पाठ्यक्रम: GS3/पर्यावरण; ऊर्जा
संदर्भ
- भारत 2070 तक नेट ज़ीरो उत्सर्जन प्राप्त करने के प्रयासों के अंतर्गत, सतत विमानन ईंधन (SAF) पर एक राष्ट्रीय नीति और 2050 तक की दीर्घकालिक रूपरेखा तैयार कर रहा है।
सतत विमानन ईंधन (SAF) के बारे में
- यह जीवाश्म-आधारित जेट ईंधन का जैव-आधारित विकल्प है, जिसे गैर-खाद्य तेलों, प्रयुक्त खाना पकाने के तेल, शैवाल और कृषि अपशिष्ट से उत्पादित किया जा सकता है।
SAF पर राष्ट्रीय नीति की आवश्यकता
- वैश्विक अनुपालन और अंतरराष्ट्रीय प्रमाणन सक्षम करना: ICAO की CORSIA योजना 2027 से भाग लेने वाले देशों के लिए अनिवार्य हो जाएगी। I
- CAO सदस्य देशों के बीच अंतरराष्ट्रीय उड़ानें संचालित करने वाली एयरलाइनों को एक निर्धारित आधार रेखा से अधिक कार्बन उत्सर्जन की भरपाई करनी होगी, जिससे वैश्विक उत्सर्जन कटौती लक्ष्यों के अनुपालन की पुष्टि हो सके।
- भारत के पास वर्तमान में CORSIA ढांचे के अंतर्गत जीवन चक्र मूल्यांकन (LCA) का कोई मानक नहीं है, जबकि ब्राज़ील (गन्ना) और अमेरिका (मक्का) के पास यह उपस्थित है।
| अंतरराष्ट्रीय विमानन के लिए कार्बन ऑफसेटिंग और कटौती योजना (CORSIA) – यह योजना अंतरराष्ट्रीय नागरिक विमानन संगठन (ICAO) द्वारा 2016 में शुरू की गई थी, जिसका उद्देश्य 2020 से अंतरराष्ट्रीय विमानन में कार्बन-न्यूट्रल वृद्धि प्राप्त करना है। यह अंतरराष्ट्रीय विमानन उत्सर्जन को संबोधित करने के लिए पहला वैश्विक बाजार-आधारित तंत्र है। कार्यान्वयन चरण: – पायलट चरण (2021–2023): स्वैच्छिक भागीदारी। – पहला चरण (2024–2026): अभी भी स्वैच्छिक, लेकिन कई देशों ने भाग लिया है। – दूसरा चरण (2027–2035): अधिकांश ICAO सदस्य देशों के लिए अनिवार्य (कम विकसित देशों, छोटे द्वीपीय विकासशील देशों और स्थल-रुद्ध देशों को छोड़कर)। |
संभावनाएं और अवसर
- भारत ने SAF को विमानन टरबाइन ईंधन (ATF) में मिलाने के लिए 2027 तक 1%, 2028 तक 2%, और 2030 तक 5% का लक्ष्य प्रस्तावित किया है, प्रारंभिक रूप से अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के लिए।
- 2030 तक 5% SAF मिश्रण लक्ष्य प्राप्त करने के लिए लगभग 6 अरब लीटर एथेनॉल की आवश्यकता होगी, यदि अन्य फीडस्टॉक पर विचार न किया जाए।
- फीडस्टॉक की खेती और आपूर्ति श्रृंखला विकास का समर्थन: डेलॉयट की 2024 रिपोर्ट ‘ग्रीन विंग्स: भारत में सतत विमानन ईंधन क्रांति का निर्माण हो रहा है’’ के अनुसार:
- भारत FY40 तक प्रति वर्ष 8–10 मिलियन टन SAF का उत्पादन कर सकता है।
- आवश्यक निवेश: ₹6–7 लाख करोड़ ($70–85 बिलियन)।
- उत्सर्जन कटौती की क्षमता: प्रति वर्ष 20–25 मिलियन टन।
- भारतीय शुगर एवं बायो-एनर्जी निर्माता संघ (ISMA) मिश्रण रणनीतियों पर कार्य कर रहा है।
