पाठ्यक्रम: GS2/राजव्यवस्था और शासन
संदर्भ
- हाल ही में संघ–राज्य संबंधों पर गठित एक उच्च-स्तरीय समिति ने अपनी प्रथम रिपोर्ट तमिलनाडु सरकार को सौंपी है, जिसमें संघ और राज्यों के बीच साझा शक्तियों एवं जिम्मेदारियों पर विचार किया गया है।
भारत का संघवाद
- संघवाद शासन की वह प्रणाली है जिसमें शक्ति संविधान द्वारा केंद्रीय प्राधिकरण (संघ) और क्षेत्रीय सरकारों (राज्य) के बीच विभाजित होती है।
- संघीय प्रणाली दोनों स्तरों को उनके-अपने क्षेत्रों में स्वतंत्र अधिकार देती है, जबकि एकात्मक प्रणाली में सारी शक्ति केंद्र से प्रवाहित होती है।
- किसी भी स्तर को उसके निर्धारित क्षेत्राधिकार में कानूनी रूप से दूसरे का अधीनस्थ नहीं माना जाता।
भारत की विशिष्ट संघीय संरचना
- संवैधानिक संरचना: 1950 का संविधान, जो भारत शासन अधिनियम, 1935 से प्रभावित था, ने एक सशक्त संघ सूची, संसद में निहित अवशिष्ट शक्तियाँ, आपातकालीन प्रावधान (अनुच्छेद 352, 356, 360), एकल संविधान और एकल नागरिकता का प्रावधान किया।
- भारतीय संघवाद का स्वरूप विभाजन, रियासतों के एकीकरण और विखंडन की आशंकाओं से प्रभावित था, जो इसे अमेरिका जैसे शास्त्रीय संघीय ढाँचों से अलग बनाता है।
- भारत को प्रायः “राज्यों का संघ” कहा जाता है—यह वाक्यांश संविधान में जानबूझकर प्रयुक्त किया गया है ताकि विविधता में एकता को प्रतिबिंबित किया जा सके।
- भारत का संघवाद प्रायः अर्ध-संघीय या एकात्मक झुकाव वाला संघीय कहा जाता है, क्योंकि भारत का संविधान संघ को कुछ क्षेत्रों में, विशेषकर आपातकालीन परिस्थितियों में, अधिक शक्तियाँ प्रदान करता है।
| शक्तियों का संवैधानिक विभाजन (अनुसूची VII) | ||
| सूची | कानून कौन बनाता है? | उदाहरण |
| संघ सूची | संसद | रक्षा, विदेश मामले, मुद्रा |
| राज्य सूची | राज्य विधानमंडल | पुलिस, लोक व्यवस्था, जन स्वास्थ्य |
| समवर्ती सूची | दोनों | शिक्षा, वन, विवाह |
- अगर समवर्ती सूची के विषय में कोई टकराव होता है, तो संघ का कानून प्रभावी होगा (कुछ अपवादों को छोड़कर)। यह दोनों बातों को दिखाता है:
- राष्ट्रीय एकता की आवश्यकता , और क्षेत्रीय विविधता की मान्यता।
भारतीय संघवाद के मूलभूत आधारभूत सिद्धांत
- संवैधानिक सर्वोच्चता: भारत संसदीय सर्वोच्चता (जैसे UK में) पर आधारित नहीं है।
- यहाँ संविधान सर्वोच्च है, अर्थात् संघ और राज्य दोनों अपनी शक्तियाँ संविधान से प्राप्त करते हैं और कोई भी सरकार (संघ या राज्य) संवैधानिक सीमाओं से परे कार्य नहीं कर सकती।
- विधायी, कार्यकारी और वित्तीय शक्तियों का विभाजन: संघवाद केवल कानून बनाने तक सीमित नहीं है। इसमें विधायी शक्तियाँ (कानून निर्माण), कार्यकारी शक्तियाँ और वित्तीय शक्तियाँ शामिल हैं।
- राजस्व साझेदारी वित्त आयोग, GST परिषद और केंद्रीय प्रायोजित योजनाओं के माध्यम से की जाती है।
- सहकारी संघवाद: भारत का मॉडल प्रतिस्पर्धी या विरोधी होने के लिए नहीं है। आदर्श दृष्टि सहकारी संघवाद की है, जिसका अर्थ है:
- संघ और राज्य मिलकर कार्य करें।
- नीतियों पर सहयोगात्मक चर्चा हो।
- अंतर-राज्य परिषद और GST परिषद जैसी संस्थाएँ परामर्श को प्रोत्साहित करती हैं।
- हाल ही में प्रतिस्पर्धी संघवाद शब्द भी उभरा है, जिसका अर्थ है कि राज्य प्रदर्शन (निवेश, व्यापार सुगमता, शासन सुधार) में प्रतिस्पर्धा करते हैं।
