पाठ्यक्रम: GS2/ शासन
संदर्भ
- भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने कारागारों की अमानवीय परिस्थितियों पर स्वतः संज्ञान लेते हुए सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को कारागार की स्थिति संबंधी अद्यतन एवं व्यापक आँकड़े प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है।
- संविधान की सातवीं अनुसूची की सूची-II के प्रविष्टि 4 के अनुसार “कारागार/वहाँ निरुद्ध व्यक्ति” राज्य सूची का विषय है।
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए निर्देश
- न्यायालय ने राज्यों को भीड़भाड़ की समस्या से निपटने हेतु वर्तमान एवं प्रस्तावित उपायों का विवरण प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है।
- न्यायालय ने कारागारों में निरुद्ध माताओं के साथ रहने वाले बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और कल्याण सुनिश्चित करने पर बल दिया है।
- राज्यों को स्वीकृत पदों की संख्या, रिक्तियों तथा भर्ती के लिए उठाए गए कदमों का विवरण देने का निर्देश दिया गया है।
भारतीय कारागारों की विद्यमान समस्याएँ
- भीड़भाड़: राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की प्रिजन स्टैटिस्टिक्स इंडिया 2023 रिपोर्ट के अनुसार भारत के कारागार औसतन 120.8% की अधिभोग दर पर संचालित हुए।
- अंडरट्रायल संकट: विचाराधीन कैदियों की उच्च संख्या जाँच एवं न्यायिक प्रक्रिया में विलंब को दर्शाती है, जो न्याय के सिद्धांत को कमजोर करती है।
- दुर्बल अधोसंरचना एवं स्वच्छता: अनेक कारागारों में अपर्याप्त वेंटिलेशन, स्वच्छता और स्वास्थ्य सेवाओं की कमी है। ऐसी परिस्थितियाँ अंतर्राष्ट्रीय मानकों पर खरी नहीं उतरतीं और प्रत्यर्पण अस्वीकार करने का आधार बनती हैं।
- वर्गीकरण का अभाव: आर्थिक अपराधियों, विदेशी नागरिकों या उच्च जोखिम वाले भगोड़ों हेतु पृथक निरोध केंद्रों की व्यवस्था नहीं है।
- राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) की रिपोर्टों में हिरासत में हिंसा, चिकित्सा सुविधा में विलंब और सीमित कानूनी पहुँच जैसी समस्याओं को रेखांकित किया गया है, जो अंतर्राष्ट्रीय न्यायालयों में भारत की स्थिति को कमजोर करती हैं।
कारागार सुधार समितियाँ
- ए. एन. मुल्ला समिति (1980–83): विचाराधीन कैदियों को दोषसिद्ध कैदियों से पृथक रखने तथा कारागार की स्थिति, पोषण और स्वच्छता में सुधार की अनुशंसा की।
- न्यायमूर्ति अमिताभ रॉय समिति: कारागारों में भीड़ कम करने, शीघ्र न्यायिक प्रक्रिया एवं कानूनी सहायता सुधार तथा कारागार प्रबंधन में तकनीक के उपयोग की अनुशंसा की।
- कृष्ण अय्यर समिति: महिलाओं के लिए पृथक कारागार सुविधाओं का समर्थन किया ताकि शोषण रोका जा सके।
न्यायिक हस्तक्षेप
- हुसैनारा खातून बनाम बिहार राज्य: सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि शीघ्र न्याय पाने का अधिकार अनुच्छेद 21 के अंतर्गत मौलिक अधिकार है।
- राजस्थान राज्य बनाम बलचंद: सर्वोच्च न्यायालय ने “जमानत नियम है और जेल अपवाद” का सिद्धांत स्थापित किया, जिससे अनुच्छेद 21 के अंतर्गत व्यक्तिगत स्वतंत्रता को बल मिला।
कारागार सुधार हेतु उठाए गए कदम
- राज्य विधिक सेवा प्राधिकरणों ने कारागारों में विधिक सेवा क्लीनिक स्थापित किए हैं, जो जरूरतमंदों को निःशुल्क कानूनी सहायता प्रदान करते हैं।
- गृह मंत्रालय ने वर्ष 2023 में मॉडल प्रिज़न्स एंड करेक्शनल सर्विसेज़ एक्ट तैयार किया।
- इस मॉडल अधिनियम में सुधार, पुनर्वास एवं कैदियों के समाज में पुनः एकीकरण के प्रावधान हैं।
- इसमें ‘कैदियों के कल्याण कार्यक्रम’ तथा ‘आफ्टर-केयर एवं पुनर्वास सेवाएँ’ संस्थागत देखभाल का अभिन्न अंग बनाए गए हैं।
आगे की राह
- प्रौद्योगिकी एकीकरण: बेहतर अभिलेख-रखरखाव, निगरानी और पारदर्शिता हेतु डिजिटल कारागार प्रबंधन प्रणाली लागू की जानी चाहिए।
- न्यायालयीय सुनवाई में विलंब कम करने हेतु वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग का विस्तार किया जाना चाहिए।
- सामाजिक पुनःएकीकरण: कारागार प्रणाली को व्यावसायिक प्रशिक्षण एवं कौशल विकास कार्यक्रमों को प्राथमिकता देनी चाहिए ताकि कैदियों की रिहाई के बाद उनकी रोजगार क्षमता बढ़े।
- कानूनी सहायता सुदृढ़ीकरण: विशेषकर विचाराधीन कैदियों और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए समयबद्ध एवं प्रभावी प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने हेतु विधिक सहायता तंत्र को सुदृढ़ किया जाना चाहिए।
स्रोत: TH
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संक्षिप्त समाचार 20-03-2026