हाल ही में, विश्व बौद्धिक संपदा संगठन (WIPO) ने विश्व बौद्धिक संपदा संकेतक (WIPI) रिपोर्ट 2024 जारी की, जिसमें वैश्विक बौद्धिक संपदा (IP) फाइलिंग में महत्वपूर्ण रुझानों और विकास पर प्रकाश डाला गया।
हाल ही में, यह रेखांकित किया गया कि शासन को परिवर्तित करने के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता(AI) की क्षमता बहुत अधिक है, विशेष रूप से भारत जैसे तेजी से डिजिटल हो रहे देश में, क्योंकि यह शासन में क्रांति लाने के लिए तैयार है, तथा लोक प्रशासन में दक्षता, समावेशिता और जवाबदेही बढ़ाने के अभूतपूर्व अवसर प्रदान करता है।
हाल ही में राष्ट्रीय प्रेस दिवस ‘प्रेस का परिवर्तित स्वरूप(Changing Nature of the Press)’ थीम के साथ मनाया गया, जो मीडिया परिदृश्य की विकसित होती गतिशीलता को दर्शाता है और उस दिन को चिह्नित करता है जब 1966 में भारतीय प्रेस परिषद (PCI) ने अपना संचालन शुरू किया था।
जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन (UNFCCC) के तहत पार्टियों के 29वें सम्मेलन (COP29) ने वैश्विक जलवायु लक्ष्यों को प्राप्त करने में जलवायु वित्त की केंद्रीयता को रेखांकित किया है।
केंद्र सरकार द्वारा हाल ही में लागू की गई शुद्ध उधार सीमा (NBC) ने महत्वपूर्ण परिचर्चा और विवाद को उत्प्रेरित किया है, विशेष रूप से भारत में संघवाद और राजकोषीय स्वायत्तता के संदर्भ में।
विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में, भारत एक ऐसे निर्णायक बिंदु पर खड़ा है, जहाँ राजनीतिक क्षेत्रों में महिलाओं को शामिल करना न केवल प्रतिनिधित्व का मामला है, बल्कि समग्र विकास और वास्तविक लोकतंत्र के लिए एक आवश्यकता है।
सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के महान उद्देश्यों के बावजूद, यह गंभीर रिसाव और भ्रष्टाचार से ग्रस्त है, जिससे इसकी प्रभावशीलता और लाखों भारतीयों की खाद्य सुरक्षा कमजोर हो रही है।
जैसे-जैसे विश्व कम कार्बन ऊर्जा परिदृश्य की ओर बढ़ रहा है, भारत का छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर (SMR) पर ध्यान परमाणु ऊर्जा के लिए एक परिवर्तनकारी दृष्टिकोण का संकेत देता है, जो सतत ऊर्जा सुरक्षा के लिए इसके व्यापक दृष्टिकोण के साथ अच्छी तरह से संरेखित है।
तीव्रता से गर्म होते विश्व में, प्रभावी शीतलन समाधानों की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। जलवायु परिवर्तन और ऊर्जा दक्षता की दोहरी चुनौतियों से निपटने के लिए स्वच्छ ऊर्जा तथा शीतलन समाधानों पर अंतर्राष्ट्रीय सहयोग आवश्यक है।
हाल के भू-राजनीतिक और पर्यावरणीय परिवर्तनों ने सिंधु जल संधि (IWT) में संशोधन और दोनों देशों के दृष्टिकोणों पर विचार करते हुए IWT पर पुनः बातचीत करने में शामिल जटिलताओं तथा चुनौतियों का पता लगाने की मांग को बढ़ावा दिया है।