भारतीय समाज- “गांधी जी” की नज़र से

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परिचय

  • महात्मा गांधी जी का भारत के स्वतंत्रता संग्राम और समाज के विभिन्न वर्गों को एकजुट करने में महत्वपूर्ण योगदान था। गांधी जी द्वारा समर्थित विचार उनके दर्शन में निहित हैं।
  • निस्संदेह, गांधी जी को एक ऐसे समाज-सुधारक के रूप में देखा जा सकता है जो एक ऐसी नई समाजिक व्यवस्था बनाने का प्रयास कर रहे थे जहां लोग बिना हिंसा और युद्ध के रह सकें। अपने जीवनकाल में गांधी जी ने महिलाओं,अछूतों और अन्य आर्थिक रूप से वंचित समूहों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए स्वयं को समर्पित कर दिया था।
  • इसके अतिरिक्त उनके विचारों ने लैंगिक समानता, लोगों में एकता और छुआछूत, विधवा पुनर्विवाह पर प्रतिबंध और बाल विवाह निषेध जैसी अमानवीय प्रथाओं के उन्मूलन को बढ़ावा दिया।

व्यक्ति और समाज

  • गांधी जी की एक ऐसी नई सामाजिक व्यवस्था के निर्माण की संकल्पना थी जो शोषण और अत्याचार से मुक्त हो। उन्होंने सर्वोदय समाज और शोषण विहीन समाज जैसी संस्थाओं की स्थापना कर इस लक्ष्य के लिए स्वयं को समर्पित कर दिया, जिसका उद्देश्य लोगों की शोषण से सुरक्षा प्रदान करना था। गांधी जी का दृढ़ विश्वास था कि प्रत्येक मनुष्य, चाहे उसकी सामाजिक या आर्थिक स्थिति कुछ भी हो, उसे व्यक्तिगत विकास के लिए समान अवसर मिलने चाहिए।
  • हालांकि, वह केवल अधिकतम लोगों के लिए अधिकतम सुख के विचार से संतुष्ट नहीं थे। इसके स्थान पर गांधी जी ने समाज के सभी वर्गों के विकास और समृद्धि की वकालत की। गांधी जी के अनुसार लोगों की समग्र भलाई जिसे स्वराज के रूप में जाना जाता है, प्रत्येक व्यक्ति की भलाई पर निर्भर करती है। दूसरे शब्दों में व्यक्ति केवल तभी समृद्धि प्राप्त कर सकते हैं जब समाज के अंदर उन्हें स्वतंत्रता और शांति प्राप्त हो।
  • हालांकि,गाँधी जी केवल भौतिक विकास पर ध्यान केंद्रित करने के विरूद्ध थे,क्योंकि गाँधी जी का मानना था कि अत्यधिक भौतिक समृद्धि से विभिन्न समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। गांधी जी का आदर्श इस धारणा के इर्द-गिर्द केंद्रित था कि हमारी सभ्यताओं, संस्कृति और स्व-शासन (स्वराज) की उन्नति हमारी इच्छाओं को पूर्ण करने और अपनी इच्छाओं को बढ़ाने पर निर्भर नहीं है, बल्कि आत्म-संयम और आत्म-त्याग का अभ्यास करने पर निर्भर करती है।

