पाठ्यक्रम :GS3/अर्थव्यवस्था
संदर्भ
- उद्योग के अनुमानों के अनुसार, भारत सेमीकंडक्टर डिज़ाइन और अनुसंधान एवं विकास (R&D) के लिए एक वैश्विक केंद्र के रूप में उभरा है।
सेमीकंडक्टर
- इन्हें चिप्स या इंटीग्रेटेड सर्किट्स भी कहा जाता है, जो मुख्यतः सिलिकॉन से बने सूक्ष्म इलेक्ट्रॉनिक परिपथ होते हैं।
- इनमें लाखों या अरबों घटक जैसे ट्रांजिस्टर, डायोड, कैपेसिटर और रेज़िस्टर सम्मिलित होते हैं, जो मिलकर विद्युत संकेतों को संसाधित और नियंत्रित करते हैं।
- ये आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के लिए अत्यावश्यक हैं और संचार, कंप्यूटिंग, स्वास्थ्य सेवा, परिवहन, रक्षा तथा स्वच्छ ऊर्जा जैसी तकनीकों को सक्षम बनाते हैं।
सेमीकंडक्टर का महत्व
- डिजिटल अर्थव्यवस्था: स्मार्टफोन, कंप्यूटर और संचार नेटवर्क जैसे उपकरणों को शक्ति प्रदान करते हैं, जिससे डिजिटल अर्थव्यवस्था के लिए अनिवार्य बनते हैं।
- रणनीतिक महत्व: विश्वसनीय सेमीकंडक्टर आपूर्ति श्रृंखलाएँ महत्वपूर्ण अवसंरचना, रक्षा प्रणालियों और साइबर सुरक्षा के लिए आवश्यक हैं।
- उभरती प्रौद्योगिकियाँ: कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), 5G, इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT), विद्युत वाहन और क्वांटम कंप्यूटिंग जैसी तकनीकें सेमीकंडक्टर चिप्स पर अत्यधिक निर्भर हैं।
- आर्थिक एवं औद्योगिक वृद्धि: वैश्विक सेमीकंडक्टर बाज़ार 2030 तक 1 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुँचने की संभावना है, जिसमें भारत का बाज़ार महत्वपूर्ण हिस्सेदारी रखेगा।
भारत में सेमीकंडक्टर निर्माण की चुनौतियाँ
- सेमीकंडक्टर निर्माण हेतु अनुसंधान एवं विकास तथा अवसंरचना में अत्यधिक निवेश की आवश्यकता होती है, जिससे प्रवेश बाधाएँ ऊँची हो जाती हैं।
- वैश्विक चिप उद्योग कुछ देशों और कंपनियों द्वारा नियंत्रित है, जिससे उन्नत तकनीक तक पहुँच कठिन होती है।
- चिप उत्पादन में 500–1,500 चरण सम्मिलित होते हैं और विशेष सामग्रियाँ, शुद्ध जल तथा निर्बाध विद्युत आपूर्ति की आवश्यकता होती है।
- भारत में डिज़ाइन इंजीनियरों की संख्या अधिक है, किंतु फैब्रिकेशन प्लांट्स (fabs) के लिए कुशल श्रमिकों की कमी है।
- भारत में मौलिक अनुसंधान सीमित है।
- प्रमुख वैश्विक कंपनियाँ नीति स्थिरता, जटिल प्रशासन, उच्च शुल्क और अपर्याप्त अवसंरचना को लेकर चिंतित हैं।
- कौशल विकास और सेमीकंडक्टर नीति विभिन्न मंत्रालयों द्वारा संचालित होने से समन्वय की समस्या उत्पन्न होती है।
सरकार द्वारा उठाए गए कदम
- सरकार ने देश में सेमीकंडक्टर और डिस्प्ले निर्माण पारिस्थितिकी तंत्र के विकास हेतु सेमिकॉन इंडिया कार्यक्रम प्रारंभ किया।
- केंद्रीय बजट 2026-27 में भारत सेमीकंडक्टर मिशन 2.0 की घोषणा की गई, जिसमें उपकरण और सामग्री, पूर्ण डिज़ाइन स्टैक, भारतीय IP एवं आपूर्ति श्रृंखला को सुदृढ़ करने पर बल दिया गया।
- डिज़ाइन लिंक्ड इंसेंटिव (DLI) योजना सेमीकंडक्टर उत्पादों जैसे ICs, चिपसेट्स, SoCs, सिस्टम्स और IP कोर के डिज़ाइन, विकास और परिनियोजन को प्रोत्साहित करती है।
- वैश्विक क्षमता केंद्र(GCCs): भारत सेमीकंडक्टर क्षेत्र के विश्व के लगभग 7% GCCs की मेजबानी करता है और वैश्विक चिप डिज़ाइन कार्यबल का लगभग 20% रोजगार देता है।
- भारतीय इंजीनियर GCCs में 2 nm चिप्स सहित उन्नत सेमीकंडक्टर तकनीकों का डिज़ाइन और विकास कर रहे हैं।
- विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) दो पूरक पहलें लागू कर रहा है:
- अनुसंधान राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन (ANRF): शैक्षणिक अनुसंधान, उद्योग सहयोग और रूपांतरणीय अनुसंधान को समर्थन देता है। पाँच वर्षों में ₹50,000 करोड़ का प्रावधान।
- अनुसंधान, विकास और नवाचार (RDI) कोष: AI, क्वांटम कंप्यूटिंग, रोबोटिक्स और जैव प्रौद्योगिकी जैसी महत्वपूर्ण तकनीकों पर केंद्रित देर-चरणीय तकनीकी विकास और व्यावसायीकरण को समर्थन देता है।
- भारतीय नैनोइलेक्ट्रॉनिक्स उपयोगकर्ता कार्यक्रम (INUP): IISc बेंगलुरु और IITs में स्थापित नैनो-केन्द्रों का उपयोग कर सूक्ष्म एवं नैनोइलेक्ट्रॉनिक्स में अनुसंधान एवं विकास को समर्थन देता है।
निष्कर्ष एवं आगे की राह
- भारत का इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग तीव्र गति से विस्तार कर रहा है, जिसमें सेमीकंडक्टर प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं।
- भारत सेमीकंडक्टर मिशन, SEMICON भारत कार्यक्रम और iCET जैसी वैश्विक साझेदारियाँ आयात कम करने तथा घरेलू क्षमताएँ विकसित करने का लक्ष्य रखती हैं।
- सेमीकंडक्टर भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अत्यावश्यक हैं।
- यद्यपि अवसंरचना, तकनीक और प्रतिभा में चुनौतियाँ हैं, सरकारी पहलें एक सुदृढ़ घरेलू पारिस्थितिकी तंत्र बनाने का प्रयास कर रही हैं, जिससे भारत वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में एक प्रमुख खिलाड़ी बन सके।
स्रोत :PIB
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