- इसने टेरी (TERI) के साथ मिलकर सिरप, शीरा और बैगास से गन्ना-आधारित SAF का जीवन चक्र मूल्यांकन (LCA) करने के लिए साझेदारी की है।
चुनौतियाँ
- लागत और वर्गीकरण: SAF की लागत पारंपरिक जेट ईंधन की तुलना में लगभग 3 गुना अधिक है, जबकि सिंथेटिक SAF (पावर-टू-लिक्विड) 7 गुना तक महंगा हो सकता है।
- SAF अभी भी जीवाश्म ईंधन के अंतर्गत वर्गीकृत है, जबकि इसे जैव ऊर्जा क्षेत्र में पुनर्वर्गीकृत करने से गोबरधन योजना जैसी वतर्मान प्रोत्साहनों तक पहुंच मिल सकती है।
- प्रौद्योगिकीय अंतराल: SAF उत्पादन के लिए उन्नत अवसंरचना और अनुसंधान एवं विकास की आवश्यकता होती है।
- मोलासेस, बैगास और प्रयुक्त खाना पकाने के तेल जैसे सतत बायोमास तक सीमित पहुंच है।
भारत में SAF से संबंधित प्रयास और पहलें
- संस्थागत ढांचा: यह नीति पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय (MoPNG) तथा नागरिक उड्डयन मंत्रालय (MoCA) द्वारा संयुक्त रूप से संचालित की जा रही है।
- MoPNG: उत्पादन, फीडस्टॉक विकास और प्रमाणन पर केंद्रित।
- SAF को अपनाने को बढ़ावा देने के लिए एक बायो-एविएशन टरबाइन फ्यूल प्रोग्राम समिति का गठन किया गया है।
- MoCA: कार्यान्वयन, एयरलाइन दायित्व, हवाई अड्डों की तैयारी और ASTM D7566 तथा CORSIA जैसे वैश्विक मानकों के अनुपालन के लिए उतार्दायी है।
- MoPNG: उत्पादन, फीडस्टॉक विकास और प्रमाणन पर केंद्रित।
- इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन प्रयुक्त खाना पकाने के तेल से प्रति वर्ष 35,000 टन SAF का उत्पादन शुरू करने की योजना बना रहा है, जिसे बड़े होटलों, रेस्तरां और खाद्य श्रृंखलाओं से प्राप्त किया जाएगा।
- भारत और अमेरिका के बीच रणनीतिक स्वच्छ ऊर्जा साझेदारी (SCEP) के अंतर्गत सहयोग किया जा रहा है, जिसमें SAF पर केंद्रित कार्यशालाएं अनुसंधान, प्रमाणन और बाजार विकास पर आधारित हैं।
- CSIR–भारतीय पेट्रोलियम संस्थान (IIP) ने पाम स्टेरिन, सैपियम तेल, शैवाल तेल, करंजा और जात्रोफा जैसे स्वदेशी फीडस्टॉक से SAF विकसित किया है।
- इसे सैन्य विमान में उपयोग के लिए सैन्य वायुगतिकीयता एवं प्रमाणन केंद्र (CEMILAC) से अस्थायी प्रमाणन प्राप्त हुआ है।
निष्कर्ष और आगे की राह
- भारत की SAF नीति केवल एक पर्यावरणीय आवश्यकता नहीं बल्कि सतत विमानन में नेतृत्व करने का एक रणनीतिक अवसर है।
- सरकार, उद्योग और अनुसंधान संस्थानों के बीच सुदृढ़ सहयोग के साथ, भारत अपने नेट ज़ीरो लक्ष्यों की दिशा में आगे बढ़ सकता है।
- एक व्यापक राष्ट्रीय SAF नीति को स्पष्ट आदेशों और नियामक दिशानिर्देशों के साथ शीघ्र जारी करने की आवश्यकता है।
Previous article
हिंद महासागर क्षेत्र: अवसर और चुनौतियाँ
Next article
अपतटीय जलभृतों का महत्व