फसल विविधीकरण के लिए सर्वोच्च न्यायालय का प्रोत्साहन

पाठ्यक्रम: GS3/कृषि

संदर्भ

  • हाल ही में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को अपनी कृषि नीति रूपरेखा पर पुनर्विचार करने और किसानों को गेहूँ एवं धान से हटकर विशेषकर उत्तर भारत में दलहन की खेती को प्रोत्साहित करने हेतु बेहतर प्रोत्साहन विकसित करने का निर्देश दिया।

न्यायालय द्वारा उजागर की गई समस्याएँ

  • पर्याप्त MSP प्रोत्साहन का अभाव: किसान प्रायः गेहूँ और धान को प्राथमिकता देते हैं क्योंकि इन फसलों की सरकारी खरीद सुदृढ़ है।
    • किंतु दलहन उत्पादकों को प्रभावी MSP समर्थन विरले ही मिलता है, जिससे दलहन की खेती का प्रोत्साहन घटता है।
    • MSP नीतियाँ ऐतिहासिक रूप से चावल और गेहूँ के पक्ष में रही हैं, जिससे दलहन एवं तिलहन की ओर विविधीकरण हतोत्साहित हुआ।
  • खरीद और बाज़ार पहुँच में अनिश्चितता: दलहन के लिए चावल और गेहूँ जैसी मजबूत, सुनिश्चित खरीद प्रणाली नहीं है, जहाँ FCI जैसी एजेंसियाँ अधिकांश उत्पादन MSP पर खरीदती हैं।
    • दलहन के लिए मूल्य समर्थन योजना(PSS) के अंतर्गत खरीद केवल आंशिक होती है, प्रमुख राज्यों जैसे महाराष्ट्र में प्रायः 30% से भी कम, जिससे अधिकांश किसान निजी व्यापारियों पर निर्भर रहते हैं।
  • आयात का घरेलू उत्पादकों पर प्रभाव: भारत पीली मटर जैसी दालों का आयात करता है ताकि कीमतें स्थिर रहें।
    • किंतु आयात घरेलू कीमतों को कम कर सकता है और किसानों को दलहन उगाने से हतोत्साहित करता है।
    • न्यायालय ने सुझाव दिया कि पीली मटर के आयात मूल्य को इस प्रकार तय किया जाए कि वह घरेलू उत्पादकों को हानि न पहुँचाए।

फसल विविधीकरण

  • फसल विविधीकरण का अर्थ है किसी क्षेत्र में केवल एक फसल या फसल पैटर्न पर निर्भर रहने के बजाय विभिन्न प्रकार की फसलों की खेती करना।
  • धान–गेहूँ प्रणाली से दलहन, तिलहन, मोटे अनाज, बागवानी और चारा फसलों की ओर स्थानांतरण।

फसल विविधीकरण क्यों आवश्यक है?

  • पर्यावरणीय स्थिरता: धान–गेहूँ प्रणाली ने भूजल क्षय, मृदा ह्रास और पराली जलाने जैसी समस्याएँ उत्पन्न की हैं।
    • दलहन कम जल की आवश्यकता रखते हैं और नाइट्रोजन स्थिरीकरण के माध्यम से मृदा उर्वरता बढ़ाते हैं, जिससे वे पर्यावरणीय दृष्टि से लाभकारी हैं।
  • पोषण सुरक्षा: दलहन भारत के मुख्यतः शाकाहारी आहार में प्रमुख प्रोटीन स्रोत हैं।
    • किंतु घरेलू उत्पादन प्रायः माँग से कम होता है, जिससे आयात करना पड़ता है।
    • प्रमुख आयात स्रोत कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और म्यांमार हैं। घरेलू उत्पादन बढ़ाने से खाद्य सुरक्षा सुदृढ़ होगी और आयात बिल घटेगा।
  • किसानों के लिए आर्थिक लाभ: फसल विविधीकरण से कुछ फसलों पर निर्भरता कम होती है, कृषि अधिक लचीली बनती है और विविध उत्पादन प्रणाली से आय में वृद्धि होती है।
  • दलहन का महत्व: दलहन फसलें राइजोबियम जीवाणु के माध्यम से वायुमंडलीय नाइट्रोजन स्थिर करती हैं, जिससे मृदा उर्वरता सुधरती है।

दलहन को प्रोत्साहित करने हेतु नीतिगत उपाय

  • MSP और खरीद को सुदृढ़ करना: प्रभावी MSP क्रियान्वयन सुनिश्चित करना और NAFED तथा FCI के माध्यम से खरीद का विस्तार करना।
  • मूल्य स्थिरीकरण तंत्र: बफर स्टॉक बनाए रखना और घरेलू फसल कटाई के समय आयात को नियंत्रित करना।
  • कृषि विविधीकरण कार्यक्रम: धान की परती भूमि में दलहन को बढ़ावा देना और अंतरफसली प्रणालियों को प्रोत्साहित करना।
  • सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) में सम्मिलन: PDS टोकरी में दलहन जोड़ने से माँग बढ़ेगी और किसानों को समर्थन मिलेगा।

निष्कर्ष

  • सर्वोच्च न्यायालय का हस्तक्षेप भारत की कृषि नीति में संरचनात्मक सुधारों की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
  • MSP सुधार, खरीद आश्वासन, आयात विनियमन और वैज्ञानिक फसल विविधीकरण रणनीतियों को सम्मिलित करने वाला समन्वित प्रयास आवश्यक है।

स्रोत: TH

 

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