- विविधता में एकता: भारत भाषाई, सांस्कृतिक और आर्थिक रूप से विविध है। संघवाद विभिन्न भाषाओं, विकास मॉडलों और शासन प्रयोगों को समायोजित करता है।
- उदाहरण:
- तमिलनाडु ने दोपहर भोजन योजना की पहल की।
- केरल ने सुदृढ़ सार्वजनिक स्वास्थ्य परिणाम हासिल किए।
- महाराष्ट्र ने रोजगार गारंटी योजनाओं का प्रयोग किया।
- उदाहरण:
- विषम संघवाद: भारत सभी राज्यों के साथ समान व्यवहार नहीं करता। कुछ राज्यों को ऐतिहासिक रूप से विशेष प्रावधान प्राप्त रहे हैं, जैसे उत्तर-पूर्व भारत के जनजातीय क्षेत्रों के लिए छठी अनुसूची।
न्यायिक सुरक्षा: संघवाद एक मूल संरचना
- S.R. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994): सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि संघवाद संविधान की मूल संरचना का भाग है।
- राज्य केवल केंद्र के ‘परिशिष्ट’ नहीं हैं; वे अपने संवैधानिक क्षेत्र में सर्वोच्च हैं।
- मूल संरचना का अर्थ है कि संसद भी संविधान में ऐसा संशोधन नहीं कर सकती जो संघवाद को नष्ट कर दे।
- अनुच्छेद 356 (राष्ट्रपति शासन) न्यायिक समीक्षा के अधीन है।
केंद्र–राज्य संबंधों पर आयोग
- राजमन्नार समिति (1971): तमिलनाडु द्वारा गठित, इसने अधिक राज्य स्वायत्तता और संघ के अतिक्रमण पर स्पष्ट सीमाओं का समर्थन किया।
- सरकारिया आयोग (1983–1988): सहकारी संघवाद, अनुच्छेद 356 के संयमित प्रयोग और राज्यों से परामर्श की सिफारिश की।
- पुंछी आयोग (2007–2010): राज्यपाल की भूमिका को पुनर्परिभाषित करने और अंतर-सरकारी तंत्र को सुदृढ़ करने का आह्वान किया।
भारत के संघवाद से संबंधित चिंताएँ और मुद्दे
- विधायी शक्तियों का केंद्रीकरण: संसद बढ़ते हुए उन विषयों पर कानून बना रही है जिन पर राज्यों का भी अधिकार है।
- अनुच्छेद 249 और 250 जैसी व्यवस्थाएँ संसद को कुछ परिस्थितियों में राज्य विषयों पर कानून बनाने की अनुमति देती हैं, जिससे राज्य क्षेत्र के क्षरण की चिंता बढ़ती है।
- जब समान राष्ट्रीय कानून स्थानीय नीति विकल्पों को अधिलेखित करते हैं, तो यह राज्य की सार्थक स्वायत्तता को कम करता है।
- अनुच्छेद 356 का दुरुपयोग और विरासत: अनुच्छेद 356 (राष्ट्रपति शासन) को S.R. बोम्मई (1994) से पहले प्रायः राजनीतिक कारणों से लागू किया जाता था।
- सर्वोच्च न्यायालय ने मनमाने प्रयोग को सीमित किया और घोषणाओं को न्यायिक समीक्षा योग्य बनाया।
- राज्यपालों की भूमिका:
- प्रमुख चिंताएँ:
- राज्य विधेयकों पर सहमति देने में देरी या अस्वीकृति।
- सरकार गठन में विवेकाधिकार।
- अनुच्छेद 356 के अंतर्गत रिपोर्टिंग।
- प्रमुख चिंताएँ:
- वित्तीय संघवाद में असंतुलन:
- ऊर्ध्वाधर असंतुलन: राज्यों पर स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि जैसी भारी व्यय जिम्मेदारियाँ हैं, जबकि प्रमुख कराधान शक्तियाँ संघ स्तर पर केंद्रित हैं।
- शर्तीय हस्तांतरण: अनुच्छेद 282 के अंतर्गत केंद्रीय प्रायोजित योजनाएँ (CSS) संघ को बंधित अनुदानों के माध्यम से नीति ढाँचे प्रवर्तित करने की अनुमति देती हैं।
- वित्त आयोग की गतिशीलता: व्यापक चिंता यह है कि वित्तीय निर्भरता वास्तविक स्वायत्तता को कमजोर करती है।
