राजकोषीय शासन के प्रहरी के रूप में संसदीय समितियाँ

पाठ्यक्रम: GS2/ राजव्यवस्था और शासन

संदर्भ

  • वित्त पर संसदीय स्थायी समिति की एक रिपोर्ट ने योजना मंत्रालय और नीति आयोग की आलोचना की है कि उन्होंने निधियों का अपर्याप्त उपयोग किया तथा वित्तीय प्रबंधन में कमी दिखाई। वित्त वर्ष 2024 और 2025 में व्यय 36% से भी कम रहा।

संसदीय स्थायी समितियाँ क्या हैं?

  • संसदीय स्थायी समितियाँ (PSCs) संसद की स्थायी समितियाँ होती हैं, जिन्हें कार्यपालिका की कार्यप्रणाली की जाँच, समीक्षा और निगरानी के लिए गठित किया जाता है।
  • ये समितियाँ वर्षभर कार्य करती हैं, जबकि अस्थायी समितियाँ केवल सीमित अवधि के लिए गठित की जाती हैं।
  • संसदीय स्थायी समितियों के प्रकार:
  • विभाग-संबंधी स्थायी समितियाँ (DRSCs): मंत्रालयों की अनुदान माँगों, उनके पास भेजे गए विधेयकों और नीतिगत मुद्दों की समीक्षा करती हैं। उदाहरण: वित्त पर संसदीय स्थायी समिति।
  • वित्तीय समितियाँ: लोक लेखा समिति (PAC), अनुमान समिति और लोक उपक्रम समिति।
  • अन्य स्थायी समितियाँ: व्यवसाय सलाहकार समिति, विशेषाधिकार समिति और नियम समिति।

संसदीय स्थायी समितियों की भूमिका

  • संसद से परे विस्तृत वित्तीय समीक्षा: संसदीय परिचर्चाओं में बजटीय प्रावधानों की विस्तृत जाँच के लिए पर्याप्त समय नहीं होता।
    • स्थायी समितियाँ अनुदान माँगों, व्यय प्रवृत्तियों और उपयोग पैटर्न की सूक्ष्म समीक्षा करती हैं।
  • प्रमाण-आधारित और गैर-पक्षपातपूर्ण निगरानी: समितियाँ विशेषज्ञों के सुझाव और आँकड़ों पर आधारित विश्लेषण करती हैं। उनकी रिपोर्टें नीतियों के क्रियान्वयन एवं राजकोषीय अनुशासन का वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन प्रस्तुत करती हैं।
  • कार्यपालिका की कार्यप्रणाली की निगरानी: समितियाँ वर्षभर कार्य करती हैं और मंत्रालयों व विभागों पर निरंतर निगरानी रखती हैं। इससे शासन में पारदर्शिता एवं जवाबदेही बढ़ती है।

भारत में बजटीय पूर्वानुमान और उपयोग की चुनौतियाँ

  • अवास्तविक और बढ़ा-चढ़ाकर किए गए बजटीय पूर्वानुमान: मंत्रालय प्रायः अपनी क्रियान्वयन क्षमता का यथार्थ मूल्यांकन किए बिना व्यय आवश्यकताओं का अनुमान प्रस्तुत करते हैं।
  • निधियों का अपर्याप्त उपयोग: बजट अनुमान (BE) और वास्तविक व्यय (AE) के बीच बड़ा अंतर होता है। निधियों का कम उपयोग सार्वजनिक संसाधनों को निष्क्रिय कर देता है और विकासात्मक परिणामों में विलंब करता है।
  • परिणाम-उन्मुखता के बिना क्रमिक बजटिंग: बजट आवंटन प्रतिवर्ष बढ़ते रहते हैं, किंतु उन्हें पूर्व प्रदर्शन या परिणामों से नहीं जोड़ा जाता। यह इनपुट-आधारित बजटिंग की प्रधानता को दर्शाता है।
  • राजकोषीय अनुशासनहीनता: मंत्रालय अंतिम तिमाही में अत्यधिक व्यय करते हैं ताकि आवंटित निधियों का उपयोग हो सके। ऐसा व्यय त्रैमासिक व्यय योजना (QEP) मानकों और वित्तीय विवेक के सिद्धांतों का उल्लंघन करता है।

आगे की राह

  • संसदीय समिति के अवलोकन कार्यपालिका की जवाबदेही और राजकोषीय अनुशासन सुनिश्चित करने में उसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका को पुनः स्थापित करते हैं।
  • शासन परिणामों में सुधार और भारत के राजकोषीय ढाँचे की विश्वसनीयता पुनर्स्थापित करने के लिए परिणाम-आधारित बजटिंग को सुदृढ़ करना, QEP मानकों का पालन करना और नीति व वित्त का एकीकरण आवश्यक है।

स्रोत: TH

 

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