जाति-प्रणाली

  • गांधीजी के अनुसार जाति वर्णाश्रम के समकक्ष नहीं है। जबकि वर्ग संरचना वर्ण व्यवस्था जैसी सामाजिक व्यवस्था का एक समाधान है जो हिंदू धर्मग्रंथों पर निर्भर करती है न कि वर्ग संरचना पर। वर्णों के नियमों का पता वेदों जैसे प्राचीन ग्रंथों से लगाया जा सकता है, जिसमें कहा गया है कि मनुष्य को अपनी आजीविका कमाने के लिए अपने पूर्वजों का व्यवसाय अपनाना होगा। अनगिनत जातियों की एक इकाई है जिनमें से कुछ लुप्त हो रही हैं और कुछ नई अस्तित्व में आ गई।
  • ऋग्वेद के दसवें मंडल के अनुसार, चार प्रमुख वर्ण हैं, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। उपर्युक्त वर्णों के अपने पदानुक्रम और स्थिति के अनुसार अलग-अलग कर्तव्य और कार्य हैं।
  • गांधी जी के अनुसार, ब्राह्मण स्वयं समाज में श्रेष्ठता का दावा नहीं कर सकते क्योंकि यह वर्णों के नियमों के खिलाफ जाता है। उनका मानना था कि वेदों में चारों वर्णों को शरीर के चार अंगों से तुलना की गई है और उनके अनुसार कोई भी वर्ण दूसरे वर्ण से श्रेष्ठ नहीं हो सकता,प्रत्येक वर्ण को समान और महत्वपूर्ण माना जाना चाहिए ताकि जाति आधारित भेदभाव को समाप्त किया जा सके और समाज में समानता स्थापित की जा सके। उन्होंने वर्णाश्रम की सदियों पुरानी परंपरा को एक नई रोशनी देने का प्रयास किया और इसे समाज में कल्याण को बढ़ावा देने के साधन के रूप में प्रयोग किया।

महिलाओं की स्थिति:

  • गांधी जी ने महिलाओं को केवल सुधार के विषय के रूप में नहीं, बल्कि आत्म-जागरूक व्यक्तियों के रूप में देखा। उन्होंने स्वाभाविक रूप से उन्हें व्यापक जनता में शामिल किया। राष्ट्रीय और स्थानीय जन आंदोलनों में भारतीय महिलाओं की सक्रिय भागीदारी ने भारतीय समाज को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
    गांधी जी ने महिलाओं को भारत के स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने के लिए आह्वान किया तथा इस बात पर जोर दिया कि सत्याग्रह और सामाजिक पुनर्निर्माण कार्यक्रमों में उनकी भागीदारी पुरुषों की तुलना में भी अधिक महत्वपूर्ण थी।
  • गांधी जी का मानना था कि शारीरिक भिन्नताओं के बावजूद भी पुरुष और महिलाएं समान हैं। महिलाओं को पुरुषों के समकक्ष के रूप में देखा जाता है और उनमें समान मानसिक क्षमताएं होती हैं। उन्होंने लड़कियों को सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक क्षेत्रों में भागीदारी का समर्थन किया तथा इस बात पर जोर दिया कि उन्हें केवल हीन नहीं,बल्कि समाज में अद्वितीय योगदान देने वाले रचनात्मक व्यक्तियों के रूप में देखा जाना चाहिए।
  • महिलाओं की भूमिका और अधिकारों को बढ़ाने के लिए गांधी ने उनकी समाज के सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक क्षेत्रों में सक्रिय भागीदारी की वकालत की। उन्होंने महिलाओं को राजनीति में भाग लेने और स्वतंत्र सोच विकसित करने के लिए प्रोत्साहित किया।
  • गांधीजी ने महिलाओं के लिए शिक्षा के महत्व पर जोर दिया, विभिन्न विषयों में व्यावहारिक शिक्षा की वकालत की। उन्होंने शिशुहत्या, मानवहत्या, बाल श्रम और बाल विवाह जैसी हानिकारक प्रथाओं का कड़ा विरोध किया, जो सामाजिक प्रगति में बाधा बनती हैं। महिलाओं के अधिकारों को स्थापित करने के लिए गांधीजी के निरंतर प्रयासों से स्वतंत्रता के पश्चात के युग में भारत में महत्वपूर्ण परिणाम मिले।

बाल विवाह :