- GST और साझा संप्रभुता: GST (2017) ने वित्तीय संघवाद को पुनर्गठित किया।
- चिंताएँ:
- राज्यों के स्वतंत्र कराधान क्षेत्र का नुकसान।
- GST क्षतिपूर्ति विवाद।
- GST परिषद में मतदान संरचना।
- कर दरों पर बढ़ती केंद्रीय समन्वय।
- चिंताएँ:
- यह समान बाजार एकीकरण और वित्तीय स्वायत्तता के बीच स्थित है।
- कार्यकारी संघवाद और संस्थागत विचलन:नीति आयोग, GST परिषद और अंतर-राज्य परिषद जैसी अंतर-सरकारी संस्थाओं ने संघीय व्यवहार को पुनः आकार दिया है।
- निर्णय-निर्माण बढ़ते हुए कार्यकारी मंचों के माध्यम से होता है, जिससे पारदर्शिता और औपचारिक जवाबदेही कम होती है।
- विषम संघवाद पर दबाव: भारत विषमता को समायोजित करता है (जैसे कुछ राज्यों के लिए विशेष प्रावधान)।
- किंतु राज्यों का पुनर्गठन, विशेष दर्जे की व्यवस्थाओं में परिवर्तन और समान नीति अभियानों ने यह प्रश्न उठाया है कि केंद्रीयकरण ढाँचे में विषमता कैसे संरक्षित की जा रही है।
- राजनीतिक केंद्रीकरण: संघ स्तर पर सुदृढ़ एक-दलीय प्रभुत्व, विशेषकर जब वही दल अनेक राज्यों में शासन करता है, तो हाई कमांड संस्कृति, सौदेबाज़ी स्वायत्तता में कमी और नीति समानता का दबाव उत्पन्न कर सकता है।
- इसके विपरीत, गठबंधन युगों ने ऐतिहासिक रूप से वार्तालाप आधारित संघवाद को सुदृढ़ किया।
आगे की राह: भारत के संघवाद को सुदृढ़ करना
- समवर्ती सूची में अतिक्रमण को सीमित करना: संसद को समवर्ती विषयों पर कानून बनाने में संयम रखना चाहिए, जब तक कि राष्ट्रीय एकरूपता अनिवार्य न हो।
- अनुच्छेद 263 के अंतर्गत संस्थाओं को पुनर्जीवित करना संरचित संवाद को संस्थागत बना सकता है, बजाय अस्थायी वार्ताओं के।
- राज्यपालों की भूमिका में सुधार: नियुक्ति के लिए पारदर्शी मानदंड स्थापित किए जाएँ।
- राज्य विधेयकों पर सहमति देने की समयसीमा तय की जाए।
- विवेकाधिकार शक्तियों को अधिक स्पष्ट रूप से संहिताबद्ध किया जाए।
- सरकारिया और पुंछी आयोग ने राज्यपाल पद को दलगत प्रभाव से मुक्त रखने की सिफारिश की है। इन सुधारों को लागू करने से संघ–राज्य संघर्षों में कमी आएगी।
- अनुच्छेद 282 की प्रथाओं पर पुनर्विचार:वित्तीय केंद्रीकरण को रोकने हेतु विवेकाधीन अनुदानों की सीमाएँ स्पष्ट की जाएँ।
- पूर्वानुमेय, पारदर्शी और नियम-आधारित वित्तीय विकेंद्रीकरण सुनिश्चित करना आवश्यक है।
- GST शासन का पुनर्संतुलन: अधिक विचार-विमर्श पारदर्शिता, समय पर क्षतिपूर्ति तंत्र और परिभाषित क्षेत्रों में राज्यों को सीमित दर लचीलापन देने के लिए सुधार आवश्यक हैं।
- इससे बाज़ार एकीकरण और वित्तीय स्वायत्तता के बीच संतुलन स्थापित होगा।
- सहकारी एवं प्रतिस्पर्धी संघवाद का संस्थानीकरण:भारत का संघीय भविष्य सहकारी संघवाद (साझा निर्णय-निर्माण) और प्रतिस्पर्धी संघवाद (नीति नवाचार एवं तुलनात्मक मूल्यांकन) के संयोजन में निहित है।
- राज्यों को प्रयोग करने के लिए प्रोत्साहित करना और सर्वोत्तम प्रथाओं को क्षैतिज रूप से साझा करना समग्र शासन क्षमता को सुदृढ़ करता है।
| मुख्य परीक्षा दैनिक अभ्यास प्रश्न [प्रश्न]भारत की संघीय प्रणाली का परीक्षण कीजिए कि क्या इसे समकालीन राजनीतिक और प्रशासनिक वास्तविकताओं के अनुरूप संरचनात्मक पुनर्संयोजन की आवश्यकता है। |
स्रोत: TH
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