्य मतदान के पक्ष में तर्क

  • मतदाता उपस्थिति में सुधार: भारत के विधि आयोग (255वीं रिपोर्ट, 2015) ने देखा कि अनिवार्य मतदान से औसतन 7% तक उपस्थिति बढ़ सकती है।
  • लोकतांत्रिक वैधता में वृद्धि: इससे सरकारें केवल अल्पसंख्यक मतदाताओं के आधार पर निर्वाचित नहीं होंगी।
  • नागरिक कर्तव्य को बढ़ावा: नागरिकों को मतदान को लोकतांत्रिक जिम्मेदारी मानने हेतु प्रेरित करता है।
  • धनबल में कमी: अधिक और समान रूप से उच्च मतदान से महंगे प्रचार अभियानों पर निर्भरता घटती है, जिससे चुनावों में धन का प्रभाव कम होता है।

अनिवार्य मतदान के विरुद्ध तर्क

  • मौलिक स्वतंत्रता का उल्लंघन: मतदान के लिए बाध्य करना अनुच्छेद 19(1)(a) (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, जिसमें मतदान न करने का अधिकार भी शामिल है) का उल्लंघन हो सकता है।
  • भारत में व्यावहारिक चुनौतियाँ: विशाल मतदाता संख्या (~96+ करोड़), आंतरिक प्रवासन और व्यवस्थागत कठिनाइयों के कारण अनिवार्य मतदान लागू करना कठिन है।
  • यादृच्छिक/अमान्य मतदान का जोखिम: अनिच्छुक मतदाता केवल अनुपालन हेतु मनमाने ढंग से मतदान कर सकते हैं, जिससे चुनाव परिणाम विकृत हो सकते हैं।
  • कठोर दंड अनुपयुक्त: सेवाओं से वंचित करना (जैसे पेरू में) या जुर्माना भारतीय सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों में अनुपयुक्त हो सकता है।

विशेषज्ञ एवं समिति विचार

  • डॉ. बी. आर. अम्बेडकर ने 1951 में जन प्रतिनिधित्व विधेयक पर परिचर्चा के दौरान अनिवार्य मतदान के विचार को अस्वीकार किया।
  • दिनेश गोस्वामी समिति ने क्रियान्वयन संबंधी कठिनाइयों का उदाहरण देते हुए अनिवार्य मतदान का विरोध किया।
  • भारत का विधि आयोग (255वीं रिपोर्ट): यह केवल कठोर दंड के साथ प्रभावी हो सकता है, अतः भारत के लिए उपयुक्त नहीं।

आगे की राह

  • जागरूकता सुदृढ़ करना: निर्वाचन आयोग की SVEEP (व्यवस्थित मतदाता शिक्षा और चुनावी भागीदारी) पहल के माध्यम से मतदाता शिक्षा का विस्तार।
  • सुलभता में सुधार: बेहतर परिवहन, अधिक मतदान केंद्र और सुविधाजनक मतदान अवकाश सुनिश्चित करना।
  • प्रवासी मतदाताओं को सक्षम बनाना: आंतरिक प्रवासियों के लिए दूरस्थ मतदान समाधान का विस्तार।
  • प्रौद्योगिकी का उपयोग: सुरक्षित डिजिटल साधनों का प्रयोग कर व्यापक एवं सुरक्षित भागीदारी सुनिश्चित करना।
  • शहरी मतदान दर बढ़ाना: कम भागीदारी वाले शहरी क्षेत्रों में विशेष अभियान चलाना।

निष्कर्ष

  • यद्यपि अनिवार्य मतदान से भागीदारी बढ़ सकती है, किंतु संवैधानिक, प्रशासनिक और सामाजिक-आर्थिक सीमाओं के कारण यह भारत में न तो व्यावहारिक है तथा न ही वांछनीय।
  • भारत में ध्यान स्वैच्छिक भागीदारी को प्रोत्साहित करने और लोकतांत्रिक जागरूकता को सुदृढ़ करने पर होना चाहिए, न कि बाध्यकारी उपायों के माध्यम से सहभागिता थोपने पर।

स्रोत: TH

 

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