भारत में पारंपरिक बीज किस्मों का संरक्षण

पाठ्यक्रम: GS3/ कृषि और जैव विविधता

संदर्भ 

  • सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) ने हाल ही में भारत भर में सामुदायिक बीज बैंकों (CSBs) का अध्ययन किया और पारंपरिक बीज संरक्षण ज्ञान के पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरण में गिरावट को लेकर चिंता जताई।

पारंपरिक बीज संरक्षण का महत्व 

  • आनुवंशिक विविधता: ये बीज व्यापक आनुवंशिक आधार वाले होते हैं, जिससे फसलें कीट और बीमारियों के प्रति स्वाभाविक रूप से सहनशील बनती हैं।
    • एकल फसल प्रणाली (मोनोकल्चर) के विपरीत, जो बीमारियों के तेजी से फैलाव से ग्रस्त होती है, पारंपरिक बहु-फसल प्रणाली ऐसे जोखिमों से बचाव करती है।
  • जलवायु सहनशीलता: बदलते मौसम—बादल फटने से लेकर सूखे तक—के दौर में पारंपरिक बीज बीमा का कार्य करते हैं। मिश्रित खेती प्रणालियों में कुछ किस्में विफल होने पर भी अन्य उपज देती हैं।
  • सततता: खुले परागण वाले और पुनः प्रयोग किए जा सकने वाले ये बीज जैविक खेती विधियों में पनपते हैं, जबकि वाणिज्यिक संकर बीजों के लिए रासायनिक इनपुट और प्रत्येक सीजन में पुनः खरीद की आवश्यकता होती है।
सामुदायिक बीज बैंक (CSBs) 
– CSB किसानों को पारंपरिक बीज उधार लेने और फसल कटाई के बाद दोगुनी मात्रा लौटाने की अनुमति देते हैं। 
– इससे विशेष रूप से पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील या आदिवासी क्षेत्रों में बीज सुरक्षा सुनिश्चित होती है। 
– फिर भी भारत में CSBs को विनियमित करने के लिए कोई ठोस नीतिगत ढांचा नहीं है। 
– बीज विधेयक 2019 अभी लंबित है, और किसान-प्रेरित बीज प्रणालियों को राष्ट्रीय कृषि रणनीति में सम्मिलित करने की कोई औपचारिक व्यवस्था विद्यमान नहीं है।

बीज संरक्षण में चुनौतियाँ

  •  युवा पीढ़ी की भागीदारी में कमी: युवा किसान अधिक उत्पादन की धारणा के चलते संकर या आनुवंशिक रूप से परिवर्तित (GM) बीजों को प्राथमिकता देने लगे हैं। 
  • CSBs को समर्थन का अभाव: अधिकांश सामुदायिक बीज बैंक सीमित फंडिंग में कार्य करते हैं, मुख्यतः NGO या स्वयं सहायता समूहों द्वारा संचालित।
    • सरकारी योजनाएँ उन्हें प्रायः बाहर कर देती हैं, जिससे कोई औपचारिक मान्यता या प्रोत्साहन नहीं मिलता।
  • सांस्कृतिक परंपराओं का क्षरण: कृषि ज्ञान का पारिवारिक हस्तांतरण पीढ़ियों के साथ कमजोर हुआ है। उत्तराखंड की रोटियाना जैसी पारंपरिक बीज-संरक्षण परंपराएँ लुप्त होती जा रही हैं।
  • नीतिगत खामियाँ और किसानों के अधिकारों का शोषण: पौध किस्मों और कृषक अधिकार संरक्षण अधिनियम (PPVFRA) जैसे कानूनों के बावजूद “सामान्य ज्ञान” पर आधारित बीज किस्मों का दस्तावेजीकरण कमजोर है।
    • यह शून्यता कुछ व्यक्तियों को समुदाय आधारित प्राचीन किस्मों को निजी संपत्ति के रूप में पंजीकृत करने की छूट देती है, जिससे जैविक लूट (बायोपायरेसी) का जोखिम बढ़ता है।

स्थानीय संरक्षण अभ्यास 

  • ओडिशा की नियामगिरी पहाड़ियों में: किसान विविध बाजरे, सब्जियों और तुलसी, गेंदे जैसे औषधीय पौधों की बुवाई करते हैं, जिससे पारिस्थितिक संतुलन बना रहता है। 
  • उत्तराखंड की बारह अनाज प्रणाली: बीज बचाओ आंदोलन द्वारा पुनर्जीवित, यह प्रणाली 12 पारंपरिक फसलों को एक साथ उगाने को बढ़ावा देती है। 
  • तेरथा गाँव, कर्नाटक: सहजा समृद्ध CSB नेटवर्क के माध्यम से युवा “डाइवर्सिटी ब्लॉक्स” में भागीदारी आधारित किस्म चयन (PVS) में शामिल होते हैं, और सबसे उपयुक्त बाजरा किस्मों की पहचान करते हैं। 
  • चिजामी, नागालैंड: एक महिला-नेतृत्वित CSB न केवल बीजों का संरक्षण करती है बल्कि युवाओं और स्कूली छात्रों को पारंपरिक खेती व भंडारण पर व्यवहारिक प्रशिक्षण भी देती है।
    • विभिन्न क्षेत्रों में महिलाएँ बीजों को मिट्टी के घड़ों या नीम की पत्तियों के साथ बाँस की टोकरियों में संरक्षित रखने की प्रमुख भूमिका निभाती हैं, जिससे बिना रसायन के दीर्घकालीन उपयोग सुनिश्चित होता है। 
  • भारत बीज स्वराज मंच (BBSM): 2014 में स्थापित, इसने मुंबई, पुणे, कोलकाता और हैदराबाद जैसे शहरों में सामुदायिक उत्सवों के माध्यम से बीज संरक्षण को जन आंदोलन के रूप में पुनर्जीवित किया।

आगे की राह 

  • नीतिगत एकीकरण और कानूनी सुरक्षा: “सामान्य ज्ञान” पर आधारित किस्मों का शीघ्र दस्तावेजीकरण कर अनुचित निजीकरण को रोका जाए। 
  • युवा बीज संरक्षकों को प्रोत्साहन: बीज संरक्षण में लगे युवाओं को पुरस्कार, प्रशिक्षण और वित्तीय समर्थन दिया जाए।
    • बीज संरक्षण को विद्यालय पाठ्यक्रम और ग्रामीण कौशल कार्यक्रमों में शामिल किया जाए।
  • विकेन्द्रीकृत विविधता को बढ़ावा देना: जंगलों और खेतों में बीजों के स्थल-आधारित संरक्षण को प्रोत्साहित किया जाए।
    • प्रत्येक 100–200 गाँवों के लिए क्लस्टर-स्तरीय CSB स्थानीय बीज स्वराज को सुनिश्चित कर सकते हैं।
  • सांस्कृतिक पुनरुद्धार: उत्सवों, लोककथाओं और पारिवारिक परंपराओं के माध्यम से युवाओं को कृषि विरासत से जोड़ा जाए।

निष्कर्ष

  • पारंपरिक बीज संरक्षण केवल जैव विविधता के बारे में नहीं है—यह पारिस्थितिक सुरक्षा, खाद्य स्वराज और सांस्कृतिक निरंतरता से भी जुड़ा है। 
  • सही नीतियों, जन समर्थन और पीढ़ीगत सहयोग के समन्वय से भारत के “बीज रक्षक” हमें अधिक लचीली कृषि भविष्य की ओर ले जा सकते हैं।

Source: DTE

 

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