पाठ्यक्रम: GS3/कृषि
संदर्भ
- संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (FAO) ने वर्ष 2026 को अंतर्राष्ट्रीय महिला कृषक वर्ष (IYWF 2026) घोषित किया है।
परिचय
- कार्यबल परिवर्तन: ग्रामीण पुरुष गैर-कृषि नौकरियों की ओर बढ़ रहे हैं, जिसके परिणामस्वरूप महिलाएँ कृषि में उनका स्थान ले रही हैं।
- महिलाओं की भागीदारी में वृद्धि:
- एक दशक में कृषि में महिलाओं का रोजगार 135% बढ़ा।
- महिलाएँ अब कृषि कार्यबल का 42% हिस्सा हैं।
- हर तीन कामकाजी महिलाओं में से दो कृषि में संलग्न हैं।
- यह अनुपात अभी भी वैश्विक स्तर से कम है, जहाँ अधिकांश देशों में महिलाओं की कार्य भागीदारी 57%-63% के बीच है।
- वर्ष 2023-24 में कम से कम 117.6 मिलियन महिलाएँ कृषि में कार्यरत थीं (21.7 मिलियन नियोजित श्रमिक, 95.1 मिलियन स्वरोज़गार और 0.8 मिलियन नियमित श्रमिक)।
- अनुमानित पुरुष कार्यबल कृषि में 127.5 मिलियन था।
- आर्थिक प्रभाव: महिलाओं की अधिक भागीदारी के बावजूद कृषि का राष्ट्रीय सकल मूल्य वर्धन (GVA) में हिस्सा 2017-18 के 15.3% से घटकर 2024-25 में 14.4% रह गया।

कृषि में महिलाओं द्वारा सामना की जाने वाली चुनौतियाँ
- अवैतनिक श्रम: लगभग आधी महिलाएँ कृषि में अवैतनिक पारिवारिक श्रमिक हैं। उनकी संख्या आठ वर्षों में 23.6 मिलियन से बढ़कर 59.1 मिलियन हो गई।
- बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में 80% से अधिक महिलाएँ कृषि में कार्यरत हैं तथा उनमें से आधी से अधिक को कोई वेतन नहीं मिलता।
- प्रणालीगत असमानताएँ: महिलाएँ केवल 13-14% भूमि की मालिक हैं और समान कार्य के लिए पुरुषों से 20-30% कम कमाती हैं।
- संपत्ति स्वामित्व, निर्णय लेने की शक्ति, ऋण और सरकारी सहायता तक पहुँच पुरुष-प्रधान है।
- डिजिटल विभाजन: डिजिटल साक्षरता, भाषा और उपकरणों की लागत जैसी बाधाएँ आधुनिक कृषि बाज़ारों में महिलाओं की भागीदारी को सीमित करती हैं।
- इस प्रकार, कृषि का स्त्रीकरण महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण के बजाय असमानताओं को बेहतर कर रहा है।
उभरते अवसर
- उच्च-मूल्य खंड: जैविक उत्पादों और सुपरफूड्स की वैश्विक मांग बढ़ने से भारत की चाय, मसाले, मिलेट्स एवं प्रमाणित जैविक उत्पादों की मूल्य श्रृंखलाएँ विस्तार के लिए तैयार हैं।
- भौगोलिक संकेतक (GI), ब्रांडिंग पहल और निर्यात मानकों को पूरा करने में सहायता महिलाओं को आत्मनिर्भर खेती से प्रीमियम, मूल्य-वर्धित उत्पाद बाज़ारों की ओर ले जा सकती है।
- डिजिटल नवाचार: ई-नाम, मोबाइल आधारित परामर्श सेवाएँ, वॉयस-असिस्टेड एप्लिकेशन और प्रिसीजन एग्रीकल्चर उपकरण महिलाओं को बाज़ारों, ज्ञान प्रणालियों एवं वित्तीय सेवाओं से जोड़ रहे हैं।
- ये समाधान महिलाओं के श्रम को औपचारिक रूप देते हैं और योजनाओं, ऋण तथा उचित मूल्य तक पहुँच का विस्तार करते हैं।
महिलाओं के लिए सरकारी पहल
- महिला किसान सशक्तिकरण परियोजना (MKSP): राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM) के अंतर्गत महिलाओं को सतत कृषि, पशुधन और गैर-लकड़ी वन उत्पादों में सहयोग।
- संयुक्त भूमि शीर्षक: राज्यों को पति-पत्नी के संयुक्त नाम से भूमि पट्टा जारी करने के लिए प्रोत्साहित किया गया।
- प्राथमिकता क्षेत्र ऋण (PSL): महिला किसानों को ऋण प्रवाह सुनिश्चित करना।
- ग्रामीण महिला स्वयं सहायता समूह (SHGs) और उत्पादक संगठन (FPOs): NABARD और DAY-NRLM के माध्यम से सहयोग।
- कृषि-परामर्श एवं कृषि-व्यवसाय केंद्र (ACABC): महिला कृषि उद्यमियों के लिए विशेष प्रावधान।
- डिजिटल साक्षरता: डिजिटल सखी, भाषिनी प्लेटफ़ॉर्म जैसी पहलें।
- मातृत्व लाभ एवं स्वास्थ्य योजनाएँ: महिला किसानों के कल्याण हेतु अप्रत्यक्ष सहयोग।
- महिला FPOs का समर्थन: 10,000 FPO योजना (2020) के अंतर्गत महिला-नेतृत्व वाले समूहों के लिए विशेष प्रावधान।
- GI टैग, ब्रांडिंग और निर्यात सुविधा: मसाले, चाय, मिलेट्स और जैविक उत्पादों में महिला उत्पादकों को सहयोग।
आगे की राह
- लक्षित उपायों के बिना महिलाएँ भारतीय कृषि में उभरते निर्यात-आधारित अवसरों से बाहर रह सकती हैं।
- महिलाओं की भूमिका को परिवर्तित करने के लिए भूमि और श्रम सुधार समान रूप से आवश्यक हैं।
- नीतियों को महिलाओं को स्वतंत्र किसान के रूप में मान्यता देनी चाहिए, संयुक्त या व्यक्तिगत भूमि स्वामित्व को बढ़ावा देना चाहिए, जिससे उनकी ऋण, बीमा और संस्थागत सहयोग के लिए पात्रता सुदृढ़ हो सके।
Source: TH
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