राजनीतिक नेतृत्व में महिलाएँ

पाठ्यक्रम: GS2/राजव्यवस्था / सामाजिक न्याय

संदर्भ

  • महिला स्थिति आयोग (CSW70) के 70वें सत्र के दौरान जारी हालिया आँकड़े यह दर्शाते हैं कि विश्व स्तर पर राजनीतिक नेतृत्व में महिलाओं का प्रतिनिधित्व अभी भी अत्यंत कम है।

मुख्य निष्कर्ष

  • विश्व स्तर पर महिलाओं के पास केवल 22.4% कैबिनेट पद और 27.5% संसदीय सीटें हैं।
  • वर्तमान में केवल 28 देशों का नेतृत्व महिला कर रही हैं, जबकि 101 देशों में कभी भी महिला राज्य प्रमुख या सरकार प्रमुख नहीं रही।
  • जनवरी 2026 तक 54 महिलाएँ संसदीय अध्यक्ष के रूप में कार्यरत हैं, जो कुल अध्यक्षों का 19.9% है। यह विगत 21 वर्षों में पहली गिरावट है।
  • महिलाएँ सामाजिक नीति मंत्रालयों में अत्यधिक केंद्रित हैं:
    • 90% लैंगिक समानता मंत्रालयों में
    • 73% परिवार एवं बाल मामलों के मंत्रालयों में
  • पुरुष रक्षा, गृह, न्याय और आर्थिक मामलों जैसे प्रमुख शक्ति मंत्रालयों में प्रभुत्व रखते हैं।

भारत में महिलाओं का राजनीतिक प्रतिनिधित्व

  • लोकसभा में महिला सांसदों का प्रतिशत 2004 तक 5% से 10% के बीच रहा।
  • 2014 में यह मामूली रूप से बढ़कर 12% हुआ और वर्तमान में 18वीं लोकसभा में 14% है।
  • राज्य विधानसभाओं में स्थिति कमजोर है, जहाँ राष्ट्रीय औसत लगभग 9% है।
  • 2024 तक भारत, अंतर-संसदीय संघ द्वारा प्रकाशित ‘राष्ट्रीय संसदों में महिलाओं की मासिक रैंकिंग’ में 143वें स्थान पर था।

भारत में महिलाओं के लिए आरक्षण

  • संविधान के 73वें और 74वें संशोधन अधिनियमों ने पंचायती राज संस्थाओं और नगरीय स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटों का आरक्षण अनिवार्य किया।
    • आरक्षित सीटों में से 33% अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित होना आवश्यक था।
    • सभी स्तरों पर पदाधिकारियों और अध्यक्षों की एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की गईं।
  • 106वाँ संविधान संशोधन: लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और दिल्ली विधानसभा में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटों का आरक्षण सुनिश्चित करता है, जिसमें अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटें भी शामिल हैं।

आरक्षण की आवश्यकता

  • वर्तमान लोकसभा में महिलाओं का प्रतिशत 14% है, जो वैश्विक औसत 24% से कम है।
  • महिलाओं की स्थिति सुधारने हेतु सकारात्मक कार्रवाई (Affirmative Action) आवश्यक है।
  • पंचायती राज पर किए गए हालिया अध्ययनों ने दिखाया है कि आरक्षण से महिलाओं के सशक्तिकरण और संसाधनों के आवंटन पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा है।
  • विश्व आर्थिक मंच का लैंगिक अंतर सूचकांक चार आयामों पर आधारित है – आर्थिक भागीदारी एवं अवसर, शैक्षिक उपलब्धि, स्वास्थ्य एवं अस्तित्व, और राजनीतिक सशक्तिकरण।
  • विविध समूहों की उपस्थिति संस्थाओं को विभिन्न दृष्टिकोणों से चीज़ों को देखने में सहायता करती है।

शक्तिशाली पदों पर कार्य करते समय महिलाओं को आने वाली चुनौतियाँ

  • लैंगिक पक्षपात: प्रगति के बावजूद, कई महिलाएँ ऐसे रूढ़िवादी विचारों का सामना करती हैं जो उनकी क्षमता और नेतृत्व पर प्रश्न उठाते हैं।
  • कार्य-जीवन संतुलन: पेशेवर उत्तरदायित्व और पारंपरिक पारिवारिक भूमिकाओं का संतुलन कठिन होता है, जिससे थकान एवं मानसिक दबाव बढ़ता है।
  • उत्पीड़न और भेदभाव: कार्यस्थल पर उत्पीड़न महिलाओं को आत्मविश्वास से कार्य करने से रोकता है।
  • सांस्कृतिक अपेक्षाएँ: सामाजिक मानदंड महिलाओं पर पारंपरिक भूमिकाओं में बने रहने का दबाव डालते हैं।
  • नेटवर्किंग बाधाएँ: राजनीतिक नेटवर्क पुरुष-प्रधान होने के कारण महिलाओं के अवसर सीमित रहते हैं।