  • गांधी जी बाल विवाह के विरोधी थे तथा इसे एक अनैतिक और अमानवीय प्रथा मानते थे जो हमारे नैतिक मूल्यों को कमजोर करती है और बच्चों को शारीरिक अध:पतन की ओर ले जाती है। उन्होंने तर्क दिया कि प्रारंभिक विवाह का समर्थन करने वाले धार्मिक ग्रंथ वास्तव में हिंदू धर्म का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं और उन्हें परिवर्धन के रूप में खारिज कर दिया जाना चाहिए। बाल विवाह से न केवल माताओं के स्वास्थ्य को नुकसान होता है, बल्कि यह नई पीढ़ी और पूरे देश को भी नकारात्मक रूप से प्रभावित करता है।
  • गांधी जी का मानना था कि महिलाओं का सशक्त सशक्तिकरण केवल विवाह प्रणाली में आमूलचूल परिवर्तन के माध्यम से ही प्राप्त किया जा सकता है। महिलाओं समक्ष कई चुनौतियां विवाह संस्था के अंदर विद्यमान हानिकारक रीति-रिवाजों का परिणाम थीं।
  • बाल विवाह और विधवा पुनर्विवाह के अधिकारों का हनन महिलाओं में विधवापन के प्रमुख कारण थे। बहुविवाह, बाल विवाह, विधवा पुनर्विवाह निषेध और दहेज जैसी पारंपरिक हिंदू रीति-रिवाज महत्वपूर्ण बाधाएं थीं जिन्होंने भारतीय महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार किया और उनके विकास को बाधित किया।
  • इसलिए, गांधी जी ने विवाह के एक ऐसे रूप की वकालत की जो हिंदू मान्यताओं के अनुरूप हो, जिसमें स्थानांतरण, पुनर्जन्म या मुक्ति शामिल है। उन्होंने युवा लड़कियों को बचाने के लिए माहिल आश्रम जैसी विशेष संस्थाओं की स्थापना का समर्थन किया। उनका मानना था कि बाल विधवा को सही अर्थ में विधवा नहीं माना जाना चाहिए।

अस्पृश्यता:

  • सामाजिक समानता के प्रश्न को संबोधित करते हुए, गांधी जी ने समाज के विभिन्न वर्गों के बीच जातिगत मतभेदों को खारिज कर दिया। वह छुआछूत या आमतौर पर बहिष्कृत जाति और वर्ण के नाम से जाने वाली प्रथा के ख़िलाफ़ थे।
  • गांधीजी का मानना था कि हिंदुओं के बीच अस्पृश्यता का प्रसार सत्यता के सिद्धांतों का खंडन हो सकता है जो भारतीय लोगों के गौरव को तोड़ सकता है। छुआछूत जैसी कुप्रथा समाज की देन है जो मानवीय आचार संहिता का बुरी तरह उल्लंघन करती है। इसके अतिरिक्त, गांधी जी ने अपने पूरे राजनीतिक जीवन में अस्पृश्यता के खिलाफ बड़े पैमाने पर लड़ाई लड़ी।
  • हालाँकि, अपनी व्यक्तिगत समस्याओं के बावजूद, गाँधी जी अस्पृश्यता के विरुद्ध दृढ़ एवं सुसंगत रहे और अपने लेखन, भाषणों तथा कार्यों के माध्यम से जन सामान्य के मस्तिष्क से इस अमानवीय प्रथा को हटाना चाहते थे।
    गांधी जी ने हरिजनों के उत्थान के लिए कार्य किया और उनके मंदिर प्रवेश के लिए लड़े,जिसने अंततः उच्च जाति के हिंदुओं को हरिजनों के लिए मंदिर खोलने के लिए मजबूर किया। मंदिर प्रवेश ने एकरूपता की भावना को जगाया और हरिजनों के घावों को भरा तथा उन्हें यह विश्वास दिलाया कि वे भगवान के सामने अछूत नहीं हैं।

निष्कर्षतः यही कहा जा सकता है,

गांधी जी करिश्माई व्यक्तित्व के धनी थे और जन समान्य के लिए प्रेरणा का स्रोत थे। उन्हें आर्थिक रूप से वंचित लोगों के उद्धारकर्ता के रूप में माना जाता था। गांधी जी ने अपने अहिंसक दृष्टिकोण के माध्यम से भारत में भेदभावपूर्ण सामाजिक संरचना को बदलने का लक्ष्य रखा और एक आदर्श सामाजिक व्यवस्था स्थापित करने का प्रयास किया। एक निष्पक्ष सामाजिक संरचना के लिए उनकी वकालत ने भारतीय समाज की व्यापक प्रगति और अंतर्संबंध में योगदान दिया।

उनके विचारों और विश्वासों ने भारतीय समाज से विभिन्न पारंपरिक अन्याय, सामाजिक अशांति, अन्याय और लैंगिक असमानता को दूर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। गांधी जी के भविष्य के समाज का दर्शन समानता के सिद्धांतों और समान अवसर प्रदान करने पर आधारित थे।

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