पाठ्यक्रम: GS3/ अर्थव्यवस्था
संदर्भ
- केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि भारत की जैव-अर्थव्यवस्था में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जो 2014 में लगभग 10 अरब अमेरिकी डॉलर से बढ़कर 2025 में 195 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक हो गई है। यह भारत के तीव्र गति से उभरते वैश्विक जैव-प्रौद्योगिकी केंद्र के रूप में महत्व को रेखांकित करता है।
जैव-अर्थव्यवस्था क्या है?
- जैव-अर्थव्यवस्था एक ज्ञान-आधारित उत्पादन प्रणाली है, जिसमें जैविक संसाधनों का उपयोग करके उत्पाद, प्रक्रियाएँ और सेवाएँ सभी आर्थिक क्षेत्रों में एक सतत आर्थिक ढाँचे के अंतर्गत प्रदान की जाती हैं।
- यह कृषि, वानिकी, मत्स्य, खाद्य उत्पादन, जैव-प्रौद्योगिकी और जैव-ऊर्जा जैसे क्षेत्रों को समाहित करती है।
- भारत में जैव-अर्थव्यवस्था के उप-क्षेत्र :
- बायोफार्मा/बायोमेडिकल : औषधियों, चिकित्सा उपकरणों और प्रयोगशाला में विकसित अंगों जैसे चिकित्सा उत्पादों एवं सेवाओं का विकास और उत्पादन।
- बायोएग्री : आनुवंशिक रूप से संशोधित फसलें एवं पशु, सटीक कृषि तकनीकें और जैव-आधारित उत्पाद। उदाहरण: बीटी कपास।
- बायोइंडस्ट्रियल : एंजाइम, जैव-संश्लेषण मार्ग और पुनः संयोजित डीएनए तकनीक का उपयोग कर जैव-आधारित रसायन एवं उत्पादों का विकास और उत्पादन।
- भारत की जैव-अर्थव्यवस्था की विकास यात्रा: भारत की जैव-अर्थव्यवस्था ने एक दशक में लगभग 20 गुना विस्तार किया है, जो जैव-प्रौद्योगिकी क्षेत्र में सुदृढ़ संरचनात्मक वृद्धि को दर्शाता है।
- भारत एशिया-प्रशांत क्षेत्र में तीसरे और वैश्विक स्तर पर 12वें स्थान पर है।
- वर्तमान में यह भारत की जीडीपी में लगभग 5% का योगदान करती है।
- चार प्रमुख उप-क्षेत्र:
- बायोइंडस्ट्रियल – 47%
- बायोफार्मा – 35%
- बायोएग्री – 8%
- बायो रिसर्च – 9%

मुख्य सरकारी पहल
- बायोE3 नीति (BioE3 Policy): सतत जैव-निर्माण और जैव-आधारित उद्योगों को बढ़ावा।
- प्रमुख क्षेत्र: स्मार्ट प्रोटीन, सटीक उपचार, जलवायु-सहिष्णु कृषि।
- अनुसंधान, विकास एवं नवाचार (RDI) कोष: 1 लाख करोड़ रुपये का कोष, गहन-प्रौद्योगिकी नवाचार और स्टार्टअप्स को बढ़ावा देने हेतु।
- स्टार्टअप एवं इनक्यूबेशन समर्थन: भारत में जैव-प्रौद्योगिकी क्लस्टर और नवाचार केंद्रों को सुदृढ़ करना।
- समावेशी प्रतिभा विकास: द्वितीय एवं तृतीय श्रेणी के शहरों, महिला उद्यमियों और युवा शोधकर्ताओं पर विशेष ध्यान।
भारत की जैव-अर्थव्यवस्था की चुनौतियाँ
- वैश्विक प्रतिस्पर्धा : भारत की जैव-अर्थव्यवस्था को अमेरिका, यूरोपीय संघ और चीन जैसे देशों की अधिक विकसित जैव-अर्थव्यवस्थाओं से सख्त प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है, जिनके पास उन्नत अवसंरचना, वित्तीय संसाधन और अनुसंधान एवं विकास क्षमताएँ उपलब्ध हैं।
- बौद्धिक संपदा संरक्षण :जैव-प्रौद्योगिकी क्षेत्र में बौद्धिक संपदा की सुरक्षा चुनौतीपूर्ण है, जिससे नवाचार चोरी की आशंका और अनुसंधान के लिए प्रोत्साहन की कमी उत्पन्न होती है।
- अवसंरचना की कमी : जैव-प्रौद्योगिकी नवाचारों के अनुसंधान, विकास और व्यावसायीकरण हेतु पर्याप्त अवसंरचना का अभाव है।
- ब्रेन ड्रेन : प्रतिभाशाली वैज्ञानिक और शोधकर्ता बेहतर अवसरों की तलाश में विदेश चले जाते हैं, जिससे भारत की नवाचार क्षमता में कमी आती है।
आगे की राह
- नियामक ढाँचे को सुदृढ़ करना: अनुमोदन प्रक्रियाओं का सरलीकरण, जैव-सुरक्षा और नैतिक अनुपालन सुनिश्चित करना।
- गहन-प्रौद्योगिकी वित्तपोषण का विस्तार: उच्च जोखिम एवं उच्च लाभ वाले नवाचारों हेतु RDI कोष का प्रभावी उपयोग।
- वैश्विक एकीकरण का विस्तार: भारत को जैव-निर्माण और जैव-निर्यात का वैश्विक केंद्र बनाना।
- क्षमता निर्माण: उन्नत कौशल विकास में निवेश, विशेषकर सिंथेटिक बायोलॉजी और बायोइन्फ़ॉर्मेटिक्स जैसी अग्रणी तकनीकों में।
स्रोत: DD News
Previous article
भारत का ड्रोन निर्माण में आत्मनिर्भरता हेतु प्रयास
Next article
भारत का खेल उपकरण निर्माण क्षेत्र