महिलाओं के प्रतिनिधित्व का महत्व

  • विविध दृष्टिकोण: महिलाएँ अपने विशिष्ट अनुभवों और दृष्टिकोणों से निर्णय-निर्माण को अधिक व्यापक बनाती हैं।
  • आदर्श प्रस्तुत करना: नेतृत्व पदों पर महिलाओं की बढ़ती दृश्यता नई पीढ़ी को प्रेरित करती है और लैंगिक रूढ़ियों को चुनौती देती है।
  • न्याय और समानता: उचित प्रतिनिधित्व लैंगिक समानता को बढ़ावा देता है और महिलाओं की आवाज़ को नीति-निर्माण में शामिल करता है।
  • संतुलित नीतियाँ: शासन में महिलाओं की भागीदारी से ऐसी नीतियाँ बनती हैं जो महिलाओं और परिवारों की समस्याओं को संबोधित करती हैं।
  • आर्थिक विकास: महिलाओं को सशक्त बनाना और उनका प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना आर्थिक विकास में योगदान देता है।
  • सांस्कृतिक परिवर्तन: महिलाओं का बढ़ता प्रतिनिधित्व सामाजिक मानदंडों को चुनौती देता है और समानता की संस्कृति को बढ़ावा देता है।

आगे की राह

  • यह एक सतत मुद्दा है कि सभी देशों में आधी जनसंख्या का प्रतिनिधित्व बढ़ाया जाए।
  • महिलाओं का प्रतिनिधित्व न्यायसंगत, प्रगतिशील और समान समाजों के निर्माण के लिए अनिवार्य है।

स्रोत: DTE

 

Other News of the Day

पाठ्यक्रम: GS3/ अर्थव्यवस्था संदर्भ हालिया भू-राजनीतिक घटनाक्रम तथा प्रमुख शक्तियों द्वारा व्यापार, ऊर्जा, वित्त और प्रौद्योगिकी का सामरिक उपयोग इस तथ्य को रेखांकित करता है कि राष्ट्रीय सुरक्षा एवं विदेश नीति की स्वायत्तता की रक्षा के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता अत्यंत आवश्यक है। भारत की बाह्य निर्भरताओं से जुड़े ऐतिहासिक प्रसंग खाद्य निर्भरता:1960 के...
Read More

पाठ्यक्रम: GS3/अर्थव्यवस्था संदर्भ टैरिफ, निर्यात नियंत्रण तथा “राष्ट्रीय खरीद” (Buy National) जैसे अनिवार्य प्रावधानों की बढ़ती संख्या को देखते हुए यह स्पष्ट हो गया है कि “जेंटल  ट्रेड(Gentle Trade)” का युग समाप्ति की ओर अग्रसर है। डॉक्स कॉमर्स (Doux Commerce) की अवधारणा डॉक्स कॉमर्स (Doux Commerce) शब्द को मोंतेस्क्यू (Montesquieu) द्वारा लोकप्रिय बनाया गया था,...
Read More

पाठ्यक्रम: GS3/ अर्थव्यवस्था संदर्भ आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 भारत के श्रम सुधारों का आशावादी मूल्यांकन प्रस्तुत करता है और यह रेखांकित करता है कि नई श्रम संहिताएँ औपचारिककरण, रोजगार सृजन एवं आर्थिक वृद्धि को बढ़ावा देने की क्षमता रखती हैं। भारत की श्रम संहिताएँ भारत ने 29 श्रम कानूनों को समेकित कर चार व्यापक श्रम संहिताओं...
Read More

पाठ्यक्रम: GS3/ऊर्जा संदर्भ  पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य के आसपास उत्पन्न व्यवधानों के कारण ऊर्जा की कीमतों में वृद्धि तथा भारतीय उद्योगों के लिए गैस की उपलब्धता में कमी आई है। यह स्थिति तापीय आत्मनिर्भरता की तात्कालिक आवश्यकता को रेखांकित करती है। औद्योगिक / तापीय ऊष्मा के बारे में औद्योगिक ऊष्मा से...
Read More

दांडी मार्च पाठ्यक्रम: GS1 / आधुनिक भारत का इतिहास संदर्भ भारत के उपराष्ट्रपति ने हाल ही में महात्मा गांधी और दांडी मार्च (1930) में शामिल स्वतंत्रता सेनानियों को श्रद्धांजलि अर्पित की। दांडी मार्च के बारे में ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार ने नमक के उत्पादन और बिक्री पर एकाधिकार स्थापित कर दिया था तथा नमक कर लगाया...
Read More
scroll to top